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मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी…

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1. इस मैं को शुक्रगुज़ार हूँ मैं

वो मेरा मैं ही है
जो एक वृहद् रूप लेता है
अहं वाला मैं नहीं
ब्रह्माण्डीय मैं

जो शिव बनता है, ब्रह्मा बनता है
हर चाह बिना चाहे पूरी करता है
जो मेरा महबूब बनता है
मेरा इश्क़, मेरा आशिक़ बनता है

कि यह मेरा ही है अक्स
जिसे मैं प्यार करती हूँ
जिसकी पूजा करती हूँ
जिसको समर्पित होती हूँ

जो मेरे अंदर भी रहता है
मेरी साँस में साँस लेता है
मेरी थकान में थकता है
मेरे बाहर भी रहता है
हर शै में बसता है
मेरा हाथ थाम कर चलता है
कि इस मैं को नतमस्तक हूँ मैं
इस मैं को शुक्रगुज़ार हूँ मैं

2. हमेशा ख़ुद में परिपूर्ण सम्पूर्ण

अगर औरत में मन की दिल की रूह की इतनी शक्ति हो सकती है
कि वो अपनी देह की मैल से एक पुतला बनाए
उसमें जान फूंके
और उसे अपने घर के द्वार पे प्रहरी बना कर खड़ा कर ले

तो उसमें इतनी भी शक्ति हो सकती है
कि वह अपने अंदर एक आशिक़ सरीखा, सखा सरीखा
गुरु सरीखा और ख़ुदा के जैसा
एक आकार निराकार तैयार कर ले

उसमें अपनी मोहब्बत, इबादत, अकीदत से प्राण फूंके
और फिर ता उम्र उसके प्यार के साथ उसकी छाया में उसके मंत्रों के साथ गुज़ार दे

हमेशा ख़ुद में परिपूर्ण सम्पूर्ण
श्रेष्ठ मिश्रण शिव और शक्ति का

3. और वो चमत्कार हो गई है

कुछ दिनों से उसके चेहरे पे एक रौनक सी रहने लगी है
रसोई में से गुनगुनाने की आवाज़ें आती हैं
मैनु हीरे हीरे आखे
हाय नी मुंडा लम्बड़ां दा

जब वो सुबह उठती है
चाय बनाने जाती है
तो रसोई में पड़े हर पौधे के पत्तों को
बड़े प्यार से छूती है , पलोसती है, सहलाती है

उसके चेहरे से तब एक अलौकिक नूर बरस रहा होता है
चाय पीती है तो यूँ जैसे चाय को जी रही हो
कई बार तो चूड़ियां पहन कर ही सो जाती है
छन छन की आवाज़ उसे किसी रुमानियत से भर देती है

उसकी उम्र की पड़ोसनें नहीं सूंघ सकतीं उसे हो गए इश्क़ की मुशक
इस उम्र में भी कोई इश्क़ कर सकता है भला
यह तो बच्चों के भी बच्चों को देखने सम्भालने की उम्र है

वो खुद पर इतराती है
गर्व महसूस करती है
चाहे जाने का गरूर महसूस करती है

ब्रह्माण्ड का ज़र्रा ज़र्रा नृत्य करता दीखता है
हवाओं में एक संगीत है
सब सुगंधित है
सब रूपांतरित हो गया हो जैसे
एक नशा, एक बेख़ुदी
प्रेम में बंध कर जैसे वो मुक्त हो गई हो

किसी की किसी भी बात पर गुस्सा नहीं आता
ऐसे है जैसे तीनों लोकों की मिल्कियत किसी ने उसके नाम कर दी हो

लम्हा लम्हा जीती है
सब कितना ख़ूबसूरत है

आईने में देखती है अपनो माथे पे गिरती चांदी चाँदी सी लट को
जिसे एक दिन कान के पीछे करते हुए उसने कहा था
जानती हो, यह तुम्हें और भी ख़ूबसूरत बनाती है
इसे कभी मत रंगना
तुम मेरे लिये दुनिया की सब से ख़ूबसूरत लड़की हो…

लड़की?
वो मुस्कुराई
और उन्नीस साला कॉलेज जाती लड़की हो गई
हाँ, लड़की
मेरी सोहनिए
वो रोशन रोशन हो गई
और फिर जो बेवक़ूफ़ियाँ उसने की

मसलन, छुप छुप कर संदेस भेजना
घर से बाहर सड़क पर जा उसे फ़ोन करना, झूठ बोलना
वो उसके इस जन्म का सबसे बेशक़ीमती ख़ज़ाना है

वो चमत्कार हो गई है
ख़ुद में सिमटी हुई, सम्पूर्ण, शांत, सरल
खुदा सी
सत्य सी

4. अंदर की लौ से ही प्रकाशित होता है सब बाहर भी…

जाना तो कहीं नहीं है
न ही कहीं पहुँचना है
बस जो चक्षु बंद पड़े हैं
उन्हें खोलना है

और अपने अंदर जलती हुई
अनन्त, आदि, अनादि
लौ को देखना है

सब यहीं है
इसी पल में
अपने ही अंदर
सारा ब्रह्माण्ड, सारी कायनात
कायनात का रचयिता

पाँच तत्वों से बना यह शरीर
फिर से विलय होगा पाँच तत्वों में ही
पर इसी के ज़रिए मुमकिन है
ख़ुद से ख़ुद तक का सफ़र

यह मंदिर है रूह का
क़ाबा है शक्ति का
गिरजा है शिव का
दिव्य मिलन संभव है इसी के अंदर

अंदर की लौ से ही
प्रकाशित होता है सब बाहर भी…

– राजेश जोशी

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1 thought on “मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी…”

  1. Minakshi says:

    जितनी बार पढूं, उतनी बार और अच्छी लगती हैं यह कविताएँ… धन्यवाद… 🙏🏻 🙏🏻 🙏🏻

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