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अन्नपूर्णा : जिसके वक्षों का अमृत कभी सूखता नहीं, रसोई का रस उसी से है

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जब वह रसोईघर में प्रवेश करती है तो उसकी चूड़ियों के साथ बर्तन भी लयबद्ध होकर खनक जाते हैं. हवा में घुलती छौंक की खुशबू से घर का वातावरण उतना ही शुद्ध होता है जितना हवन कुण्ड के उठते धुंए से.

झालर वाली फ्रॉक पहने गोभी भी उसका पल्लू पकड़ कर खुशी से फूल हो जाती है…

लौकी अपने बेढब देह और स्वाद के बावजूद उसका हाथ लगते ही खुद को सबसे सौभाग्शाली और सुन्दर समझने लगती है…

भींडी अपनी नुकीली नाक के साथ बच्चों की थाली में चढ़ इतराती है, तो टमाटर के गाल तो उसकी मुस्कराहट देखकर ही लाल हो जाते हैं…

भाजी की मोरपंखी सी पत्तियां उसके हाथ से नहाने पर ऐसे नाच उठती हैं जैसे बरखा आने पर मोर…

उसके प्रवेश के साथ ही चम्मचे घंटियाँ बजाने लगती हैं तो चूल्हे की आग दीयों की भांति प्रज्वलित हो जाती हैं….

और सारे मसाले उस अन्नपूर्णा की खातिर हवन कुण्ड में समिधा बनकर स्वाहा हो जाने को तैयार हैं… क्योंकि वह जानते हैं… यह देवी कोई ग्रन्थ नहीं पढ़ी, कोई शिक्षा दीक्षा उसने किसे गुरु से ग्रहण नहीं कि… वह स्वयं सिद्धा सी रसोई में प्रवेश करती है और स्वाद के देवता उसके चरणों में समर्पित हो जाते हैं…

वह दही बिलौती हुई ध्यान मग्न सी जीवन का मक्खन निकालती है और कृष्ण रूपी संतानों की सेहत के लिए प्रार्थना करती सी भोग लगाती है, इसलिए उसकी बातों में भी उस मक्खन की नरमियत अनुभव की जा सकती है…

हे अन्नपूर्णा तुम उस धरती की तरह हो, जो अपनी देह पर फसल उगाकर सब प्राणियों की आत्मा को तृप्त करती है.

इसलिए तुम जब भी रसोईघर में प्रवेश करो तो ऐसे करना जैसे कोई देवी अपने ही मंदिर में प्रवेश करती है, और भूख लगने पर सब तुम्हारे दर्शन को आते हैं, आखिर तुम्हीं से ही तो रसोई में प्राण प्रतिष्ठा होती है.

तुम अपनी गृहस्थी की रोटी में लगा प्रेम का घी हो जो स्वाद और स्वास्थ्य ही नहीं देता बल्कि परिवार को बांधे रखने का संबल भी देता है, श्रद्धा देता है और समर्पण भी.

हे अन्नपूर्णा तुम पूर्ण हो अन्न से… आत्मा की तृप्ति के लिए देह का तृप्त होना पहली सीढ़ी है, तुमसे बेहतर यह और कौन जान सकता है. इसलिए कभी कभी खुद कम खाकर बचा लेती हो उन अतिथियों के लिए भी जिनका आना निश्चित नहीं…

नवरात्रि में आप में से कई लोग व्रत रखते होंगे, देवी के नवस्वरूप की आराधना करते होंगे. आप सबसे एक अनुरोध है, व्रत करते समय इस दसवीं देवी को अवश्य नमस्कार करना जिसके समर्पण का अनुमान तो आप प्रतिदिन उसके चेहरे के बदलते भाव से लगा लेते होंगे. जिस पर कभी चिंता होती है, तो कभी तृप्ति… कि कहीं बच्चे भूखे तो नहीं रह गए, किसी सदस्य को कोई सब्ज़ी पसंद नहीं तो उसके लिए अलग से क्या बनाया जाये, और यदि सबने खा लिया है तो जैसे उसका पेट भी भर गया.

व्रत में भूख पर संयम रखते समय याद करना इस देवी को जो परिवार के सभी सदस्यों को तृप्त करने के लिए कई बार खुद भूखी रही होगी या कम खाया होगा.

याद करना उस रोटी को जो आधी मांगने पर पूरी मिल जाती है.

याद करना डिब्बे में रखी उस मिष्टी को जो ख़ास तुम्हारे लिए बचाए रखी थी.

याद करना इस बात को कि आपकी उम्र की ढलान पर भी उसे आपकी बचपन की पसंद नहीं भूलती. क्योंकि माँ के लिए बच्चे कभी बड़े नहीं होते.

उसके वक्षों का अमृत कभी सूखता नहीं, रसोई का रस उसी से है…

– माँ जीवन शैफाली

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