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सभ्यता, संस्कार, स्वतंत्रता और स्त्री सशक्तिकरण

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बीती रात भांजी को रिसीव करने रेलवे स्टेशन पर था.

बिटिया कलाकार है, फाइन आर्ट्स की छात्रा, ceramic sculpture बनाती है, भोपाल का भारत भवन उसका दूसरा घर जैसा बन गया है.

रात साढ़े दस बजे मदन महल स्टेशन पहुँचने वाली शताब्दी एक्सप्रेस से लौट रही थी, अपने भारी भरकम प्रोजेक्ट वर्क के साथ.

घर से निकलने से पहले चेक किया तो ट्रेन आधा घंटा लेट थी, तो पौने ग्यारह बजे निकला…

घर और स्टेशन के बीच तीन बड़े हनुमान मंदिर पड़ते हैं… हनुमान प्राकट्य दिवस… भीड़-भड़क्का… रोड ब्लॉक… ऊपर से कार की सवारी… सिहरन व्याप्त हो जाए इससे पहले खुद को तसल्ली दी कि रात 11 बजे तक तो सब निपट-सुलझ चुका होगा.

काहे को भैया… रात 11 बजे भी भक्ति का समन्दर लहरा रहा… बैरीकेड्स लगे… पुलिस तैनात… दिल दहला देने वाला डीजे…

यहाँ से स्टेशन महज़ डेढ़ किलोमीटर दूर रह गया था, ट्रेन का टाइम भी हो चला था… पेट्रोल और समय दोनों की बरबादी इन हनुमान भक्तों के नाम मढ़ते हुए गाड़ी उधर घुमाई जिस तरफ पुलिस वाला इशारा कर रहा था…

अतिरिक्त चक्कर मारकर जब स्टेशन पहुंचा तो पाया कि दो ट्रेनें खड़ी है, जो आगे जबलपुर स्टेशन पर प्लेटफ़ॉर्म खाली होने का इंतज़ार में 15 मिनट से यहीं खड़ी हैं… और शताब्दी जिसमें सुपरफास्ट का किराया लगता है, अभी आउटर पर अटका दी गई है.

भांजी से फोन पर बात की तो उसने लोकेशन बता कर कहा, आप फलां जगह पहुँचो, मैं यहीं कूद रही ट्रेन से… पक गई आधे घंटे से रुकी हुई ट्रेन में…

आमतौर पर ऐसे एडवेंचर्स के लिए मैं लड़कियों को प्रोत्साहित करता हूँ… स्व. माताजी अकसर सबसे छोटी बहन को ‘बिगाड़ने’ के लिए मुझे उलाहना देती थीं… वो किस्सा फिर कभी…

पर बिटिया को इस एडवेंचर से रोक दिया… कारण थे उसके sculptures… बात उसे भी समझ आ गई…

इधर अपन ठंडी हवा पाने फुट ओवर ब्रिज पर खड़े हो गए… रात के इस वक़्त ब्रिज पर सन्नाटा ही था… तभी पीछे की तरफ से आती कुछ जोड़ी कदमों की खटखट पर स्वाभाविक रूप से पलट कर देखा…

दो मवाली… नहीं, शायद छिछोरे उपयुक्त शब्द होगा, मतलब वो अजीबोगरीब से हेयरस्टाइल, चेहरे पर हलकी दाढ़ी, कमर से खिसकती और टांगों से चिपकी पैंट… ऐन आज के रणवीर सिंह (पद्मावत का खिलजी) के मारे हुए से छोकरे, तकरीबन 25-26 की उम्र के चले आ रहे थे… और…

…और उन दोनों के पीछे-पीछे घिसट रही एक बुर्क़ानशीं… इस गरमी में कपड़ों के ऊपर काला लबादा ओढ़ने की मजबूरी का ख्याल आते ही सहानुभूति सी जागी… तभी देखा कि बुर्क़े में से झाँक रही हैं दो आँखें… बुर्क़े के आँखों वाले हिस्से पर एक जालीदार पर्दा सा होता है, वो इन मोहतरमा ने हटाया हुआ था… शायद ब्रिज की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए…

नज़रें टकराते ही eyes lock हो गईं… वे पता नहीं क्यों, और मैं उनकी बेबाक, बेधड़क अंदाज़-ए-निगाह पर अटका, कुल जमा चार-पांच सेकेंड्स में वे सामने से गुज़र गईं… अचानक फिर मेरी नज़र उठी तो देखा कि वे ब्रिज से उतरने के लिए बने मोड़ पर मुड़ते हुए देख रही हैं…

ऐसे में भाई राहुल सिंह राठौड़ याद आए, जो कल-परसों ही किसी पोस्ट पर ऐसा कमेन्ट कर गए थे जिसका अर्थ था कि वे तो अभी बालक हैं और मैं वृद्ध… तो इस देखा-देखी को इस अर्थ में लेने की कोशिश कर ही रहा था कि शताब्दी का रास्ता रोके प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी ट्रेन सरकने लगी…

कुछ ही मिनट में शताब्दी के आने की उद्घोषणा हुई, और लगभग साढ़े 11 बजे, अपने निर्धारित समय से एक घंटा विलंब से ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर लगी. भांजी को रिसीव किया, उसकी कलाकृतियों के बॉक्स को ‘बाहुबली’ अंदाज़ में कंधे पर रखा और चढ़े ब्रिज की सीढ़ियां और फिर उतर कर कार पार्किंग की ओर बढ़े…

ये तो हुई भूमिका, अब असल बात…

बिलकुल न घबराएं… कि इतनी लंबी भूमिका, तो असल बात कितनी लंबी होगी… दरअसल काम की बात, मुद्दे की बात, असल बात कोई लंबी-चौड़ी नहीं होती, पर यदि उसे उसी रूप में कहा-लिखा जाए तो सुनने-पढ़ने में रस नहीं होता…

हम दोनों, मामा-भांजी पार्किंग में पहुंचे तो देखा कि एक युवती अपने बच्चे और लगेज के साथ वहाँ खड़ी है… जब उसके पास से गुज़रे तो सुना कि वो बच्चे को अंग्रेज़ी मिश्रित हिन्दी में तसल्ली दे रही है कि ‘आते ही होंगे… शायद पेट्रोल ख़त्म हो गया होगा, या गाड़ी पंक्चर हो गई होगी…’, और वो बालक उस युवती से चिपट-चिपट कर कहे जा रहा कि हम घर कब चलेंगे?…

उस युवती और बालक के इस संवाद के दौरान हम उसके सामने से गुज़रते हुए आगे बढ़ गए थे, तब मैंने भांजी से कहा, जाओ उससे पूछो कि कोई, दिक्कत? कहीं ड्रॉप कर दें?

बिटिया पलट कर उनके पास गई और पूछा, तो उस महिला ने भांजी को जवाब देते हुए ऊपर से नीचे तक मेरा मुआयना किया और फिर उसी हिंगलिश में कहा कि नहीं, पास ही जाना है, कोई नहीं भी लेने आए तो अकेले चली जाउंगी… सो नाइस ऑफ़ यू, सो काइंड ऑफ़ यू, थैंक्यू…

अब इस सब का मर्म-

क्या शहर इतना सुरक्षित हो गया है कि आधी रात को घर की महिला और बच्चे को यूं खुले आसमान के नीचे छोड़ा जा सकता है?

क्या उस पुरुष के लिए उस महिला-बच्चे (जो उसकी पत्नी-पुत्र भी हो सकते हैं, बहन-भांजा भी हो सकते हैं) से अधिक ज़रूरी कोई काम आधी रात को हो सकता है?

शायद उस व्यक्ति की कोई वास्तविक समस्या रही हो, लेकिन मुझे जो महसूस हुआ, वो एक बीवी से उकताए पति, और पति की बेरुखी से परेशान पर आर्थिक रूप से उस पर अवलंबित पत्नी का ही आभास हुआ.

क्या फर्क है इस बेपर्दा खातून और उस बुर्क़े में कैद बेबाक-बेधड़क नज़रों में?

फ़र्क है… और वो फ़र्क मेरे साथ कार में बैठा हुआ था… मेरी भांजी…

औरतों और लड़कियों को तालीमयाफ्ता बनाने से पहले अपने-अपने समाज के मर्दों की चिंता कीजिए, उन्हें पढ़ाइए और संस्कारवान बनाइये… इतना कर लीजिए, फिर हर समाज, हर समुदाय की औरतें समर्थ हैं, सुरक्षित हैं.

– स्वामी ध्यान विनय 

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