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प्रेम की भिक्षा मांगे भिखारन : कान्हा देख तेरी गोपियाँ तड़प रहीं…

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कहते हैं विधवाएं हैं, परित्यक्ता हैं, सताई हुईं, बेघर, बच्चों ने घर से निकाल दिया या खुद ही बच्चों के दुर्व्यवहार से घर छोड़ आईं, कुछ जीवन की तलाश में, कुछ मृत्यु की तलाश में तो कुछ मोक्ष की तलाश में…

कारण कई हैं, सामाजिक और दुनियावी स्तर पर प्रकट कारणों का होना आवश्यक भी है, वर्ना सामाजिक व्यवस्था ढह जाएगी.

लेकिन क्या कारण है कि इन्हें वृन्दावन जाने का ही विचार आता है, ये जानते हुए कि आजीविका का कोई साधन न मिलेगा, भिक्षा भी मांगनी पड़ सकती है, संस्थाओं से दान, समाज से अपमान और न जाने क्या क्या फ़ैली झोली में लोग फेंक जाएंगे… ऐसा जीवन तो वो किसी भी शहर में किसी भी मंदिर के बाहर पा सकती हैं.

क्या कारण है कि उन्हें वृन्दावन पुकारता हैं… चाहे मजबूरी में ही सही कृष्ण भजन गाते हुए वो अपना बचा जीवन काट रही हैं. आते हैं लोग देखने, कुछ समाज सेवी संस्थाएं, फोटो खींचने या वीडियो बनाने, उनके सामने नाचती हैं, सर पर पल्लू लेकर आंसू भी बहाती हैं, कोई आनंद में तो कोई पीड़ा में गाती हैं…

ये वृन्दावन की ‘विधवाएं’ कही जाती हैं, लेकिन मुझे न जाने क्यों कान्हा की वो सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियाँ लगती हैं, या वो गोपियाँ जो कान्हा की बांसुरी की धुन के पीछे खींची चली आती थीं…

ये जो बुलावा है ना, यह वही कान्हा की बांसुरी की धुन है, जो गोपियों तक इन कारणों के माध्यम से पहुँचती हैं… कई किस्से सुने हैं, कि कान्हा कई बार उन्हें अपनी बांसुरी की धुन में रमता छोड़कर आवश्यक कार्य के लिए वहां से अदृश्य हो जाते थे लेकिन उन गोपियों को पता तक नहीं चलता था कि कान्हा वहां नहीं है.

वृन्दावन की विधवाओं का वृन्दावन में होना ही उस बांसुरी की अव्यक्त धुन है जिसकी वजह से वो वहां टिकी हुई हैं. कोई नहीं जानता कान्हा किस आवश्यक कार्य से वहां से अदृश्य हो चुके हैं कि इन गोपियों को ऐसी वेदनाओं से गुज़रना पड़ रहा है.

लेकिन कोई न कोई व्यक्त कारण तो होता ही है जो दुनिया को प्रकट रूप में दिखता है, और स्वयं उन गोपियों को भी… ताकि उसकी वजह से उस अप्रकट का रहस्य बना रहे…

अपने-अपने हिस्से की पीड़ा, वेदना सबको सहना होती है, चाहे भक्ति में डूबकर या मजबूरी में कान्हा का भजन करते हुए… वो ऐसे ही अपने पिछले कई कर्मों से मुक्त हो रही हैं.

कहते हैं ना राम नाम में इतनी शक्ति है कि ‘मरा-मरा’ जपते-जपते कब ‘राम-राम’ जप शुरू हो जाता है पता ही नहीं चलता…

तो हे कान्हा की गोपियां! ये माथे पर किस्मत ने जो अंगारों सा जीवन लिख दिया है, ये चन्दन का टीका बस उसको शीतल करने के लिए ही है, जो सुहागनों के सिन्दूर से कहीं अधिक ऊर्जायुक्त है…

ये जो सफ़ेद धोती तुम देह पर लपेटी रहती हो, वो और कुछ नहीं जीवन के सारे रंग में चुनरी भिगो लेने के बाद अब एक एक करके उन सारे रंगों के छूटने का संकेत है कि…. प्रेम के रंग में ऐसी डूबी, बन गया एक ही रूप, प्रेम की माला जपते… जपते… जपते… जपते… आप बनी मैं श्याम…

जब जीवन के रंग छूटते हैं तो पीड़ा तो होगी ही, आंसू भी आएंगे, लेकिन इन्हीं आंसू से कर्मों की धोती को धोकर उसे श्वेत उज्जवल और धवल करना है… कान्हा ने बुलाया है तो निष्प्रयोजन तो न होगा. कारण तुम्हारे अपने होंगे, सबके होते हैं लेकिन इन कारणों को ही तो मार्ग बनाकर मोक्ष के द्वार तक जाना है….

और सुनो उस द्वार पर मोक्ष और कान्हा में से किसी एक को चुनना पड़े, तब भी इन सारी पीड़ाओं के साथ कान्हा को ही चुनना, क्योंकि तुम्हारा प्रेम उस राधा या मीरा के प्रेम से ज़रा भी कमतर नहीं…

माना कान्हा का प्रेम पाकर दोनों तृप्त हुई होंगी कि…
अंतर क्या दोनों की ‘तृप्ति’ में बोलो
एक हार न मानी, एक जीत न मानी…

लेकिन तुम… तुम इन हार जीत से परे हो, क्योंकि वो दोनों तो कान्हा को पाकर तृप्त हुई हैं, तुम तो उसके न होने पर भी सदा उसकी मुरली की धुन में लीन रही हो…. तुम उस परम अवस्था को पा गयी हो, जहाँ प्रेमी की उपस्थिति भी अब मायने नहीं रखती…

फकीरी सा जीवन हर किसी को नसीब नहीं होता, वास्तविक फकीरी पाने के लिए पीड़ाओं की लम्बी राह से गुज़रना होता है… आँचल फैलाना होता है हरेक के सामने…

जैसे प्रेम की भिक्षा मांगे भिखारन…

लेकिन फ़ैली झोली में फिंके फूल और फागुन की फुहार में फूली न समाती वृन्दावन की फुलवारी की फुलझड़ियाँ… तुमसे ही वृन्दावन में रौनक है… दुनिया को तो निधिवन उपवन की रहस्यमयी रास-लीला देखने का भी सौभाग्य नहीं है…

लेकिन तुम वो सौभाग्यवती हो जिनके साथ कृष्ण दिन-रात लीला कर रहे हैं… दुनिया के सामने नहीं, उस लीलाधर के सामने आंसू बहाना, चाहो तो उसे जी भर कर गाली भी दे देना इस नारकीय जीवन के लिए, मैं पूर्ण आस्था के साथ कहती हूँ उसे तुम्हारी प्रेम पगी गाली का भी बुरा नहीं लगेगा चाहे वो कितनी ही वज़नी क्यों न हो…

लेकिन जैसे शिशु को जन्मते हुए माँ प्रसव पीड़ा से गुज़रती है ना, वैसे ही तुम्हारी आत्मा प्रसव पीड़ा से गुज़र रही है, जितना तुम रोओगी उतना ही आत्मा का स्नान होगा… फिर वो सद्यस्नाता सी मोक्ष के द्वार पर खड़ी होगी और देखना तुम्हारा लीलाधर, तुम्हारे सामने एक बार फिर प्रकट हो जाएगा मुरलीधर बनके… और ले जाएगा अपने वास्तविक वृन्दावन में….

– माँ जीवन शैफाली

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1 thought on “प्रेम की भिक्षा मांगे भिखारन : कान्हा देख तेरी गोपियाँ तड़प रहीं…”

  1. Santosh nair says:

    Like ka option kaha hei?

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