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प्रेम पत्र : इश्क़ की दास्तान है प्यारे, अपनी-अपनी ज़बान है प्यारे

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ये नहीं कि मैं बिना बात किए नहीं रह सकता. रह सकता हूँ. सिर्फ ये एहसास ही काफी होता है कि कोई है, जिससे मैं जब चाहे बात कर सकता हूँ.

पिछले 53 घंटों से मैं चुप हूँ. आसपास लोग भी हैं जिनसे मैं कह रहा हूँ, वो सुन रहे हैं, वो कह रहे हैं, मैं सुन रहा हूँ. फिर भी मैं चुप हूँ. यह कहना-सुनना बहुत ऊपरी सतह पर हो रहा है, उथला-उथला सा.

बात सिर्फ कह-सुन कर ही तो नहीं होती न… अक्सर एक नज़र देख लेने भर से भी हो जाती है.

क्या मैं परावलम्बी हो गया हूँ? स्वस्थ रहने के लिए क्या अब मुझे किसी दूसरे की ज़रुरत पड़ने लगी है? स्वस्थ का मतलब तो आप समझती ही होंगी… स्वयं में स्थित. आपकी सहूलियत के लिए परावलम्बी का संधि विच्छेद भी कर देता हूँ- पर+अवलंबी.

इन दोनों प्रश्नों का उत्तर मैं ‘ना’ में पाता हूँ. आप ‘पर’ नहीं, मेरा पूरा स्व हैं, मेरा मैं हैं. जब आप ही मैं हैं तो फिर स्वस्थ तो हुआ मैं. जिगर मुरादाबादी का सहारा लेकर आपकी ज़बान में कहूं तो –
इश्क़ की दास्तान है प्यारे
अपनी-अपनी ज़बान है प्यारे

तू नहीं मैं हूं, मैं नहीं तू है
अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे

तो फिर ये घंटे क्यों गिन रहा हूँ? शायद इतने घंटों से मैंने आईना नहीं देखा. आइना जो मुझे मेरी असलियत दिखाता है, जो मुझे मेरी ताक़त की याद दिलाता है, जिसके सवालों के जवाब में मेरी ज़बान से अनायास ही ऎसी बातें निकलने लगती हैं, जो न सिर्फ ये सुनता है बल्कि खुद मैं भी सुनता हूँ और आश्चर्यचकित रह जाता हूँ.

बब्बा (ओशो) कह रहे थे एक दिन, जवाब महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है सवाल. उनकी लीला वो जाने, मैं तो अभी अगले 84 घंटों तक और जारी रहने वाली इस मौन-साधना की तैयारियों में जुटा हूँ. ये अवसर है अपने अस्तित्व को गहनता से अनुभव करने का. अभी जो कुछ कहा-लिखा, यह सिर्फ पहले 53 घंटों का अनुभव है. समय के साथ और क्या अनुभव होंगे इसकी परवाह किए बगैर मैं इन 84 घंटों को बड़ी उत्सुकता से देख रहा हूँ.

पर उस एक नज़र का क्या करूँ, जिस नज़र से देख लेने भर से संसार का सारा कोलाहल शांत हो जाता है, शब्द मौन हो जाते हैं.

In other words, I am missing your presence. Honestly speaking, I am missing you.

ध्यान विनय

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