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ब्रह्माण्ड बहुत ही प्यारा दोस्त है मेरा

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हस्पताल के गलियारे में बैठी थी। अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। ब्लड टेस्ट तो हो चुका था पर डॉक्टर अभी किसी और मरीज़ के साथ मशगूल थी।

एकाएक मन को न जाने क्या हुआ, अब मन है तो अपनी मर्ज़ी से उड़ने लगता है, पूछता थोड़ी न है। विचार तितलियों की तरह मँडराने लगे सिर के आसपास।

यह मैं इतने सालों से क्यों आ रही हूँ यहाँ हर माह, कई बार तो सात, दस या पंद्रह दिन बाद भी। हर बार मेरा ख़ून निकालते हैं। कभी काउंट्स बढ़ गए तो कभी घट गए। एक बार तो ख़ून इतना गाढ़ा हो गया था कि पोक कर कर के निकाल रहे थे और फिर देखते कितनी देर में क्लॉट होने लगता है।

जब दबा दबा कर निकालते तो बहुत दर्द होता और मैं सोचती, न जाने मैंने कितने सारे बुरे कर्म किए हैं जिनका यह सिला मिल रहा है। और आँखों में आँसू आ जाते। अब यही पढ़ते, सुनते रहते हैं कि सब हमारे कर्मों के ही फल हैं तो ऐसे ही विचार आएँगे न मन में।

पर अब ऐसे विचार नहीं आते, बस मुस्कुराते हुए देखते रहती हूँ। कई बार तो वही एक technician होता है ब्लड सैम्पल लेने को, तो पता रहता है कितना दर्द होगा या नहीं होगा। पर कई बार नए नए लोग होते हैं तो मैं टिकटकी लगा कर सूई की नोक को देखते रहती हूँ और अपने मन को टेस्ट करती रहती हूँ।

कहते हैं न दर्द पहले मन में होता है और वही अहसास फिर देह में महसूस होता है। पर अब मेरे साथ ऐसा नहीं होता । कभी तो बिलकुल ही दर्द नहीं होता, कभी थोड़ा सा होता है तो कभी बहुत ज़्यादा।

ज़ाहिर है, दूसरे इंसान की, यानि technician की निपुणता, एनर्जी भी matter करती है। सब एक matter of fact सा लगता है। मेरा मन मेरा साथी हो गया है। मैं बड़े प्यार से उसे पलोस कर कहती हूँ,

(मेरे मन मैं तुझे क़ाबू नहीं करना चाहती। तुम तो इतने अच्छे हो। तुम ही तो दिखाते हो मुझे सब। तुम ही तो समेट कर रखते हो अपने अंदर सब कुछ।

मन को जब कोशिश कर क़ाबू न किया जाए तो ख़ुद ब ख़ुद साथ चलने लगता है। ज़िद्दी बच्चों को ऐसे ही मनाया जाता है ।)

एक बार गई तो ब्लड सैम्पल लेने वाला बिलकुल नया था। मैं उसकी पहली पेशंट थी। पुराने वाला उसे सिखा रहा था।

पुराने वाले ने पूछा – आपको ठीक है न? कोई ऐतराज़ तो नहीं?

नहीं – मैंने कहा।

घबराने की कोई बात नहीं, ठीक से हो जाएगा, उसने कहा।

मैंने देखा, वो जो नया लड़का था, तक़रीबन बीस के आसपास होगा, उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने उसके हाथ पे अपना हाथ रखा और कहा – घबराने की कोई बात नहीं, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। हर किसी का कोई न कोई पहला दिन होता ही है।

वो मुस्कुराया हल्का सा। उसके हाथ काँपने बंद हो गए।

मैंने अपनी प्रेम ऊर्जा और करुणा ऊर्जा उसमें डाल दी थी। हमारी ऊर्जा मिल चुकी थी।

मैं आराम से देख रही थी उसे नीडल प्रिक करते हुए। बिलकुल भी दर्द नहीं किया उसने। ऐसे काम किया जैसे बहुत तज़ुर्बेकार हो।

मुस्कुराते हुए हम दोनों ने एक दूसरे को शुक्रिया कहा।

जब एक घंटे बाद मैं वहाँ से गुज़री तो काफ़ी पेशंट्स को अटेंड कर चुका था। उसके चेहरे पर एक कॉन्फ़िडेन्स था। उसने मुस्कुराते हुए मुझे गुड नाइट कहा।

इतना पॉज़िटिव रहने वाली मैं भी कभी कभी उदास हो जाती हूँ। उदासी भी ज़िंदगी का एक हिस्सा ही है।

उस दिन न जाने क्यों ऐसे हुआ, मन उड़ने लगा, सवाल करने लगा। क्यों और कब तक? और उदासी की एक हल्की सी लहर चलने लगी। इस से पहले कि वो लहर ज़ोर पकड़ती, मेरे सामने वो शीशे का ऑटमैटिक दरवाज़ा धड़ाम से खुला और एक औरत, लगभग पैंतीस वर्ष की, मुस्कुराती हुई, व्हील चेयर पर अंदर दाख़िल हुई। अकेली थी। ऑटमैटिक, पुश बटन वाली व्हील चेयर पर।

अब व्हील चेयर पर तो यहाँ लोग दिखते ही रहते हैं। लगभग सब हॉस्पिटल्ज़, मॉल्ज़, स्टॉर्ज़ को, व्हील चेयर accessible बनाया गया है, बसों, ट्रेन को भी। लोगों को ख़ुदमुख़्तार बनाने की पूरी कोशिश है यहाँ, अमेरिका में।

पर मेरी नज़रें जिस वजह से उस पर चिपक कर रह गई, वो और थी। उसकी दोनो टाँगें, सिर्फ़ घुटनों तक थी। ज़ाहिर सी बात है, कैन्सर हॉस्पिटल में थी तो किसी न किसी कैन्सर की मरीज़ भी थी। उसने मुस्कुराते हुए मुझे Hi कहा, मैंने भी कहा।

उसी पल मेरी उदासी खिड़की से बाहर उड़न छू हो गई।

मैं तो चल सकती थी, भाग सकती थी, अपने सब काम ख़ुद कर सकती थी। और मैं अकेली भी नहीं थी। मेरे साथ मेरे बहुत सारे फ़रिश्ते थे, हैं।

ब्रह्माण्ड प्रश्नों के उत्तर देता रहता है अपने तरीक़े से। और मैं नतमस्तक होती रहती हूँ, शुक्रगुज़ार होती रहती हूँ।

कल रात सारी रात होती रही बर्फ़बारी
बर्फ़बारी क्या तूफ़ान था, सीटियाँ बजाती हवा थी
तो जब दिन निकला तो सोचा आज तो बाहर सारा सफ़ेद सफ़ेद ही होगा
जानते हो जब इतनी बर्फ़ गिरती है तो आसमान और धरती एक से ही नज़र आते हैं
उतने ही सफ़ेद
बीच में से अंतरिक्ष वाली सीमा तो मिट ही जाती है , ख़त्म ही हो जाती है

आसमान का नीला न जाने कहाँ जाता है
अब इतनी ठण्ड में बाहर तो जा नहीं सकते थे तो अपने कमरे की खिड़की से हटाया पर्दा
तो क्या देखते हैं
पेड़ों की बाहों में ढेरों बर्फ़ है घरों की छते भी हैं सफ़ेद, गाड़ियां भी धँसीं खड़ी हैं बर्फ़ में

पर आकाश का एक कोना थोड़ा सुर्ख़ है
इसका मतलब सूरज जी आ रहे हैं बाहर अपनी अंधेरी सफ़ेद झोंपड़ी से
अब हमारे कमरे की खिड़की तो खुलती है नोर्थ में तो सोचा रसोई की खिड़की से देखते हैं

वो झाँकती रहती है पूर्व में
और आहा ! क्या तो नज़ारा था
सूरज था अभी बहुत ही नीचे अभी दिन पूरा निकला नहीं था न
ऐसे झाँक रहा था जैसे किसी झाड़ी के पीछे से उगता दमकता छोटा सा गोला
और यूँ लग रहा था जैसे किसी ध्यान में बैठी स्त्री के माथे पे हो सिंदूरी टिका
कहीं कहीं पे बिखरी हुई थी सिंदूर की लाली तो कहीं पे हल्के हल्के बादल तैर रहे

यूँ जैसे अप्सराएँ नहा कर निकली हों समुन्दर से
हाथों में सुनहरी कलश उठाए
ठुमक ठुमक चलती
अपनी कज़रारी आँखों से जादू बिखेरती
बालों से ओस झटकतीं हुई
चाँदी रंगी पायलें छन छन बजती
फ़रिश्ते हाथ बांधे खड़े आकाश गंगा के दोनो तरफ़
नतमस्तक
सर के ऊपर तनी हुई सुनहरी आसमान की चुनरी
यूँ जैसे दुल्हन जब आहिस्ता आहिस्ता चलती आती है मंडप की और
थामे हाथ सखियों का
ज्यों ही पगडंडी से धीरे- धीरे उस पार उतरती गई अप्सराएँ
आसमान फिर से हो गया काशनी, सुरमयी
बस एक सुगंध बची, एक महक
काफ़ी थी फिर भी सारे अस्तित्व को मोहक बनाने के लिए

क्या ही अद्भुत नज़ारा था
क़िस्मत से मिलते हैं ऐसे नज़ारे देखने को
क़िस्मत से उस पल हम उठते हैं जब ऐसे नज़ारों के दर्शन होने होते हैं
नहीं तो हम तो सोए रहते हैं चादर ताने
कौन डालता है अपने आराम में ख़लल

पर ब्रह्माण्ड बहुत ही प्यारा दोस्त है मेरा
सब जानता है
कॉस्मिक लवर जो ठहरा
नहीं, नहीं जलने की कोई ज़रूरत नहीं
तुम तो जो हो वो हो ही
तुम्हारी जगह थोड़ी न ले सकता है कोई

खेला तो तुम्हीं ने रचाया
मैं हमेशा कहती हूँ यूनिवर्स को
यू आर अमेज़ बॉलज
और वो और भी प्यारा और भी ख़ूबसूरत हो जाता है
चारों तरफ़ फ़रिश्ते तैनात कर देता है मेरी हर आह, हर ख़्वाहिश सुनने की लिए
पूरी करने के लिए
अहोभाव से परिपूर्ण हूँ मैं
संतुष्ट
आनंदित

तुम तो पहले से ही थे संतुष्ट, आनंदित
तुम्हारे शहर में भी तो हुई कल बरसात
सर्दी थोड़ा तुनक तुनक कर जा रही, जाते जाते लौट आती है
जब लगता है बहार आने को है फिर से टपक पड़ती
तुम कहोगे तुम्हारी तो हर पल बहार है
ठीक है न, यह अंदर की बहार ही तो बाहर का सब ख़ूबसूरत कर देती है
अंदर की रेफ़्लेक्शन ही तो है बाहर सब
Within reflects without
सारा खेल तो माईंड का ही है
अगर यह शांत तो सब शांत

अक्सर जब अपनी खिड़की में खड़ी हो कर देखती हूँ गिरती हुई बर्फ़
चाँदी से चमकते पेड़
सब सफ़ेद ही सफ़ेद
सब इतना ठण्डा, हिमालय की चोटी जैसा
और मैं अंदर गरम कमरे में, गरमियों वाले कपड़ों में
तो एक जन्नत सी का अहसास होता है मुझे
और किसे कहते हैं जन्नत, बोलो तो
यहीं है यहीं है इसी पल है

“गर फिरदौस बर-रूऐ जमीं अस्त…
हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त..!!!”
.
(अगर इस जमीं पर कहीं स्वर्ग का अस्तित्व है, तो वो यहीं है, यहीं है और यहीं है.!!!.)

– राजेश जोशी

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