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अलविदा पीड़ा के राजकुंवर नीरज

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जीवन कटना था, कट गया
अच्छा कटा, बुरा कटा
यह तुम जानो
मैं तो यह समझता हूँ
कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया
जीवन कटना था कट गया

‘जीवन’ के लिये पहले ही उन्होंने ये अभिव्यक्त कर जता दिया कि उनके लिये वो महज़ एक पुराने कपड़े के फटने की तरह है और बिल्कुल, उसी तरह उन्होंने उसे त्याग दिया। हम लोग बस, खड़े-खड़े उका गुजरना देखते रह गये।

वो, जो इस सदी का अंतिम कलमकार था जिसने अपने गीतों से न जाने कितनी पीढ़ियों को दीवाना बनाया जीवन के 94 साल गुज़ारकर जब उनके जाने की खबर मिली तो उनके गीत कानों में गूंजने लगे जिनके जरिये उन्होंने देश ही नहीं विदेश में भी अपने प्रशंसकों की एक बड़ी तादाद पैदा की।

जिसके साथ एक ज़माना बीत गया पर, उनका ज़माना कभी नहीं बीतेगा जब-जब भी उनका ज़िक्र होगा उनके अलफ़ाज़ जुबान पर स्वतः ही आ जायेंगे कि बड़ी सहजता से उन्होंने हर एक अहसास को जुबान दी।

जब भी ऐसा कोई मौका आया हमने उनका सहारा लिया चाहे वो ‘शोखियों में घोला जाये फूलों का शबाब…’ हो या ‘फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती…’ या फिर ‘मेघा छाये आधी रात बैरन बन गयी निंदिया…’ या ‘दिल आज शायर हैं गम आज नगमा हैं शब ये गजल हैं सनम…’ या ‘ऐ भाई जरा देखकर चलो’ या ‘रंगीला रे तेरे रंग में यूँ रंगा हैं मेरा मन…’ या ‘खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को, मिलते हैं दिल यहाँ मिल के बिछड़ने को…’ हर एक जज़्बे को अपने शब्दों में इस तरह पिरोया कि हर किसी को वो अपना-सा महसूस हुआ और आज उन सबको पीछे छोड़कर वो आगे चले गये उनके लिये जीवन ही मौत की इबारत जो था।

हर सुबह शाम की शरारत है
हर ख़ुशी अश्क़ की तिज़ारत है
मुझसे न पूछो अर्थ तुम यूँ जीवन का
ज़िन्दग़ी मौत की इबारत है

जो जीवन को मौत के समकक्ष रख सकता है वही जीवन को सही मायनों में जीता है और उन्होंने जिस तरह ज़िन्दादिली से अपने हर रक पल को जिया वो हम सबने देखा कि जब वे कवि के तौर पर उभरे उस दौर में मंच में उनके सिवाय किसी का नाम ही नहीं होता था। वे जब माइक पकड़ते तो दिलों की धडकनें रुक जाया करती थी, उनके नाम से शामें गुलज़ार हुआ करती थी उनकी किताबें प्रकाशित होते ही बिक जाया करती थीं और जहाँ कहीं उनका कोई कार्यक्रम हो वहां तो चाहने वालों की भीड़ लग जाया करती थी… क्योंकि, उनकी गायन शैली व प्रस्तुति का ढंग भी इतना प्रभावी था कि उनको सुनने के बाद भी उन्हें सुनने की ख्वाहिश बाकी रहती थी।

जिसने भी उनके ज़माने में ऑंखें खोली इस नाम को सुना होगा और उनके गीतों की पंक्तियों को अपने खतों में भी ज़रुर लिखा होगा, वो जो प्राध्यापक के पेशे को अपनाने के बाद किस तरह से कवि बने खुद ही लिखकर गये…

तब मानव कवि बन जाता है
जब उसको संसार रुलाता,
वह अपनों के समीप जाता,
पर जब वे भी ठुकरा देते
वह निज मन के सम्मुख आता,
पर उसकी दुर्बलता पर जब मन भी उसका मुस्काता है
तब मानव कवि बन जाता है

कितना सटीक लिखा है न… कि कवि बनना कोई सहज कार्य नहीं जैसा कि आजकल सोशल मीडिया के ज़माने में नज़र आता है, जहाँ हर कोई खुद को कवि लिख स्वघोषित कवि बना बैठा है। उसे ये खबर नहीं कि इस तरह से कवि का केवल टैग लगाया जा सकता लेकिन, उस तरह की ख्याति या कद नहीं पाया जा सकता जो उन जैसे कवियों ने पाया।

जिन्होंने इसे चुना नहीं बल्कि, कुदरत ने खुद उनको इस काज हेतु चुना इसलिये तो अपने जीवन में सब कुछ व्यवस्थित होने के बाद भी मन में कोई कसक बाकी थी तो चले गये मुंबई, जहाँ अपनी कलम से ऐसे गीतों की रचना की जो उनकी पहचान बन गये और उनके लिखे गीतों में जो काव्य सौंदर्य व भाषा हैं ऐसा अन्यत्र देखने नहीं मिलता क्योंकि, वे एक सच्चे साहित्यकार थे जिन्होंने इसे आराधना की तरह लिया और उतनी ही शिद्दत से इसे निभाया।

तो फिर भला कविता उनसे किस तरह बेवफाई करती, उसने भी उनका भरपूर साथ निभाया और उन्हें एक ऐसे मुकाम तक पहुँचाया जहाँ वो अकेले नज़र आते हैं और अपने शब्दों में अपना परिचय कविता में ढालकर कुछ इस तरह से देते हैं…

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा

खेल-तमाशा कितना भी लम्बा क्यों न हो आखिर एक दिन खत्म हो ही जाता उसके बाद सन्नाटा शेष रह जाता और यादें जिसमें शामिल होती उस शख्स की बीती बातें उसके साथ गुजरे हुये हसीन पल और उसका छोड़ा हुआ सामान जो उसकी स्मृति के रूप में सहेजकर रखा जाता है। उन्होंने तो इतना लिखा कि उसे पढ़ते-पढ़ते साहित्य प्रेमियों की ज़िंदगी प्रेम रस से सराबोर होकर मजे से बीत जायेगी और जितना हम उनको पढ़ेंगे कुछ नया ही सीखने को मिलेगा।

ये वो लोग हैं जिन्होंने कलम कभी व्यर्थ नहीं चलाई और जो भी लिखा वो कोरा ज्ञान नहीं अनुभव से निकला हुआ अनमोल खज़ाना है, जिसे यदि गहराई से समझने का प्रयास करेंगे तो अर्थ की अनेक परतों के साथ आश्चर्य से भरते जायेंगे जितनी ही व्याख्या करेंगे उतना ही खुद को परिपक्व पायेंगे कि ये कलमकार तो जीवन के शिक्षक होते हैं जो अपने शब्दों में छिपाकर हमें गुरु मंत्र दिया करते हैं, जो कठिन पलों में हमें जीने का हौसला और हमारी टूटती हुई उम्मीदों को आशा की किरण देते हैं। फिर भला उनको कोई किस तरह से कभी भूल सकता है उनको भी शायद, ये अहसास था कि ये मुमकिन नहीं तभी तो लिखा…

आँसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगा
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।

सच, उनका नाम हमेशा लिया जायेगा जब-जब भी प्रेम की बात होगी कि उन्होंने प्रेम को न केवल भरपूर जिया बल्कि, उकेरा भी और प्रेम तो अमर है फिर भला वे किस तरह से मर सकते हैं… कभी नहीं… प्रेम बनकर फिज़ाओं में घुले रहेंगे… शब्द बनकर हवाओं में बहेंगे और सूक्ष्म कणों में बदलकर कुदरत में समा जायेंगे… ‘नीरज’ विदा होकर भी कभी नहीं जायेंगे… वो अभी भी कहीं ये कह रहे होंगे… अब ज़माने को खबर कर दो कि ‘नीरज’ गा रहा है।

– इंदु सिंह “इन्दुश्री’

निशा द्विवेदी नीरज और दद्दा का एक प्रसंग बताते हुए लिखती हैं –

उन्हें इटावा के ग्राम्यांचल में काव्यपाठ के लिए जाना था पर, जाने से पहले उन्होंने आयोजकों के सामने शर्त रख दी कि कवि सम्मेलन समाप्त होते ही उन्हें इटावा रेलवे स्टेशन तक पहुंचवा दिया जाए। आयोजक मान गए।

कवि सम्मेलन खत्म होते ही नीरज को एक जीप मुहैया करवा दी गई। ड्राइवर को इस ताकीद के साथ कि कवि जी को ट्रेन में बैठाकर ही लौटना।

दैवयोग से जीप जब जंगल से गुजर रही थी तभी डीजल खत्म हो गया। चारों तरफ नीम सन्नाटा। घुप अंधेरा ऐसा कि आदमी को आदमी भी न पहचान सके। जानवरों की आवाजें सन्नाटे को और भी आक्रांत बना रही थीं।

तभी दो नकाबपोश प्रकट हुए। हाथ में उनके लालटेन थी लेकिन कंधे पर बंदूक टंगी थी। आते ही उन्होंने ड्राइवर को अर्दब में ले लिया और सवालों की बौछार कर दी।

कौन हो? साथ में कौन हैं? इतनी रात कहां से आ रहे हो? ड्राइवर ने जब यह बताया कि ये कवि जी हैं। कवि सम्मेलन से लौट रहे हैं तो दोनों समवेत स्वर में चिल्ला उठे, दद्दा के पास चलना पड़ेगा। इत्ती रात में कवि जंगल में थोड़ी घूमते हैं। वार्तालाप सुनते नीरज की घिग्घी बंध गई थी। करते क्या न करते नीरज और ड्राइवर महोदय को लेकर दोनों महाशय दद्दा के पास चल पड़े।

मुकाम पर दद्दा एक चारपाई पर लेटे हुए थे। बंदूकधारियों ने दद्दा को बताया कि ये कवि जी हैं। डीजल खत्म हो जाने के कारण इनकी जीप बीच जंगल खड़ी हो गई है।

दद्दा बोले- हम कैसे मानें कि तुम कवि जी हो? अच्छा ऐसा करो कि हमको भजन सुनाओ।

नीरज ने टेर दी और भजन सुनाया। दद्दा को भजन भा गया। दद्दा ने फिर तो नीरज से कई भजन सुने। आखिर में जेब में हाथ डाला और सौ रुपये का नोट देते हुए कहा बहुत अच्छा गा लेते हो।

तुम्हारे गले में साक्षात सरस्वती विराजमान हैं।नीरज चलने को उद्यत हुए तो दद्दा ने अपने चेलों से कहा ड्राइवर को कुछ खुराक दे दो।

बंदूकधारी चेले ने उन्हें डीजल का टीन देते हुए कहा- जब कवि जी को लेकर चल रहे थे तो कम से कम डीजल टंकी भी चेक कर लेनी चाहिए थी।

नीरज जी ने दद्दा का परिचय पूछना चाहा तो बंदूकधारी बोले-चुपचाप निकल लो। दद्दा नाम ही काफी है। बाद में पता चला दद्दा थे बागी सरदार माधौ सिंह।

एक अन्य प्रसंग में नीरज ने उपवास का कुछ यूं अर्थ बताया –

उनसे कोई मिलने आये नवरात्र का उपवास चल रहा था तो वे कहने लगे- ‘जानते हो उपवास का मतलब।

फिर खुद ही समझाने लगे।

उप का एक अर्थ करीब है और वास का मतलब है रहना।

मतलब उपवास का सीधा सा अर्थ है अपने करीब बैठना।

वे दिव्य रसायन का सेवन करते थे।

दिव्य रसायन खुद को खुद के करीब लाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

स्मृति शेष : यादें छोड़ गया गीतों का राजकुमार

गीतों में गांभीर्य के साथ उसके बोलों की कर्णप्रियता उनके गीतों में दर्शन छिपा था। जवानी से लेकर अंतिम क्षण तक शोहरत का परचम लहराया। पद्मश्री, पद्मभूषण सम्मान सरीखे गरिमापूर्ण अलंकरण उनके खाते में दर्ज हैं।

डेढ़ दर्जन से अधिक किताबें भी लिखीं। तिरोधान शब्दों के ऐसे जादूगर का अवसान है जो श्रोताओं को प्रेमरस में भिगोने के साथ ही धर्म-अध्यात्म जगत में गोते लगवाने की कला में भी निष्णात था।

नीरज की कविता है-

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,

अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

पद्म सम्मान: 1991 में पद्म श्री व् 2007 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

जन्म-1925 इटावा

मृत्यु-2018

अब बुलाऊँ भी तुम्हें तो तुम न आना!
टूट जाए शीघ्र जिससे आस मेरी
छूट जाए शीघ्र जिससे साँस मेरी,
इसलिए यदि तुम कभी आओ इधर तो
द्वार तक आकर हमारे लौट जाना!
अब बुलाऊँ भी तुम्हें…!!

देख लूं मैं भी कि तुम कितने निठुर हो,
किस कदर इन आँसुओं से बेखबर हो,
इसलिए जब सामने आकर तुम्हारे
मैं बहाऊँ अश्रु तो तुम मुस्कुराना।
अब बुलाऊँ भी तुम्हें…!!

जान लूं मैं भी कि तुम कैसे शिकारी,
चोट कैसी तीर की होती तुम्हारी,
इसलिए घायल हृदय लेकर खड़ा हूँ
लो लगाओ साधकर अपना निशाना!
अब बुलाऊँ भी तुम्हें…!!

एक भी अरमान रह जाए न मन में,
औ, न बचे एक भी आँसू नयन में,
इसलिए जब मैं मरूं तब तुम घृणा से
एक ठोकर लाश में मेरी लगाना!
अब बुलाऊँ भी तुम्हें…!!

नीरज

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