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लोगों से बाद में, शहर और उसकी हर चीज़ से पहले प्यार करिए…

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जिस उम्र में मेरे साथ की लड़कियां जान लेती थीं कि उन्हें पढ़ लिखकर क्या बनना है… उनका राजकुमार कुमार कैसा होगा…

उस उम्र में मुझे इतना पता था कि पढ़ाई कोई भी करूँ मेरा ठिकाना कोई पहाड़ी शहर होगा… जहां ख़ूब सारी किताबें होंगी और सामने खिड़की पर खुलते पहाड़ होंगे…

पिछले एक साल से बुद्ध के शहर का हिस्सा हूँ… ये शहर इसलिए भी पसंद है कि ये मुझे कभी अकेला नहीं होने देता… बुखार में जब भीतर कुछ बरसता है तो ये शहर भी साथ देता है…

आज फ़िर बरस रहा है मेरे साथ ख़ूब… दिल खोल कर… बिस्तर खिड़की से सटा कर कान बारिश पर रख दिए हैं…. पाउलो कोएलो को पढ़ रही हूं…

ख़ुदा खैर करे… इस रात बिसात ऐसी बिछी है जैसे किसी एलेफ़ से गुज़रना ही होगा…

पहली दफ़ा तुम्हारी कविताओं में बुरांस का ज़िक्र सुना था… यहाँ इस मौसम में बुरांस ख़ूब फुलियाते हैं… किसी पुरानी रेड वाईन के रंग से…

अगर इस वक़्त में कहीं रेड वाईन पी रहे हो तो मेरे हिस्से की थोड़ी सी ज़मीन पर गिरा देना… (देवताओं की तरह अपनी चुड़ैल का हिस्सा निकालना भी ज़रूरी है तुम्हारे लिए)

नुसरत साहेब… कक्कू छन्नूलाल से मुआफ़ी सहित प्ले लिस्ट में मौजूद एकलौते पहाड़ी गाने को हार्ट बीट की रफ़्तार पर बजा दिया है…

बोल अचीन्हे हैं पर संगीत अचीन्हा नहीं होता… लोगों से बाद में, शहर और उसकी हर चीज़ से पहले प्यार करिए… लोग अक्सर बदलते है वक़्त की तरह, पर शहर नहीं…

अस्सी घाट की सीढ़ियों पर बैठे हुए कई-कई दफा आत्महत्या जैसे ख़याल आते थे और दसियों दफ़ा गंगा मुझे अवसाद सहित लेने से इनकार कर देती थी…

शहर साथ-साथ चलता है जैसे हरिश्चन्द्र घाट चलता था मणिकर्णिका चलता था… उसकी जलती चिताएं मुझे मेरे दरवाज़े तक महीनों छोड़ने आयीं… मृत्यु से आबाद होते हुए भी मुझे जीवन की ओर धकेलने के लिए…

सपनों का पीछा इतनी शिद्दत से करिए… कि एक समय के बाद सपने आपका पीछा करने लगे… और करते भी हैं…. कई-कई बार देजा वू से गुज़रना कोई जादू नहीं होता…

(अम्मा पुछ दी… सुण धीए मेरीए… तू बड़ी इतनी कियां करी होई हो… पारले बणियां मोर जो बोले हो… अम्मा जी इन्ने मोरे निंदर गंवाई हो… सदलै बंदुकी जो सदलै शिकारी जो… धीये भला एता मोर मार गिराणा हो… मोर नी मारणा मोर नी गंवाणा हो… ओ अम्मा जी एता मोर पिंजरे पुंवाणा हो… हो धीए भला नइयो छुपदें दिलां दे पियारे हो)

– मृगतृष्णा

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