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यात्रा : झुमका गिरा रे, बरेली के बाज़ार में

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शायद ही कोई होगा जिसने यह गाना नहीं सुना होगा, लेकिन आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि आखिर झुमका बरेली में ही क्यों गिरा, जबकि दिल्ली का मीना बाज़ार अधिक प्रसिद्ध है, और मुम्बई की भीड़ देखो सबसे ज़्यादा धक्का मुक्की वहीं होती है तो सबसे ज़्यादा चांस झुमके के गिरने के वहीं थे, फिर ऐसी क्या बात है कि गीतकार ने झुमका बरेली में ही गिराया?

मैं बताती हूँ ना… तो कारण यह है कि जैसे न्यूटन के सर पर सेब गिरने से उसको पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का नियम पता चला, वैसे ही हमारे गीतकार के दिमाग में यह झुमका गिरा तो उनको यह गीत लिखने की प्रेरणा मिली.

और आपको पता है यह झुमका कहाँ से गिरा?? अपने अमिताभ बच्चन… अरे वही जिनको सब बिग बी कहते हैं, तो उनसे भी बड़े वाले बिग बी यानी कि उनके पिताश्री कवि हरिवंश राय बच्चन इस गाने के गीतकार मेहंदी अली खान साहब के बहुत अच्छे मित्र थे. और उन दिनों हरिवंश राय जी का अमिताभ बच्चन की माताजी यानी तेजी बच्चन से इश्क़ परवान चढ़ रहा था. तो एक बार दोनों बरेली में किसी के विवाह में शरीक होने आये थे.

अब जब उनके जानने वालों ने पूछा कि भाई कब तक यह इश्क़ विश्क के चक्कर में पड़े रहोगे आप दोनों विवाह क्यों नहीं कर लेते? तब तेजी बच्चन ने शर्माते हुए कहा क्या करूं मेरा तो झुमका ही इस बरेली में गिर गया है.

बस फिर क्या था जब मेरा साया फिल्म के लिए साधना पर फिल्माने के लिए यह गीत लिखने की बारी आई तो मेहंदी साहब के दिमाग में यह झुमका छन्न से गिरा और उन्होंने गीत लिख डाला.

है ना मज़ेदार किस्सा, इसलिए कहा जाता है कि जीवन को भरपूर जीना चाहिए, कब कौन सा किस्सा कहाँ फिट बैठ जाए और आपके जीवन का यादगार हिस्सा बन जाए कोई कह नहीं सकता. तो इस झुमके ने बरेली को इतना प्रसिद्ध कर दिया कि बरेली विकास प्राधिकरण बरेली के परसाखेड़ा तिराहे पर लाखों की कीमत से एक विशाल झुमका लगाने की योजना बनने लगी.

उस झुमके की तर्ज पर 14 मीटर बड़े इस विशाल झुमके को शहर के परसाखेड़ा तिराहे पर लगाया जाएगा ऐसी घोषणा हुई. वहां के लोगों का मानना है कि जब देशभर से लोग बरेली घूमने आते हैं तो इस गाने की लोकप्रियता के चलते वे झुमके के बारे में ज़रूर पूछते हैं. इसलिए शहर में ऐसी कोई जगह अवश्य हो जिसे झुमके के साथ जोड़ा जा सके.

अब पता नहीं वह झुमका लगा या नहीं या लगेगा भी या नहीं लेकिन इस झुमके के पीछे एक कहानी और जोड़ी जाती है. कहते हैं कि बैरक में झुमका नाम का एक सिपाही था. बरेली के बाज़ार में मार दिया गया था. तभी से ये कहा जाता है कि – झुमका गिरा रे.

और किस्सा यह भी है कि बरेली को पांचाल भी कहा जाता था और द्रौपदी को पांचाली. और चूंकि द्रौपदी भी झुमके पहनने की शौकीन थीं, इसलिए ही झुमका बरेली में गिरा.

अब यह कहानी सच्ची है या झूठी यह तो न्यूटन ही जाने क्योंकि गुरुत्वाकर्षण तो पृथ्वी में उसके सर पर सेब गिरने से पहले भी था ही. वैसे ही झुमका भी तो कहीं न कहीं बरेली में होगा ही.

और वैसे भी पता नहीं क्यों लोग बरेली के झुमके के पीछे पड़े रहते हैं जबकि बरेली जरी, जरदौसी, सुरमा, पतंग मांझा, लकड़ी फर्नीचर आदि के लिए भी मशहूर है. यहाँ कुतुबखाना, बटलर प्लाजा, मॉडल टाउन जैसे नामचीन बाज़ार भी है, और सबसे बड़ी बात जिसके लिए बरेली प्रसिद्ध है वह है यहाँ का बांस से बना फर्नीचर. इसलिए इसे बांस बरेली भी कहा जाता है.

हालांकि इतिहास कहता है इसका नाम तो 1537 में राजा जगत सिंह कथेरिया के बेटे बंसलदेव और बरलदेव के नाम पर रखा था.

अच्छा इतिहास में इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि बरेली के अहिक्षेत्र में बुद्ध आए थे. तुर्कों के आने तक क्षत्रिय राजा राज करते थे. बाद में ये मुगल राज्य में मिल गया. अंग्रेजों के राज में यहां सिक्के बनते थे. टेराकोटा के मास्टरपीस भी अहिक्षत्र से मिले हैं. इनके ही आधार पर पता चलता है कि बरेली का इतिहास 2000 साल ईसा पूर्व से है.

अच्छा बदायूंनी की किताब में भी इसका ज़िक्र आता है. उसने लिखा था कि 1568 में हुसैन कुली खान को बरेली और संभल का गवर्नर बनाया गया. अबुल फजल ने तो यहाँ तक लिखा है कि टोडरमल यहां का टैक्स फिक्स करने आते थे. और कहा तो ये भी जाता है कि मकरंद राय 1657 में आधुनिक बरेली शहर के निर्माता थे.

बरेली का इतिहास भी झुमके जैसा खनखनाहट भरा है. रामगंगा नदी के किनारे बसा बरेली किसी रोहिलखंड नाम के राज्य की राजधानी माना जाता था. लखनऊ से 252 किमी और दिल्ली से 250 किमी दूर बरेली के लोग बहुत मिलनसार माने जाते हैं. इसलिए ही यह कहा जाता है कि

लखनऊ सिर, पेट देहली
और दोनों का दिल बरेली

पहाड़ का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला बरेली ऐतिहासिक धरोहरों से भरा है. लेकिन किसी भी काल में इसके इतिहास की खोज करने का प्रयास नहीं किया गया. आज भी लोग बस बरेली को एक झुमके की वजह से ही जानते हैं.

लेकिन फिर भी यहाँ कुछ ख़ास पर्यटन स्थल है. चूंकि द्रौपदी का जन्म यहीं बताया जाता है इसलिए यहाँ का द्रुपद का किला आज भी उस समय की कला का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है. यहां से 18 किलोमीटर दूर रामपुर रोड पर लीलौर झील भी इस काल की ही है. कहते हैं पांडव 13 वर्ष अज्ञातवास के अंतिम समय में इसी झील के किनारे रहे और यक्ष प्रश्न का प्रसंग भी इसी झील पर हुआ था.

सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही नहीं, जैन लोगों के लिए रामनगर अहम स्थान रखता है. और यहाँ की जगहों को पर्यटन विभाग ने नहीं बल्कि जैन धर्म के लोगों के आर्थिक सहयोग ने सवांरा है. माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने अहिक्षत्र में तीन वर्ष तक तपस्या की. बौद्ध मतावलंबी भीम की गदा को बौधस्तूप मानते हैं.

लेकिन यहां पर्यटन सुविधाएं इतनी लचर थी कि वर्ष 2007 में एक इंटरनेशनल थियेटर फेस्ट में भाग लेने बरेली आए चीन के रंगकर्मी जब बौधस्तूप घूमने गए, तो कच्चे रास्ते पर बस न चलने के कारण पूरा रास्ता उन्हें पैदल पूरा करना पड़ा. इसके बाद चीनी दूतावास की ओर से भारत सरकार को यहां पर्यटन विकास के लिए पत्र आया. इसके बाद यहां एक थीम पार्क का निर्माण हुआ.

इतिहास में दर्ज है कि बरेली में पांचाल नरेश सिक्के बनवाते थे. बाद में कुषाण और गुप्त वंश के लोग भी यहीं पर सिक्के ढलवाते थे. कुषाण वंश के गोल्ड सिक्के तो अभी भी बहुत मशहूर हैं. बाद में इल्तुतमिश और शेरशाह सूरी से लेकर मुगल वंश तक के सिक्के यहीं बने. अकबर आंवला की टकसाल में बनवाता था. अफगानी आक्रांता अहमद शाद दुर्रानी ने भी आंवला में ही बनवाया था. रोहिल्ला सरदार हाफिज रहमत और बाद में अवध के नवाब असफादुद्दौला सबने सिक्के ढलवाये. असफा के सिक्कों पर बरेली, बरेली असफाबाद, बरेली की पतंग और मछली के चिह्न भी थे. फिर अंग्रेज आये. उन्होंने भी यहीं सिक्के ढलवाये. 1857 में खान बहादुर खान ने भी ढलवाये. पर 1857 के बाद इस शहर में सिक्के ढलने बंद हो गये. लेकिन बरेली का सिक्के ढालने का इतिहास 2 हजार साल का रहा है.

1940 के आस-पास जब यहाँ खुदाई हुई तो उस काल के बर्तन और गुप्त वंश के सिक्के भी मिले थे. 1702 से 1720 तक रोहिलखंड में रोहिल्ले राजपूतों का शासन था, जिसकी राजधानी बरेली थी. रोहिल्ले राजपूतों ने सहारनपुर-बरेली के बॉर्डर पर एक किला बनवाया था जिसे अंग्रेजों ने जेल बना दिया.

बाकी झुमके के अलावा बरेली में आंखों की चमक बढ़ाने वाला सुरमा भी 200 साल से बनता है. कहते हैं 200 साल पहले दरगाह-ए-आला हजरत के पास नीम वाली गली में हाशमी परिवार ने इसकी शुरुआत की थी. अब सिर्फ एक कारखाना है, जिसे एम हसीन हाशमी चलाते हैं. पूरी दुनिया में सुरमा यहीं से सप्लाई होता है. अच्छा सुरमा बनाने के लिए काम में आने वाली चीज़ें भी बहुत दिलचस्प है. इसको बनाने के लिए कोहिकूर नाम का पत्थर सऊदी अरब से लाया जाता है. इसे छह महीने गुलाब जल में फिर छह महीने सौंफ के पानी में डुबो के रखा जाता है. सुखने पर घिसाई की जाती है. फिर इसमें सोना, चांदी और बादाम का अर्क मिलाया जाता है.

और हर शहर की तरह बरेली का स्ट्रीट फ़ूड भी बहुत मशहूर है जिसमें सिविल लाइंस, त्यागी रेस्टोरेंट, दीनानाथ की लस्सी, चमन चाट, छोटे लाल की चाट शामिल है. यहाँ पर मिट्टी के बर्तन में लस्सी मिलती है जो बहुत ही स्वादिष्ट होती है. दीनानाथ की लस्सी का स्वाद ही नहीं उसके बनाने की विधि भी बहुत प्रसिद्ध है.

बरेली में शाकाहारी खाने के अलावा बहुत से लज़ीज़ मांसाहारी पकवान भी मिलते हैं. मुगलई व्यंजनों और संस्कृति का बरेली पर खासा असर देखा जा सकता है. यहाँ के सींक कबाब से लेकर तंदूरी चिकन और पाया निहारी तक बहुत मशहूर है. और उसके लिए कई होटल्स भी मौजूद है जैसे क्वालिटी, दरबार-ए-खास, बीकानेरी चमन चाट, टैम्पटेशन फर्न्स, आब-ओ-दाना और अमाया होटल).

लोगों का ध्यान बरेली के झुमके से हटाने के लिए बॉलीवुड वालों ने ‘बरेली की बर्फी’ नाम से फिल्म तक बना डाली.

यहाँ से नैनीताल बाय रोड सिर्फ तीन घंटे की दूरी पर है. यूपी सरकार ने बरेली के फरीदपुर से उन्नाव के परियार तक 6 लेन का रोड प्रस्तावित किया है. इससे बरेली और कानपुर के बीच की दूरी 10 घंटे के बजाए 3 घंटे की हो जाएगी.

यहाँ के देवबंद और दरगाह-ए-आला-हजरत, जो कि सुन्नी सेक्ट हैं, ने ही बरेली के ही मदरसों ने आईएसआईएस के खिलाफ फतवा जारी किया था. उन्होंने यह कहते हुए 2008 में आतंक के खिलाफ फतवा जारी किया था कि हर हमले के बाद हम शर्मिंदा महसूस करते हैं.

बरेली में अभी भी युसुफजई, गोरी, लोदी, गिलजई, बारेच, मारवात, दुर्रानी, तनोली, काकर, आफरीदी, बकरजई पठान पाए जाते हैं.

और आपको बताते दें कि लखनऊ, कानपुर औऱ आगरा के अलावा सीएनजी गैस फिलिंग स्टेशन है भी यहीं पर है. यूपी के सातवां सबसे बड़े और इंडिया का 50वां सबसे बड़ा शहर बरेली 100 स्मार्ट सिटी की लिस्ट में भी आता है.

और हर शहर की तरह यहाँ के मंदिर भी प्रसिद्ध हैं जिनमें क्षेत्र के चारों कोनों पर स्थित चार शिव मंदिर धोपेश्वर नाथ, मदनी नाथ, अलका नाथ औऱ त्रिवटी नाथ और इसीलिए इसे नाथ नगरी भी कहा जाता है.

और इसके अलावा यहाँ आला हजरत की दरगाह भी है जहाँ आस्थावान लोग आते हैं. दरगाह-ए-आला हजरत इसके अलावा आप बरेली में अहमद रजा खान की दरगाह के दर्शन भी कर सकते हैं. बरेली में मंदिरों और मस्जिदों के अलावा सेना का एक संग्रहालय भी मौजूद है. जिसे आर्मी सर्विस कॉर्प्स मुस्लिम के नाम से जाना जाता है. यहां उन सेना के हथियारों को रखा गया है जिसका इस्तेमाल पुराने वक्त में किया जाता है.

उपरोक्त स्थानों के अलावा यहां गोस्वामी तुलसीदास जी को समर्पित एक मठ भी स्थित है जिसे तुलसी मठ कहते हैं. और जम्मू-कश्मीर राज्य के कारगिल जनपद में मई से जुलाई 1999 के मध्य पाकिस्तान द्वारा घुसपैठ करने के फलस्वरूप कारगिल युद्ध हुआ था, बरेली कैंटोनमेंट में ऑपरेशन विजय की सफलता को यादगार बनाने के लिए एक विजय स्थल तथा चौक का निर्माण किया, जिसे कारगिल चौक कहते हैं.

और चलते चलते बरेली के शायर वसीम बरेलवी के कुछ शेर आप सबकी ख़िदमत में पेश हैं –

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

और फिर…. फिर झुमका गिरा रे हम दोनों की तकरार में 🙂

– माँ जीवन शैफाली

(नेट से प्राप्त जानकारियों के अनुसार संकलित)

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