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यात्रा : पाटलिग्राम, पाटलिपुत्र, पुष्पपुर, कुसुमपुर, अज़ीमाबाद से पटना तक की कहानी

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आप सबने जूही की फिल्म हम है राही प्यार के फिल्म का यह गाना तो सुना ही होगा… बंबई से गयी पूना, पूना से गयी दिल्ली, दिल्ली से गयी पटना, फिर भी न मिला सजना….

तो जानेमन ऐसा है आपको पटना में यदि सजना नहीं भी मिलता है तो बिलकुल ग़म न करियेगा क्योंकि पटना में आपको सजना को पटाने का समय मिलने भी नहीं वाला, क्योंकि वहां आपको देखने, घूमने, खाने और मस्ताने के लिए इतनी जगह मिलने वाली है कि आप इसी जूही की दूसरी फिल्म का गाना गाते नज़र आएँगे कि… अकेले हैं तो क्या ग़म है…

तो कहाँ से शुरू की जाए यात्रा, पटना के इतिहास से, खान पान से या उसके दर्शनीय स्थल से? चलिए सबसे पहले यह जानते हैं कि पटना का नाम आखिर पटना पड़ा कैसे. इसके पीछे भी बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं-

इतिहास कहता है पटना एक हिन्दू देवी पटनदेवी के नाम पर रखा गया है, कुछ लोग पटना को संस्कृत शब्द पत्तन से आया हुआ कहते हैं जिसका अर्थ होता है बंदरगाह. यह नगर इतना प्राचीन है कि पिछली दो सहस्त्राब्दियों में यह कई नाम पा चुका है – पाटलिग्राम, पाटलिपुत्र, पुष्पपुर, कुसुमपुर, अजीमाबाद और पटना. ऐसा माना जाता है कि वर्तमान नाम शेरशाह सूरी के समय से प्रचलित हुआ।

पुष्पपुर और पाटलिग्राम नाम इसलिए पड़ा था क्योंकि कहा जाता है यहाँ पाटली के फूल यानी गुलाब के फूल इतनी अधिक मात्रा में उगते थे कि उससे इत्र और औषधियां बनाकर दूसरे नगरों में बेचा जाता था.

कुछ लोक कथाएँ तो यहाँ तक कहती हैं कि राजा पत्रक ने अपनी रानी पाटली के लिए जादू से इस नगर को बना दिया था इसलिए इसका नाम पटना पड़ गया…

तो खैर ‘नाम में क्या रखा है’ के तर्ज़ पर हम आगे बढ़ते हैं कि यदि नाम में कुछ नहीं रखा तो और ऐसा क्या है यहाँ जो आपको ‘एक बार तो पटना घूमने जाना ही होगा’ कहकर आकर्षित करे… तो वह है यहाँ के त्यौहार और खान पान, यूं तो छठ पूजा पूरे बिहार में मनाया जाने वाला त्यौहार है और गंगा नदी के किनारे बसा होने के कारण छठ पूजा के दौरान यहां की महिलाओं को नाक तक सिन्दूर लगाये हाथ में पूजा सामग्री लिए नदी में उतरकर सूर्य को अर्घ्य देते हुए देखना अपने आप में बहुत ही मनोहारी दृश्य होता है.

पूजा में बनने वाले ठेकुआ के अलावा यहाँ का लिट्टी चोखा, सत्तू, पुआ, पिट्ठा भी बहुत प्रसिद्ध है. अलग अलग स्थानों का लोकल व्यंजन खाने में यदि आपको आनंद आता है तो यहाँ का भोजन आपकी स्वादेन्द्रियों को अवश्य स्वर्गीय अनुभव देगा.

और यदि आप खाने पीने के शौक़ीन नहीं भी है तो फोटोग्राफी के लिए भी आपको ऐसी बहुत सारी जगह पटना में मिलेंगी जहाँ आप सुन्दर मनोरम दृश्यों को अपने कैमरे में कैद कर यादों को संजोकर रख सकते हैं.

यहाँ सबसे ज़्यादा देखने लायक है सभ्यता द्वार – बिहार में पटना शहर में गंगा नदी के तट पर स्थित एक बलुआ पत्थर आर्क स्मारक है. सभ्यता द्वार को मौर्य-शैली वास्तुकला के साथ बनाया गया है जिसमें बिहार राज्य की पाटलिपुत्र और परंपराओं और संस्कृति की प्राचीन महिमा दिखाने के उद्देश्य से बनाया गया है. लेकिन इसे रात में देखना और अधिक मनोहारी होता है जब यह पूरी तरह से रोशनी में नहाया होता है.

दूसरा सबसे रोचक स्थान है अगम कुँआ, इस कुँए के बारे में कहा जाता है कि यह एक चमत्कारी कुआं है. कहते हैं यह कुआं मोर्य वंश के शासक सम्राट अशोक के काल का है और इसके बावजूद इसका पानी आज तक सूखा नहीं है. कोई कहता है इसमें अशोक का ख़ज़ाना गढ़ा है, कोई कहता है सम्राट अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर उनकी लाशें इस कुएं में डलवाई थीं. इस कुएं के बारे में एक अन्य मान्यता यह है भी है कि यह इसलिए कभी नहीं सूखता है क्योंकि यह कुआं गंगासागर से जुड़ा है। इसके पीछे का तर्क यह है कि एक बार एक अंग्रेज की छड़ी पश्चिम बंगाल स्थित गंगा सागर में गिर गई थी जो कि बहते-बहते पाटलिपुत्र स्थित इस कुएं के ऊपर आकर तैर रही थी। आज भी वह छड़ी कोलकाता के एक म्यूजियम में रखी हुई है.

इस अगम कुएं के बिलकुल पास में ही शीतला माता का मंदिर है. ऐसी मान्यता है कि पहले कुएं की पूजा की जाती है उसके बाद ही शीतला माता की पूजा की जाती है. यहां अनेकों भक्त रोज़ कुएं की पूजा करने आते हैं. लोगों द्वारा कुएं में चढ़ावा भी चढ़ाया जाता है. हालांकि इसे रोकने के लिए अब कुएं के चारों ओर जालियां भी लगा दी गई हैं.

और कहा यह भी जाता है कि इस कुएं के जल का इस्तेमाल करने से कई बीमारियां दूर हो जाती हैं। कुष्ठ रोग, चिकन पॉक्स जैसी कई बीमारियों के लिए लोग इस कुएं के जल का प्रयोग करते हैं. आस्थावान और श्रद्धालुओं के अनुसार इस कुएं के जल से नहाने से संतान प्राप्ति की मनोकामना भी पूर्ण होती है.

इसके अलावा यहाँ कुम्रहार परिसर, क़िला हाउस, हरमंदिर साहेब, महावीर मन्दिर, गांधी मैदान भी दर्शनीय स्थल हैं.

और आप यदि पटना के लिए निकले ही है तो पटना के आसपास भी आपको बहुत सारे दर्शनीय स्थल मिल जाएँगे. जैसे पटना के पास बांकिपुर का गोलघर, विधान सभा, गाँधी संग्रहालय, विज्ञान परिसर.

आपको पता है पटना संग्रहालय को यहाँ जादूघर कहा जाता है, जादूगर नहीं जादूघर… इस म्यूज़ियम में प्राचीन पटना के हिन्दू तथा बौद्ध धर्म की कई निशानियां हैं. लगभग तीस करोड़ वर्ष पुराने पेड़ के तने का फॉसिल यहाँ की विशेष धरोहर है.

आपको यहाँ ख़ुदाबख़्श लाईब्रेरी, सदाक़त आश्रम, संजय गांधी जैविक उद्यान, दरभंगा हाउस, बेगू हज्जाम की मस्जिद, पत्थर की मस्जिद, शेरशाह की मस्जिद, पादरी की हवेली भी देखने को मिल जाएगी…

और आप जब भी पटना घूमकर आएं तो अपना यात्रा वृतांत हमें अवश्य लिखकर दें. क्योंकि हर स्थान की अपनी चेतना होती है जो उसके पास आनेवालों को अपनी कहानी खुद सुनाती है. इसलिए यदि आप दस अलग लोग एक ही जगह पर जा रहे हैं तब भी आप दसों लोगों के अनुभव अलग होंगे. किसी को वहां के स्थानों ने अपनी कहानी सुनाई होगी, किसी को वहां के व्यंजनों ने, और यदि आपने ध्यान से यात्रा की होगी तो इतिहास स्वयं आपके सामने अपनी कहानी सुनाने आया होगा.

वहां का एक एक पत्थर, वहां की हवा, सबकुछ आपको बोलते हुए दिखाई देगा बस आपको अपनी दृष्टि सजग रखना होती है. और जो कुछ भी यात्रा के दौरान घटित होता है उसके प्रति ग्रहणशीलता रखना होती है. चाहे ट्रेन में सहयात्री से संवाद हो, या उसकी कोई बात पसंद न आना, सफ़र के दौरान छोटी छोटी चीज़ें बेचने वाले लोग हों, शहर की संकरी गलियाँ, या विकास करती और बाहें फैलाकर स्वागत करती चौड़ी सड़कें.

हर शहर को अपनी स्थापना के लिए लम्बा संघर्ष करना होता है. और जब युगों बाद पर्यटक उस शहर को देखने आते हैं तो उस शहर का हृदय प्रसन्नता से उन सबका स्वागत करता है और अपनी संघर्ष गाथा सुनाता है. आप भी यदि किसी ऐसे शहर में घूम कर आए हैं तो हमें अवश्य बताएं कि उस शहर ने आपको अपनी गाथा कैसे सुनाई.

– माँ जीवन शैफाली

लोगों से बाद में, शहर और उसकी हर चीज़ से पहले प्यार करिए…

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