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Thyroid : माया को गलमाया मत बनाइये

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जैसे हर गोपी को कृष्ण अपने साथ रास करते दिखाई देते थे वैसे ही Thyroid का हव्वा इस तरह से फैलाया गया है कि हर स्त्री को अपने छोटे मोटे हार्मोनल बदलाव भी थाइरोइड होने की आशंका से घेर लेता है.

एक बार आपने उस बीमारी को याद किया कि उसका होना तय है क्योंकि स्त्री अपने साथ होने वाली बीमारियों को लेकर इतनी गहनता से जुड़ जाती हैं कि वो एक तरह से इस बीमारी का आह्वान कर रही होती है.

मैं यह नहीं कह रही कि ऐसा वे जानबूझकर कर रही हैं लेकिन महिलाएं आत्मपीड़ा में बहुत सुख अनुभव करती हैं. मेरी एक परिचित महिला थीं, उन्हें गठिया रोग हो गया था, ना ज़मीन पर बैठ पाती थीं, ना ठीक से चल पाती थीं.

कहीं भी आना जाना होता तो बड़े गर्व और खुशी से कहती मेरे लिए एक कुर्सी का बंदोबस्त कर दीजिये, मैं ज़मीन पर थोड़ी ना बैठ पाती हूँ, मैं जहाँ जाती हूँ मेरे लिए अलग बैठने का बंदोबस्त किया जाता है, और हाँ खाना भी थाली में अगल से मुझे परोसकर दे देना है क्योंकि मैं ठीक से चल के खाना हाथ से ले ना सकूंगी.

वो इस बीमारी की भयंकर पीड़ा से जूझ रही थी, लेकिन उस बीमारी से इतना अधिक लगाव हो गया था कि दर्जनों डॉक्टर, वैद्य के पास जाने के बाद भी वो कभी ठीक ना हो सकी. मैं खुद कई महीनों तक शहर से दूर वैद्य से इलाज के लिए उनके साथ जाती रही… लेकिन बीमारी ने दस पंद्रह वर्षों में उनके शरीर पर ही नहीं अवचेतन मन पर भी जड़ें जमा ली थी…. जो उन्हें कभी ठीक न होने के लिए उकसाती रहती… इसलिए वो खाने पीने की चीज़ों और अन्य ऐसी आदतों से मोह नहीं छोड़ पाई जो उनकी इस बीमारी को बढ़ा रही थीं.

बल्कि उनकी छोटी बहन जो इसी बीमारी से ग्रस्त थी, उसने इस बीमारी से बहुत जल्दी छुटकारा पा लिया क्योंकि उसे किसी भी काम के लिए किसी और का मोहताज होना पसंद नहीं था.

क्या आप जानते हैं Thyroid को गलमाया (गले का रोग) भी कहते हैं. तो Thyroid एक तरह से सिर्फ माया है जिसमें आप जितना रस लेंगे उतना उलझते जाएंगे, यह माया, आपके लिए गलमाया न बन जाए इसका ख्याल रखिये. ये नाग, जैसे ही अपना फन उठाए अपने पैर से अर्थात संकल्प शक्ति से कुचल डालिए. अपने आभा मंडल को इतना मजबूत कीजिये कि कोई भी बीमारी आपके पास आने से घबराए.

कहते हैं ना आदत बुरी बला. वैसे ही बीमारी भी एक बुरी बला है. इस बीमारी का हव्वा इतनी बुरी तरह से फ़ैल चुका है कि सद्गुरु जैसे आध्यात्मिक पुरुष के पास भी लोग अपनी आध्यात्मिक शंका या परमात्मा के विषय में पूछने के बजाय Thyroid के बारे में पूछ रहे हैं, जिसके बारे में पिछले अंक में सद्गुरु का एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया था. उसका लिंक लेख के अंत में दे रही हूँ.

Thyroid के बारे में और भी कई लेख प्रकाशित किये हैं, जिसके लिंक्स मैं नीचे दे रही हूँ. अपने शरीर को स्वस्थ, चुस्त और दुरुस्त रखिये, आलस्य के गुलाम मत बनिये.

ईश्वर ने सिर्फ चेतनाओं को जन्म नहीं दिया उसके प्रकटीकरण के लिए देह भी बनाई तो उसका भी कुछ विशेष उद्देश्य होगा. अपने जीवन के लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, तो बीमारियाँ अपने आप कोसो दूर भागेंगी.

और कवियित्री राजेश जोशी जो खुद कैंसर से जीतकर आई हैं, कहती हैं थाइरॉइड ही नहीं कैंसर भी एक माया है – लीजिये प्रस्तुत है कैंसर पर उनकी दिल को छू जाने वाली कविता….

 

 

 

 

कोई एक बात किसी की कही जब रुला जाती है ढेरों ढेरों कभी
तो वह एक बात ही कहाँ होती है
उसके पीछे छिपी होती हैं कई ऐसी अनकही बातें
जो आप सुन लेते हो
रोना एक बात का रोना नहीं होता
एक ही बात से कहाँ बिखरते हैं रिश्ते
उम्र भर की राख से उठती हैं चिंगारियां

कोई वक़्त था जब दर्द का मतलब सर दर्द या पेट दर्द
या फिर ऐसा ही कोई दर्द हुआ करता था
जब सच में हुआ दर्द तो दर्द के मायने ही बदल गए
कभी किसी लंबे दर्द के बीच
जब कोई अंतराल आता है दर्द रहित
कोई अंग हो जाता है दर्द से जुदा
तो आप टटोल के देखते हो
वो अंग ज़िंदा भी है कि नहीं

कैंसर हो जाने का मतलब नहीं होता अमूमन
मौत से ख़ौफ़ज़दा हो जाना
मौत तो राहत होती है
दर्द से, तकलीफ से, दवाओं से
खून देने, निकालने वाली सूईओं से

खौफ तो होता है ज़िंदगी की आँख में आँख डाल के देखने का
हाथ में हाथ डाल चलने का
अपने काले घने बाल उड़ जाने का
अपनी त्वचा काली पड़ जाने का
किसी अपने का साथ छोड़जाने का

हमेशा तलवार की धार पे पाँव रख चलना
कभी सांस न आना और नहाते नहाते गुसलखाने से बाहर भागना
या फिर बस की, कार की खिड़की खोल
अपना मुहँ बाहर कर देना
खाने को देखना और खा न पाना
अपने आंसू छुपाना और मंद मंद मुस्कुराना

न जाने लड़ाई कितनी लंबी हो
न जाने कब क्या हो जाए
हर पल एक नई आज़माईश
हर पल मौत को साथ साथ चलते देखना
मन ही मन स्वयं इच्छित मौत के ख़्वाब देखना
दर्द रहित, शांत

कैन्सर का मतलब मौत के अलावा और भी बहुत कुछ होता है
मौत तो आनी ही है
वो तो फ़रिश्ता है

कैन्सर का मतलब नयी ताक़त का आगाज़ भी है
कितने अपने प्यारों का प्यार भी है
ख़ुद के साथ कैसे जीते है यह आभास भी है
यही इक लम्हा है ज़िंदगी यह अहसास भी है
कि कैन्सर ऐल्कमिस्ट भी बन जाता है
आप जल जल के नए होते जाते हो
ख़ुद से मिलते हो ख़ुद से ऊपर उठते हो
हर साँस के लिए शुकराना
हर राहत के लिए बंदग़ी

इक कैटलिस्ट होता है कैन्सर
ज़िंदगी की राह ही बदल देता है
या फिर यूँ कह लो
Another way of being
Equally good equally beautiful
But sometimes much more painful

कदाचित आज के डॉक्टर्स मेरी इस बात से नाराज़ हो सकते हैं लेकिन मुझे लगता है हर रोग एक माया ही है… पहले गुरु, शिष्य के आत्मिक स्वास्थ्य पर काम करते थे कि किसी की चेतना को अधिक से अधिक रोगमुक्त कर कैसे उसकी आध्यात्मिक उन्नति की जाए…. फिर इस पर शिक्षा प्रारम्भ हुई तो वैद्य शरीर तल पर आए, तब भी सिर्फ नाड़ी देखकर, साँसों की आवाजाही की गति देखकर, आँखें देखकर या साँसों की गंध सूंघकर इलाज किया जाता था….

जैसे जैसे विज्ञान ने तरक्की की हम चेतना से शरीर तल पर आते गए… अब तो मामूली बुखार में भी बड़े बड़े टेस्ट करवाने पड़ते हैं, भारी भारी एंटी बायोटिक खाना पड़ती है.

सेहत और इलाज की दृष्टि से विज्ञान जितनी तरक्की करता गया हम उतने अधिक रुग्ण होते गए, हमारी प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता ख़त्म होती चली गयी. इसके पहले की बीमारी हम पर जीत हासिल कर ले, अपने स्वास्थ्य को वापस पा लीजिये.

आपका शरीर स्वयं इतना सक्षम है कि जब तक कोई बाहरी आघात न हो, हर किस्म के अंदरूनी रोग से वो खुद लड़ सकता है बशर्ते आपकी दिनचर्या आपको चेतना स्तर पर स्वस्थ रखने जितनी कारगर हो.

और चेतना को स्वस्थ रखने के बहुत सारे उपाय मैं पहले भी बता चुकी हूँ… जिसकी लिंक्स नीचे दे रही हूँ… मुझे बार बार स्वास्थ्य को लेकर आपको सचेत करना पड़ता है क्योंकि एक स्वस्थ आत्मा स्वस्थ शरीर में ही वास करती है.

– माँ जीवन शैफाली

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