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Tag: Yogi Anurag

इतिहास के पन्नों से : उमर ख़य्याम, एक आशिक़ की कहानी ऐसी भी!

ये ग्यारहवीं सदी की बात है। उनदिनों इस्लाम पर “अब्बासी” वंश की ख़लीफ़ाई थी। एक रोज़, ख़लीफ़ा के दरबार की चर्चाओं में सामने आया, हुज़ूर, एक नामुराद ने अपनी आशिक़ी में ऐसी रुबाई लिख दी है, जिसमें उसकी महबूबा के गाल के तिल पर आपका समरकंद-ओ-बुख़ार भी कुर्बान कर दिया गया है! ख़लीफ़ा ने विषैले […]

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तरानों से झांकते प्रेमप्रश्न

तरानों का संसार प्रेमियों का प्रकाश-लोक है. एक ऐसा लोक, जहाँ उनके सभी प्रश्नों के काव्यात्मक उत्तर रहते हैं. मसलन, प्रेमिका को पूछना हो कि जब हमारा साहचर्य नहीं होता तो आप क्या करते हैं? तो बरबस ही, स्मरण के किसी कोने में एक तराना चहक जाता है : “क्या करते थे साजना, तुम हमसे […]

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रुद्राक्ष

“रुद्राक्ष” के विषय में प्रसिद्ध उक्ति है : “रुद्राक्ष धारयेद्बुध:”। [ अर्थात् ज्ञानीजनों को रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। ] जहाँ “रुद्राक्ष” की चर्चा होती है, वहां धर्म और विज्ञान एक दूसरे से भिन्न हो जाते हैं! विज्ञान कहता है : “पहाड़ों व पठारों पर समुद्र तल से क़रीब दो हज़ार मीटर तक पाए जाने वाले […]

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द क्वीन ऑफ़ चैस!

उसका नाम रहने ही दीजिए, “क्वीन” काफ़ी नहीं? बहरहाल, उसका नाम था : गुंजन। बड़ी बड़ी काली सफ़ेद गोटियों-सी आखें, चौकोर सा कोमल मुख, आक्रामक भाव-भंगिमाएँ और ढेर सारी बातें। कुल मिला कर ठीक वैसी ही थी मानो संगमरमर के शतरंज की “क्वीन” उठ कर मानव रूप में आ गयी हो! लड़के के कॉलेज से […]

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तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!

“तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!” ये श्री केदारनाथ सिंह हैं, और बड़े दिनों से इस कविता को गुनगुनाते हुए मेरे हृदय में बह रहे हैं। वही केदार, जिनके लिए “जाना” हिंदी की ख़ौफ़नाक क्रिया थी! वही केदारनाथ, जो स्वयं को नदियों में चम्बल और सर्दियों में बुढ़िया का कम्बल कहते थे! […]

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