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Tag: Story

बाल साहित्य : चीकू की बुद्धिमानी

नीकू चीकू चंपकवन के बहुत प्यारे खरगोश थे। दोनों एक दूसरे के लंगोटिया यार थे और एक दूसरे पर जान छिड़कते थे। पूरे चंपक वन में वो कभी किसी को अकेले नहीं दिखते थे। जहाँ भी जाते एक दूसरे के गले में हाथ डाले पंहुच जाते। नीकू थोड़ा गंभीर और बेहद सीधा सादा और कुछ […]

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परी : वास्तविक घटना पर आधारित एक काल्पनिक कहानी

(1) कुछ रिश्ते खून के होते हैं, कुछ रिश्ते समाज में रहते हुए संबोधन के होते हैं और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो ज़हन में उगते रहते हैं, उनका कोई नाम नहीं होता लेकिन उसकी खुशबू आपकी आँखों से बरसकर मुस्कान में मिलकर हाथों के ज़रिये किसी के माथे को छूती है, तो बरसों […]

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वह अजीब स्त्री : ज़िन्दा स्त्री को अफॉर्ड करना हर पुरुष के वश का नहीं

लोग बताते हैं कि जवानी में वह बहुत सुन्दर स्त्री थी। हर कोई पा लेने की ज़िद के साथ उसके पीछे लगा था। लेकिन शादी उसने एक बहुत साधारण इंसान से की, जिसका ना धर्म मेल खाता था, ना कल्चर। वह सुन्दर भी खास नहीं था और कमाता भी खास नहीं था। बहुत बड़े, रसूखदार […]

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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

आज आपको आँखों सुनी और कानों देखी बात बताने जा रहा हूँ। जी हाँ! आपने सही देखा। अगर सुनने का साहस हो और तपाक से प्रतिउत्तर न देने की आदत हो तभी आगे पढ़े। ये मार्मिक वृतांत एक बुजुर्ग शख़्स के बारे में है, उनका नाम ‘कृष्ण लाल शर्मा’ है। इंदौर के शीतल नगर में […]

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ए माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी

भैया.. मां कैसी दिखती होगी.. क्या तुझे याद है”? ‘भैया.. मां होती तो कितना अच्छा होता ना.. यूं खाना खाने को चाची की तरफ तो ना जाना होता..” हां ..छोटे.. “भैया.. देखा ना चाची कैसे घूरती मुझे खाते देख के.” थोड़ा पहले चला जाऊं तो हाथ नचा के बोलती है.. अभी ना बना खाना.. चल […]

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अनोखा रिश्ता

उन दोनों को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि दोनों की उम्र में 8 साल का अंतर है और जिस तरह दोनों हमेशा साथ घूमते दिखाई देते थे, साथ फिल्म देखने जाते, साथ रेस्टोरेंट में खाना खाने जाते, कोई अंदाज़ा नहीं लगा पाता था कि आखिर दोनों में रिश्ता क्या है. शिक्षा जब कॉलेज […]

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मानो या ना मानो : वामांगी-उत्सव पुनर्जन्म एक प्रेमकथा

वामांगी, जिसका ज़िक्र पहले आता है उसके बाद आती है वह.. पैरों की ऊंगलियों के नाखून बढ़ाकर रखती है, लेकिन उस पर महावर नहीं होता, बाकी उसके महावर से रंगे पाँव जहाँ जहाँ पड़ते हैं रास्ता गुलाबी हो जाता है। पैरों में पायल नहीं बस काला धागा डाले रहती है, जैसे नदी के दुधिया पानी […]

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बहुरुपिया और प्रतीक्षा का फल

एक ही कथानक पर दो कहानियां! दोनों में समानता और इस हद तक समानता कि शायद एक दूसरे का एक्सटेंशन कही जाए. हंस पत्रिका के इस अंक में कहानीकार प्रियदर्शन की कहानी ‘प्रतीक्षा का फल’ और जनवरी 2018 से समालोचन ब्लॉग पर उपस्थित कहानीकार राकेश बिहारी की कहानी ‘बहुरूपिया’, दोनों ही कथानक के स्तर पर […]

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