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Tag: Rajesh Joshi

किताबों की दुनिया

कवियित्री राजेश जोशी की ‘ब्रह्माण्ड का नृत्य’ संग्रह की कई रचनाओं को पढ़ते हुए मैंने महसूस किया जैसे संवेदनशील लोगों में यह फैलती चली जाएँगी और हर एक तक उसको, उसकी सी बातें कहेंगी. जैसे एक जंगल में भटका हुआ बनमाली जंगली फूलों की लताओं से प्रेम करने लगा हो और लताओं से उसकी होने […]

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ब्रह्माण्ड बहुत ही प्यारा दोस्त है मेरा

हस्पताल के गलियारे में बैठी थी। अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। ब्लड टेस्ट तो हो चुका था पर डॉक्टर अभी किसी और मरीज़ के साथ मशगूल थी। एकाएक मन को न जाने क्या हुआ, अब मन है तो अपनी मर्ज़ी से उड़ने लगता है, पूछता थोड़ी न है। विचार तितलियों की तरह मँडराने […]

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Your Vibe Attracts Your Tribe

वो डोसा हट से बाहर निकली। वॉकर के साथ चल रही थी। बूढ़ी थी। अब बूढ़े होने की कोई परिभाषा तो है नहीं। कोई पचास पर भी बूढ़ा लग सकता है तो कोई सत्तर पर भी जवान। और अगर देह सही चल रही हो, सेहतमंद हो तो दिल तो हमेशा ही जवान महसूस करता है। […]

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फ़ादर्स डे : एक था बचपन, बचपन के एक बाबूजी थे

फादर्स डे के बहाने… अपने पापा के साथ मैं बहुत दोस्ताना नहीं हूँ. पिता-पुत्र के संबंधों की प्रचलित गरिमा हमारे बीच मौजूद है. पापा से मुझे कुछ कहना होता है तो माँ जरिया बनती है और यही स्थिति पापा की भी है. हालांकि, अब कई बार संवाद सेतु की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन स्थिति […]

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गुड्डी मिली? : किरदार के भीतर और बाहर की दुनिया

जीवन में घटने वाली हर महत्वपूर्ण घटना एक फिल्म के समान होती है जिसकी स्क्रिप्ट नियति द्वारा पहले से लिख दी गयी है, साथ में आपका किरदार भी. अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपना वास्तविक चरित्र उसमें लाए बिना उस किरदार को अपने अभिनय से कितना सशक्त बनाते हो. बावजूद इसके […]

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Thyroid : माया को गलमाया मत बनाइये

जैसे हर गोपी को कृष्ण अपने साथ रास करते दिखाई देते थे वैसे ही Thyroid का हव्वा इस तरह से फैलाया गया है कि हर स्त्री को अपने छोटे मोटे हार्मोनल बदलाव भी थाइरोइड होने की आशंका से घेर लेता है. एक बार आपने उस बीमारी को याद किया कि उसका होना तय है क्योंकि […]

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कालबेलिया : नागलोक की परियों का धरती पर नृत्य

काला रंग मुझे हमेशा से आकर्षित करता है. कहते हैं काला रंग काला इसलिए है क्योंकि वो सारे रंगों को सोख लेता है, परावर्तित नहीं करता… तो इन नागलोक की परियों ने भी जैसे जीवन के सारे रंग सोख लिए हैं, और फिर इनको लिए जब गोल घूमती हैं तो लगता है जैसे इनसे निकलकर […]

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मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी…

1. इस मैं को शुक्रगुज़ार हूँ मैं वो मेरा मैं ही है जो एक वृहद् रूप लेता है अहं वाला मैं नहीं ब्रह्माण्डीय मैं जो शिव बनता है, ब्रह्मा बनता है हर चाह बिना चाहे पूरी करता है जो मेरा महबूब बनता है मेरा इश्क़, मेरा आशिक़ बनता है कि यह मेरा ही है अक्स […]

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