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Tag: Poem

यात्रा : अंतिम यात्रा पर पहला क़दम

यात्रा और पड़ाव यात्रा प्रेम एवरेस्ट पर्वत पर चढ़ना तो था नहीं कि इस बार मैं नेपाल से न होकर तिब्बत से चढ़ना शुरु करता. प्रेम किसी रोमांचक कहानी को गढ़ना भी नहीं था कि मैं पूरा परिवेश और सारे पात्र ही बदल डालता. इस बार प्रेम सवारी गाड़ी की स्लीपर क्लास में होने वाली […]

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ओमुआमुआ : वह अतीत का अग्रदूत!

अंतरिक्ष मेरे लिए हमेशा से बहुत रहस्मयी रहा है, बचपन से ही रात के आसमान को तकने की आदत रही है…. बहुत सारे ऐसे अद्भुत दृश्य बिना टेलिस्कोप के देखे हैं, लगता था जैसे कोई सिनेमा के परदे पर उभरता दृश्य देख रही हूँ… कभी लिखा था यह – अवकाश का आकाश “पहला नियम …. […]

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एक कवि और उनकी कविताएं : दुष्यन्त कुमार

कुण्ठा मेरी कुण्ठा रेशम के कीड़ों सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ’ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुण्ठा – क्वांरी कुन्ती। बाहर आने दूँ तो लोक-लाज मर्यादा भीतर रहने दूँ तो घुटन, सहन से ज्यादा, मेरा यह व्यक्तित्व सिमटने पर आमादा। प्रसव-काल है! […]

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मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी…

1. इस मैं को शुक्रगुज़ार हूँ मैं वो मेरा मैं ही है जो एक वृहद् रूप लेता है अहं वाला मैं नहीं ब्रह्माण्डीय मैं जो शिव बनता है, ब्रह्मा बनता है हर चाह बिना चाहे पूरी करता है जो मेरा महबूब बनता है मेरा इश्क़, मेरा आशिक़ बनता है कि यह मेरा ही है अक्स […]

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तुम्हारा दिल या हमारा दिल है…

प्रतीक्षा चिरनिरन्तर है. वह प्रतीक्षा ही कैसी जो विरत हो जाये? प्रतीक्षा प्रारंभ होती है कभी समाप्त नहीं होने के लिए! प्रतीक्षा रोती है कलपती है लेकिन थकती नहीं! प्रतीक्षा मोजड़ी में अनवरत चलने के घाव दे के आह को नित्य नव्य बना देती है! प्रतीक्षा ऊपरी सतह से समतल राह सी दिखती है लेकिन […]

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हसरत है धूपिया रंग की शिफॉन में चाँद छू लेने की!

साड़ियों से इश्क़ उम्र के दूसरे दशक में हुआ फिर वक्त के साथ परवान चढ़ा.. साड़ी पहन कर मिजाज़ आशिकाना हो जाता लगता रिमझिम फुहारों से भरी हवायें हैं! घर से निकलने का एक आकर्षण ये होता कि कोई गुनगुनी सी साड़ी पहनेंगे और उसके आँचल में हर मौसम ठहरा लेंगे!! आहिस्ता आहिस्ता साड़ी की […]

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