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Tag: Osman Mir

तन नुं बनावे तम्बूर अने मन ना करे मंजीरा, तो तमे मानजो के ए हशे, राधा ने कां मीरा

एक राधा, एक मीरा दोनों ने श्याम को चाहाअन्तर क्या दोनों की चाह में बोलोइक प्रेम दीवानी, इक दरस दीवानी राधा ने मधुबन में ढूँढामीरा ने मन में पायाराधा जिसे खो बैठीवो गोविन्द और दरस दिखायाएक मुरली एक पायल, एक पगली, एक घायलअन्तर क्या दोनों की प्रीत में बोलोएक सूरत लुभानी, एक मूरत लुभानीइक प्रेम […]

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हे री सखी मंगल गावो री, धरती अम्बर सजावो री, आज उतरेगी पी की सवारी

व्यवस्था चाहे आध्यात्मिक हो या सामाजिक… जब जब व्यवस्था और प्रेम में से किसी एक को चुनने का मौका आया मैंने सारी व्यवस्थाओं को ताक पर रखकर प्रेम को चुना…. ऐसा भी नहीं है कि मैंने व्यवस्था को चुनने का प्रयास नहीं किया, किया लेकिन उसमें हमेशा एक भय व्याप्त रहा… भय किसी वस्तु का […]

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