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Tag: Kathopnishad

शरीर साधन है : पुरुष, जिस पुर में परमात्मा बसा है

शरीर को दोष देने वाला बिलकुल निर्बुद्धि है. उपनिषद की इस धारणा को समझकर, आप इस सूत्र में प्रवेश करें. सरल विशुद्ध ज्ञानस्वरूप अजन्मा परमेश्वर का ग्यारह द्वारों वाला मनुष्य शरीर नगर है, पुर है. इसलिए हमने मनुष्य को पुरुष कहा है. पुरुष का अर्थ है जिसके भीतर, जिस पुर में परमात्मा बसा है, जिस […]

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