स्वामी रामानंद, कबीर और वामपंथी षडयंत्र

हमने जब इतिहास पढ़ना शुरू किया तो भक्ति काल और धार्मिक आंदोलन की भूमिका में यदा-कदा स्वामी रामानंद के बारे में एक-आध पंक्तियां पढीं । जहां तक मेरी स्मृति साथ देती है, मैंने इससे अधिक उनके बारे में नहीं पढ़ा ।

फिर कुछ वर्ष बीत गए । इस दौरान इतिहास को और सुसंस्कारित किया गया! और गंगा-जमनी इतिहास और संस्कृति के रूप में हम पर लादा गया । लिहाज़ा, अब जो इतिहास हम पढ़ रहे हैं उसमें रामानंद पर लिखीं वो पंक्तियां भी मिटाई जा चुकी हैं। लगभग संपूर्ण भारतीय इतिहास, वांग्मय, भक्ति आंदोलन से उन्हें हटा दिया गया है। अब जो है सो कबीर का है, रविदास का है। तुलसी षड़यंत्रकारी हैं और रामानंद ब्राह्मणवादी संत हैं जिनका कबीर और रैदास से कोई लेनादेना नहीं है!

परंतु, मैं यह सोचता हूं कि अगर उनका प्रादुर्भाव न हुआ होता तो मध्यकाल में हिन्दुओं की क्या स्थिति रही होती? उस काल में राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक तौर पर तो भारत की रीढ़ झुका दी गई थी, जिसे स्वामी रामानंद ने अपनी चमत्कारिक उपस्थिति से सीधा कर दिया। उत्तर में हिन्दू धार्मिक गौरव का जो ध्वजदंड मलिन होकर मुरझा गया था, वह पुन: उनकी ही शक्ति से लहराया था, उस पताका को आनंद के पुर में ले जाने वाले महान योद्धासंत रामानंद ही थे।

स्वामी रामानंद के बारे में जो तत्कालीन संदर्भ ग्रंथ मिलते हैं। उससे यही पता चलता है कि उनका प्राकट्य प्रयाग के पुण्य सदन शर्मा के घर हुआ था। माता का नाम सुशीला था। वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। बचपन में शिक्षा-दीक्षा के लिए राघवानंद स्वामी के आश्रम में भेजे गए। कुछ ही वर्षों में अपनी विलक्षण मेधा से वे पंडित हुए और भारत तीर्थ पर निकले। यह उनके जीवन की सबसे निर्णायक घटना है। तीर्थयात्रा के दौरान ही उन्होंने भारत की दरिद्रता, उसका सामाजिक विखंडन और धार्मिक पतन देखा। मातृभूमि की दारुण अवस्था देखकर वे द्रवित हुए और आश्रम लौटने के बाद उन्होंने अपने लिए नए मार्ग का चुनाव किया। हालांकि जनश्रुति तो यह भी है कि गुरुभाइयों ने उनके साथ भोजन आदि ग्रहण करने से मना कर दिया, क्योंकि वे भिन्न-भिन्न लोगों के साथ उठ बैठकर आए थे।

अगस्त्य संहिता में लिखा है-रामानंद: स्वयं राम: प्रदुर्भूतो महीतले! तो, जो स्वयं राम के अवतारी थे वे भला इस क्षुद्रभाव में कहां अंटते। उन्होंने अपना पंथ बनाया और सूत्र दिया, जाति पांति पूछै नहि कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।

उऩके प्रसिद्ध ग्रंथ वैष्णवमताब्जभास्कर का सूत्रवाक्य है, सर्वे प्रपत्तेर्धिकारणो मता:। अर्थात, प्रपत्तिभाव या शरणागति का अधिकार सबको बराबर है, वहां जात-पात का कोई मोल नहीं है। कहा जाता है कि उन्होंने श्रीराम नाम का तारक मंत्र एक पेड़ पर चढ़ कर दिया था ताकि सभी दिशाओं में उसका प्रसार हो सके। इस तरह से उन्होंने देश की अलग-अलग जातियों से हजारों शिष्य बनाए। उनके बनाए बारह शिष्य तो भक्ति आंदोलन के बड़े प्रसिद्ध संत हैं। जिन्हें द्वादश महाभागवत कहा जाता है। अनंतानंद, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद, योगानंद, संत पीपा, धन्ना, कबीर, रविदास संत, सेन पद्मावती, सुरसरि और गंगा। गंगा तो वेश्या थीं।

रामानंद ने अपने भाष्यग्रंथ श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर में लिखा है :
प्राप्तुं परां सिद्धिमकिंचनो जनो द्विजातिरिच्छन शरणं हरिं व्रजेत
परं दयालुं स्वगुणानपेक्षितक्रियाकलापादिक जाति बन्धनम ।।

अर्थात सिद्धिप्राप्ति के लिए धन का कोई महत्व नहीं है। जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह किसी भी जाति, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हरि की शरण में जाने का अधिकारी है। कर्मकांड और जाति बंधन का कोई अर्थ ही नहीं है। बल्कि वे तो यहां तक कहते हैं कि पंचायुध चिह्न में से कोई एक चिह्न धारण करने वाला किसी भी जाति का व्यक्ति साक्षात विष्णु रूप है। वह जगत में पवित्र से पवित्र वस्तु को भी पावन करता है।

पंचायुधांकांकितवैष्णवा ये विप्रा अथ क्षत्रिय वैष्यशूद्रा:
स्त्रियस्तथान्येपि च विष्णुरूपा जगत्पवित्रप्रपवित्रिणस्ते ।।
स्वामी जी ने भक्ति के द्वार शक्त-अशक्त, संपन्न –विपन्न, शिक्षित-निरक्षर, ब्राह्मण-शूद्र, राजा-रंक, स्त्री-चाण्डाल सबके लिए खोल दिए।

भक्ति आंदोलन की भूमिका में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है: “ देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए अवकाश न रह गया। उसके सामने ही देवमंदिर गिराए जाते थे, देवमूर्तियां तोड़ी जाती थीं और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी नहीं कर सकते थे। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की भक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त मार्ग ही क्या था..।‘’

हालांकि, शुक्ल जी की धारा से अलग चलने वाले साहित्यकार और विचारक इस मत का खंडन करते हैं और दक्षिण में चल रहे भक्ति आंदोलन का उदाहरण देते हैं। परंतु, यह तो साधारण समझ की बात है कि हताश और हारा हुआ मनुष्य भगवान के पास ही जाता है। उत्तर में भक्ति आंदोलन के अभ्युदय की सामाजिक, धार्मिक पृष्ठभूमि जो भी रही हो उस काल की पराधीनता को इससे विलग कर के नहीं देखा जा सकता।

बहरहाल, सवाल स्वामी रामानंद की भक्ति धारा और उनके अवदान का है, जिसे पूरी तरह से भुला दिया गया है। अब देखिए कि स्वामी रामानंद ने किन्हें शिष्य बनाया। और उनका जीवन-कर्म क्या है।
स्वामी जी ने चमड़े का काम करने वाले रैदास को स्वामी रविदास बनाया। रविदास ने मीराबाई को गुरुमंत्र दिया। यहां इस प्रचलित मत का भी खंडन हो जाता है कि हिन्दू धर्म में कथित छोटी जाति का बड़ा भयंकर निरादर होता था. अगर ऐसा होता तो मीरा जैसी कुलीन राजपूतानी सैकड़ों मील की यात्रा कर रैदास के चरणों में अपना शीश न झुकाने न जातीं। जाति या छुआछूत का रोग इस्लामजन्य है, जिस पर कभी और प्रकाश डाला जाएगा।

रैदास के अलावा, मुसलमान जुलाहा जाति के कबीर उनके ही शिष्य थे। आज पूरा देश संत कबीर के रूप में उन्हें मानता है। आज कबीर पंथियों की संख्या पंद्रह करोड़ से भी ज्यादा है। स्वयं कबीर कहते हैं, कासी में परगट भये, रामानंद चेताए। केश काटने वाले सेन महात्मा सेन हुए। कसाई वृत्ति से जीवन यापन करने वाले धन्ना जाट पूज्य संत बने। गुरुग्रंथ साहब में रामानंद के द्वादशमहाभागवत का उल्लेख है और इन सभी संतों कवियों की वाणी है।

कबीर पर सबसे विलक्षण पुस्तक लिखने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- ‘’रामानंद प्रवर्तित रामभक्ति धारा कबीर में एक रूप धारण करती है और तुलसीदास में दूसरा रूप।‘’

आचार्य द्विवेदी आगे लिखते हैं… ‘’कबीर का पाठक जानता है कि कबीर के पदों में उसे कौन सी अनन्य साधारण बात मिलती है, जो कहीं और नहीं मिलती। वह क्या है.. फिर वह वस्तु भी क्या है जिसे रामानंद से पाकर कबीर जैसा मस्तमौला फक्कड़ हमेशा के लिए उनका कृतज्ञ हो गया। दोनों का एक ही उत्तर है, वह बात भक्ति थी। भक्ति भी किसकी, राम की। रामनाम रामानंद का अद्वितीय दान था। इस परमाद्भुत रत्न को पाकर कबीर कृतकृत्य रहे।‘’

आश्चर्य तो यह है कि वामपंथी कहते हैं कि वैष्णवमताब्जभास्कर के रचयिता और ब्राह्मण संत रामानंद तो कबीर के गुरु थे ही नहीं। जबकि उनके बौद्धिक पिता और प्रकांड विद्वान आचार्य रामानंद और कबीर के संबंध पर मुदित हैं। वामपंथ का मत है कि कबीर के रामानंद एक भिन्न व्यक्ति थे। इस भिन्न रामानंद का उल्लेख भारतीय संदर्भ ग्रंथों में नहीं मिलता। रामानंदी संप्रदाय की सभी शाखाएं इस फर्जीवाड़े का उपहास करती हैं। आज भी वहां स्वामी रामानंद का प्राकट्योत्सव धूम से मनाया जाता है। स्वयं कबीर कह चुके हैं कि रामानंद चेताए! आगे फिर वे कहते हैं—पीछे लागा जाई था, लोकबेद का साथी, आगे थैं सद्गुरु मिल्या दीपक दीया हाथी। या फिर, सतगुरु मैं बलिहारी तोर, जिन्ही सकल विकट भ्रम काटे मोर, रामानंद स्वामी रमत ब्रह्म गुरु के सबद काटै कोटि क्रम्म..।

स्वयं कबीर, जिन्हें नामवर सिंह वाणी का डिक्टेटर कहते हैं, जो बड़े से बड़ा दार्शनिक मत खंडित करते हैं, जो पंडित, मोमिन, पादरी सब पर समान भाव से प्रहार करते हैं, वही राम के आगे नतमस्तक हो जाते हैं:
कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाऊं
गलै राम की जेवड़ी जित खैंचे तित जाऊं
तो तो करै तो वाहुड़ों, दुरि-दुरि करै तो जाऊं
ज्यौं हरि राखै त्यौं रहूं जे देवै से खाऊं

इसे पढ़ने के बाद तो यह बात सिद्ध ही हो जाती है कि रामनाम की अनन्य भक्ति का भाव रामानंद ने ही उनके मन में भरा। यहां आकर तो कबीर और तुलसी एक हो जाते हैं, जेहि बिधी राखे राम और ज्यौं हरि राखे त्यौं रहूं में क्या अंतर है? जो वाणी का डिक्टेटर स्वयं को राम का कुत्ता कहे, उससे बड़ा रामभक्त वैष्णव कौन है? और उनमें यह

वैष्णव भक्ति की धारा भरने वाला सदगुरु कौन है?

कबीर और रामानंद के संबंध अन्यत्र भी वर्णित हैं। प्रसिद्ध विद्वान रामकुमार वर्मा ने अपनी पुस्तक कबीर की भूमिका में लिखा है: “’ नाभादास की भक्तमाल की टीका में कबीर का जीवनवृत्त मिलता है, जहां भक्तमाल की टीका का समर्थन किया गया है कि कबीर रामानंद के शिष्य थे ।‘’ रामकुमार वर्मा के अनुसार, कबीर ने विस्तारपूर्वक जिस गुरु की वंदना की है, वे रामानंद ही थे। उन्होंने लिखा है,सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दाबिस्तान का लेखक मोहसिन फानी 1670 में कबीर को रामानंद का शिष्य बतलाते हुए लिखता है, जन्म से जुलाहे कबीर, जो ब्रह्मैक्य में विश्वास रखने वाले हिन्दुओं में मान्य थे, एक वैरागी थे।
कबीर के काव्य पर दृष्टिपात करने से यह पता चल जाता है कि उन पर वैष्णव कवि, संतों का जबरदस्त प्रभाव है और यह प्रभाव स्वामी रामानंद का ही है। क्योंकि उस कालखंड में दूसरा कोई संत नहीं जो देसी बानी बोली में अपनी बातें कहते थे और एक बड़े भूभाग में समादृत थे। निश्चय ही कबीर पर यह प्रभाव रामानुज, निम्बार्क या माध्व का नहीं था, क्योंकि कबीर संस्कृत के पंडित नहीं थे। ये सभी संस्कृत भाषा में ही अपने दर्शन की स्थापन कर चुके थे।

आधुनिक हिन्दी के महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी प्रसिद्ध कविता तुलसीदास में कवि तुलसीदास के मोहभंग का जो वर्णन किया है, उसे पढ़िए-
कल्मषोत्सार कवि के दुर्दम
चेतनोर्मियों के प्राण प्रथम
वह रुद्धद्वार का छाया-तम तरने को
करने को ज्ञानोद्धत प्रहार
तोड़ने को विषम वज्रद्वार
उमड़े भारत का भ्रम अपार हरने को..

आखिर तुलसीदास कौन सा भ्रम हरने को उमड़े? इस्लाम के आक्रमण के पश्चात इसी कविता में देश-काल का वर्णन करते हुए वे कह चुके हैं, है ऊर्मिल जल निश्चलत्प्राण पर शतदल! अर्थात जलधारा की ऊर्मियां तो हैं लेकिन सांस्कृतिक शतदल का प्राण निश्चल है। कवि निराला अपने आराध्य कवि को सांस्कृतिक नायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं परंतु तुलसी से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व यह काम तो रामानंद प्रारंभ कर चुके थे, जिसकी पूर्णाहुति तुलसी के समय होती है। तुलसी पर रामानंद के प्रभाव की स्पष्ट छाप है। स्वामी रामानंद की प्रसिद्ध आरती.. आरति की जै हनुमान लला की… को पढ़ते हुए सहज ही यह विचार आता है कि यह तो तुलसीदास रचित है। दोनों ही राम के अनन्य भक्त हैं, दोनों जात-पात, छुआछूत के बंधनों पर वज्र प्रहार करते हैं। दोनों राम को आम हिन्दू जीवन में स्थापित करते हैं। तो, इस सत्य को इन्कार करना सभंव नहीं है कि भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक आकाश पर जो भ्रम छाया था उसे हरने वाले पहले व्यक्ति रामानंद ही थे।

रामानंद की शक्ति का अनुभव इस बात से किया जा सकता है कि एक तरफ कबीर और रैदास जैसे निर्गुण संतों ने उनके मार्गदर्शन पर राम को भजना शुरू किया तो दूसरी ओर अनंतानंद, भावानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुण भक्तिसंत हुए। भक्ति की एक धारा पूरे देश में बहने लगी। सभी प्रांतों में लोकभाषाओं में साहित्य रचा जाने लगा और वैष्णव भक्ति परंपरा की नया पर्व शुरू हो गया।

मुझे स्वामी रामानंद की समावेशी शक्ति और विराटता पर जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियां याद आती हैं : ‘’पैरों के नीचे जलधर हों, बिजली से जिनका खेल चले, संकीर्ण कगारों के नीचे शत-शत झरने बेमेल चलें।“ यहां जात-पात के संकीर्ण कगारों के नीचे भक्ति के शत-शत झरने चल रहे थे क्योंकि अंतत: तो उन्हें एक स्थान को प्राप्त होना था, एक ही नदी में मिलना था।

स्वामी रामानंद के संपूर्ण व्यक्तित्व और अवदान पर विचार करते हुए मुझे सहज ही इस प्रश्न का उत्तर मिल गया कि वामपंथियों की आंखों में वे क्यों खटकते हैं। जात-पात का बंधन काटकर वैष्णव भक्ति की निर्झर बहाने के अतिरिक्त उन्होंने एक विलक्षण काम किया था और वह काम था हिन्दुओं से मुसलमान हो चुके लोगों की स्वधर्मवापसी। और यही बात वामपंथियों को खटकती रही होगी। वामपंथी मानते हैं कि हिन्दू से दूसरे धर्मों में धर्मांतरण तो सहज सामाजिक प्रक्रिया है या हिन्दू अन्याय के प्रति विद्रोह है परंतु मुसलमान या ईसाई हो चुके हिन्दुओं की स्वधर्मवापसी एक सांप्रदायिक कृत्य है!

वे मध्यकालीन भारत के पहले ऐसे महान संत थे जिन्होंने हिन्दू से मुसलमान बने हजारों लाखों लोगों को वापस हिन्दू धर्म में दीक्षित किया। रामानंद से पहले यह बात सर्वस्वीकृत थी कि हिन्दू से मुसलमान तो हुआ जा सकता है लेकिन मुसलमान से हिन्दुओं में वापसी संभव नहीं है। इस भ्रांति को मिटाकर उन्होंने धर्मनगरी काशी से मान्यता दिलाई कि मुसलमान वापस हिन्दू धर्म में दीक्षित हो सकते हैं। अयोध्या के राजा हरि सिंह की अगुवाई में चौंतीस हजार राजपूतों की इस्लाम से हिन्दू धर्म में वापसी करवाई। भविष्य पुराण में उनके द्वारा चलाई गई इस मुहिम का उल्लेख है..

रामानंदस्य शिष्यौ वै चायोध्यायामुपागत
कृत्वा विलोमं तं मन्त्रं वैष्णवांस्तानकारयत।
भविष्य पुराण में आगे लिखा है कि जो लोग पहले हिन्दू से मुसलमान हो गए थे वही अब वापस हिन्दू हो गए हैं। उनके गले में तुलसी की माला है और जिह्वा पर राम का नाम है और वो रामानंद के प्रभाव से म्लैच्छ से वैष्णव होकर आनन्दित हैं।

कण्ठे च तुलसी माला जिह्वा राममयी कृता ।
म्लेच्छास्ते वैष्णवाश्चासन रामनंदप्रभावत: ।।
रामानंद ने इस्लामी समानता के षड़यंत्रकारी प्रलोभन की काट खोजी और जात पात के क्षुद्र बंधनों को तोड़कर भक्तिमार्ग को सुलभ कर दिया। एक ऐसा पंथ जो सबके लिए सुगम था। सभी राम को भज सकते थे सभी हनुमान की आरती गा सकते थे। क्या ब्राह्मण और क्या शूद्र!
स्वामी रामानंद के बारे में हमारी स्कूली शिक्षा का पाठ्यक्रम लगभग मौन है। जबकि होना तो विपरीत था। हमारी नई पीढ़ी को यह बताना जरूरी था कि सनातन का असली रूप तो स्वामी रामानंद में समाया हुआ है। वह, जो अहं ब्रह्मास्मि या तत्वंअसि के सिद्धांत पर चलता है। जो हर जीवात्मा में परमात्मा को देखता है। पर, वह कबीर-कबीर करता रहा है। जबकि कबीर तो रामानंद की कृपा से कबीर हुए हैं। यहां तक कि स्वामी रैदास की जयंती मनाई जाती है, छुट्टी होती है लेकिन उन्हें ईश्वर से मिलाने वाले स्वामी रामानंद को भुला दिया गया है। जबकि स्वामी रामानंद सगुण और निर्गुण दोनों पंथ के साधक थे। वे तो मूल रूप से वेद के उस महान मंत्र को मानते थे कि यह देह एक देवालय है और उसमें प्रतिष्ठित आत्मा उस परमात्मा की मूर्ति है, उसकी ही पूजा करो, उसे ही जानो।

जैसे प्राचीन भारत में ब्रह्मस्वरूप आदि शंकर ने बौद्धों और हिन्दुओं के अनेकानेक मतों को अपनी अद्वितीय मेधा से ध्वस्त कर सनातन का ध्वज गाड़ दिया था और सिर्फ बत्तीस वर्ष की आयु में भारत के चारों कोनों को एकसूत्र में बांध दिया था, वैसे ही स्वामी रामानंद ने उत्तर से लेकर मध्य, पूरब और पश्चिम में म्लेच्छाक्रांत भारत को मुक्ति दिलाई थी।

आज रामानंद के सहारे पूरे हिन्दू समाज को एकसूत्र में पिरोया जा सकता है। जिन दलितों और पिछड़ी जातियों को भड़काने का काम हो रहा है उन्हें स्वामी रामानंद का उदाहरण दिया जा सकता है। आज भी स्वामी रामानंद की भक्ति करने वाले करोड़ों लोग इस देश में हैं। छोटी से छोटी जातियों के लोग हैं। वैष्णव भक्ति के 56 द्वारों में से 36 तो रामानंद से संबद्ध हैं। उऩके नाम भले ही भिन्न हों पर काम तो एक ही है। कोई कबीर पंथी है कोई पीपा, धन्ना और सेन पंथी। पर हैं सभी राम के ही अऩुचर। स्वामी रामानंद इस देश में हिन्दू गौरव और सनातन परंपरा के प्रतीक पुरुष हैं। उन्हें मिटाने का प्रयास आत्महंता है।

– देवांशु झा

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