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अध्यात्म के रंगमंच पर जीवन का किरदार…

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मुझसे किसी को किसी बात पर ईर्ष्या नहीं हो सकती, लेकिन बिस्तर पर करवट बदलते रहने वालों को मेरी इस आदत पर अवश्य ईर्ष्या हो सकती है कि ध्यान बाबा कहते हैं आप इतनी बड़ी कुम्भकरण हैं कि आप पास में बैठी हैं और ज़रा सी कोहनी मारकर आपको लुढ़का दो तो वहीं खर्राटे मारने लगो….

मतलब मुझे इतनी आसानी से नींद आ जाती है… जीवन में चाहे कितनी ही उठा पटक या उथल पुथल क्यों न चल रही हो… स्वर चेक करने के बाद उस अनुसार पहला पैर बिस्तर पर रखते से ही मेरे दिमाग से सारे विचार फुर्र हो जाते हैं… और फिर हम नींद की आगोश में ऐसे सोते हैं जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की गोद में सोता हो.

पिछले अंक में मैंने पेट की समस्या पर मोशन से इमोशन तक लेख में जो भी पेट सम्बंधित समस्या बताई वास्तव में उसका सीधा सम्बन्ध आपकी नींद से है.

अब आप ये मत कहिएगा मैं तो घोड़े बेचकर सोता हूँ… बेफिक्र होकर सोता हूँ, खूब सोता हूँ फिर भी मेरा पेट साफ़ नहीं होता…

तो भई इसका कारण यह है कि सोने का मतलब बेहोश हो जाना नहीं होता. सोने का मतलब है अपने शरीर को इतना थका दो, उससे इतना काम लो कि बिस्तर पर जाने के बाद वो आपको अधिक परेशान न करें.

आप आदेश दो, कि बेटा बहुत खप लिए दिन भर अब चुपचाप सो जाओ, ज़्यादा इधर उधर करवट बदलकर तांका झांकी करने की ज़रूरत नहीं है कि सपने किस रास्ते से आ रहे हैं.

 

पिछले अंक में थाइरॉइड के लेख में सद्गुरू जग्गी वासुदेव ने बहुत सुंदर बात कही थी… सद्गुरु कहते हैं किसी भी समस्या का मृत्यु हमेशा से सरल हल होता है लेकिन हमें जीवन का हल खोजना है अंत का हल नहीं… जागरूक होना है तो हर तरह की चीज़ से पोषण लीजिये, सचेतन होकर, जीवंत होकर बिना अच्छे बुरे के भेदभाव के.

जो भी काम करें खुशी से करें… काम को उकताए मन से करेंगे तब भी वो सक्रियता काम नहीं आएगी… ऐसे में शरीर के साथ आत्मा भी थक जाएगी… ऐसे काम करने से आप खुद को काम के साथ जकड़ लेते हैं. इस पकड़ को ढीली करिए.. खुद को थोड़ा ढीला छोड़ दीजिये. समस्याओं को लेकर गंभीर होना ठीक है, लेकिन जीवन के प्रति गंभीर नहीं होना है. बिलकुल सहजता और आनंद से काम कीजिये.

इस विषय पर स्वर्गीय विनोद खन्ना का एक वीडियो शेयर कर रही हूँ एक बार इसे भी सुनियेगा कैसे अपनी नापसंद का काम करने के लिए ओशो ने उन्हें प्रोत्साहित किया था और फिर उनमें बहुत गहरा और सकारात्मक परिवर्तन आया था.

आपको यह अवश्य लग रहा होगा, बड़े बड़े आध्यात्मिक गुरुओं की बड़ी बड़ी बातें हैं, प्रवचन देना आसान है, करना मुश्किल. तो मैं बता दूं, ये गुरु, गुरु होने की गरिमा को प्राप्त ही इसलिए हुए हैं कि वे भी जीवन की इन छोटी छोटी समस्याओं से गुज़रकर ही आगे बढ़े हैं… वो गुरु बनकर ही पैदा नहीं हुए हैं.

हम उनकी तरह गुरु तो नहीं हो सकते लेकिन उनकी बताई बातों का पालन कर अच्छे शिष्य तो हो ही सकते हैं. शिष्य भी इन गुरुओं का नहीं होना है लेकिन प्रकृति ने जो भी शुभ बातें इन गुरुओं के माध्यम से हम तक पहुंचाई है उस प्रकृति के शिष्य हो जाइए, एक बार आपने उसे माँ मान लिया फिर देखिये कैसे वो पग-पग पर आपका पथ प्रदर्शन करती है….

मेरे गुरु श्री एम कहते हैं –


Very often, we tend to mistake tamas – tamo guna – for sattva. Sattva is goodness and calmness and quietness. Tamo guna is not goodness and calmness and quietness but laziness, sloth and pretending to be good.

शरीर को स्वस्थ और सुन्दर बनाने के लिए जो भी मैं टिप्स देती रहती हूँ उसका अंतिम लक्ष्य यही है कि हमें चेतना को भी इसी सुन्दरता की ओर अग्रसर करना है… पहले हम बाहरी आवरण से मेल और अनावश्यक चीज़ें हटा लें… फिर वहीं से अन्दर की यात्रा शुरू करेंगे…

इसलिए ये ना समझिये कि मैं आध्यात्मिक से सांसारिक हो गयी… बल्कि मेरे लिए दोनों का एक ही मतलब है … अध्यात्म के रंगमंच पर जीवन का किरदार…

तभी तो हिन्दी शब्दकोष का कोई जोड़ ही नहीं, अंग्रेज़ी में वे इसे Spirituality Vs Materialism कहते हैं. और Materialistic शब्द इतना तुच्छ प्रतीत होता है जैसे भौतिक वस्तु का गुलाम… और हमारे लिए जीवन या भौतिक जगत अध्यात्म का प्रकट रूप है और अध्यात्म जीवन का अप्रकट विस्तार…

खैर, हमारे यहाँ संन्यास का अर्थ हमेशा से त्याग रहा है, लेकिन क्या त्यागना है ये समझ नहीं आया तो लोगों ने घर द्वार त्याग दिया… क्योंकि उनके अनुसार सारी समस्याएँ गृहस्थ जीवन में होने से होती है. बल्कि यदि आप गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी अनावश्यक चीज़ों का त्याग करते चलेंगे तो आपके गृहस्थ जीवन में भी संन्यास उतर आएगा. फिर आप जो भी करेंगे वो आपकी आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा हो जाएगा.

तो पहले शरीर से अतिरिक्त वज़न त्यागिये, मन से अतिरिक्त भावनाएं और चेतना से तो सबकुछ त्याग देना है तभी तो ‘उसे’ आपकी चेतना में उतरने के लिए स्थान मिलेगा जिसके लिए हम जीवन भर तैयारी करते रहते हैं.

– माँ जीवन शैफाली

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1 thought on “अध्यात्म के रंगमंच पर जीवन का किरदार…”

  1. Shikha says:

    आज कल क्लटर फ्री का प्रचलन जोरो से है , मगर शरीर के क्लुटर हटाने की प्रेरणा माँ आप से ही मिलती है| बहुत बहुत आभार हमें प्रेरित करने के लिए

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