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ध्यान का ज्ञान : इस ज़मीं से आसमां तक मैं ही मैं हूँ, दूसरा कोई नहीं

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मैं अहंकारी हूँ, तुम भी अहंकारी हो और वो भी…

निरपवाद रूप से सभी अहंकारी हैं…

ऐसा भी नहीं कि बहुत बड़े-बड़े अहंकार पाले हों… छोटे-छोटे, बहुत तुच्छ, टुच्चे से अहंकार पाले हुए हैं.

क्या खूब लिखता हूँ मैं, क्या खूब दिखता हूँ मैं, कितनी ऐशो-आराम की ज़िन्दगी जुटाई है मैंने खुद के लिए और अपने परिवार के लिए… अनंत है इस किस्म के ओछे अहंकारों की सूची…

पर उपरोक्त सभी आज समाज में मान्य हैं… इस किस्म के अहंकारों को स्वीकृत करते हैं लोग और इनके लिए एक-दूसरे की सराहना करते हैं. दुनिया चलाए रखने के लिए यह आवश्यक भी है.

पर ये सभी अहंकार बहुत फूहड़ और भौंडे किस्म के हैं… तुरंत पकड़ में आ जाते हैं… बहुत स्थूल हैं, कुछ देर के संपर्क में ही समझ में आ जाते हैं… साथ ही निरापद भी हैं… कि चलो है किसी को इन बातों का अहंकार तो किसी अन्य को क्या परेशानी…

खतरनाक होते हैं वे सूक्ष्म, पकड़ में न आने वाले अहंकार… कई बार तो ये अहंकार इतने महीन होते हैं कि अहंकारी को भी पता नहीं होता कि उसे इन बातों का अहंकार है…

ऎसी दो किस्में जो इस वक़्त दिमाग में आ रही हैं, वो हैं ज्ञान का अहंकार और विनम्रता का अहंकार.

इसमें भी ज्ञान का अहंकार उतना खतरनाक नहीं, जितना विनम्रता का अहंकार…

ज्ञान का अहंकार तो कभी भी टूट सकता है… कभी भी तोड़ा जा सकता है… कोई और बड़ा ज्ञानी मिल जाए तो टूट सकता है… कोई तर्कों से परास्त कर दे तो भी टूट जाए… वगैरह-वगैरह…

वैसे सबसे सरल तरीका होता है इस अहंकार को तोड़ने का, कि ये जान लिया जाए कि ज्ञान होता क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसे ज्ञान समझा जा रहा है, वो मात्र सूचनाओं का संकलन ही हो!

बहुत होते हैं जिन्हें पुस्तकें रट कर, शेष समाज के सामने उन्हें दोहराने में बड़ा रस मिलता है… रस मिलता है प्रभावित होते श्रोताओं के चेहरे देख कर… यही रस उनके अहंकार का पोषण होता है…

ज्ञान का अर्थ जानने वाला कभी भी ज्ञान का अहंकार पालने वाला नहीं होता…

क्या है ज्ञान का अर्थ? क्या है ज्ञान…

सूचनाओं, तथ्यों, विवरणों आदि का विकारों – काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, भय, पक्षपात आदि – से रहित होकर अध्ययन करना और इन विकारों से रहित निर्मल बुद्धि से निष्कर्ष पर पहुंचना… सांसारिक दृष्टि से मुझे लगता है कि उत्कृष्ट उपाय है ज्ञान प्राप्ति का…

और इस उपाय का एक side effect भी है… इससे विनम्रता के अहंकार का भी विसर्जन हो जाता है.

हालांकि कई लोग इन अहंकारों के साथ ही संसार में अपनी भूमिका समाप्त कर लेते हैं… तो उनके लिए एक उपाय है कि छोटे-मोटे अहंकार छोड़कर परम अहंकार की तरफ चलें…

भला ये भी कोई अहंकार हुआ कि अहा, मेरी नाक कितनी सुडौल है, उफ्फ्फ… मेरे होंठ कितने sexy है… मेरे पास इतना आलीशान मकान है, या इतनी दौलत है… या… या… या… ये कि मुझे इतना ज्ञान है, मेरा इतना विशद अध्ययन है अत: मैं ही सही हूँ, सामने वाले मूर्ख हैं, अल्पज्ञ अथवा अज्ञानी हैं…

इन थोथे अहंकारों से परम अहंकार की तरफ बढ़िये ज़रा… संसार क्या सारी सृष्टि में बस मैं ही मैं हूँ, दूसरा कोई नहीं… दीजिए विस्तार अपने अहंकार को… इतना बढ़ा लीजिए कि समस्त ब्रह्माण्ड ही इसमें समा जाए… या यूं कहें कि समस्त ब्रह्माण्ड में आप व्याप्त हो जाएं…

क्या हास्यास्पद लग रही है ये बात या असंभव…

नहीं, निर्मल मन, बुद्धि, चित्त हो यानी ऊपर वर्णित विकारों (और भी होंगे) से रहित हो जाएं तो अपनी मूल वृत्ति के अनुसार ‘बूँद समानी समुंद में’ अथवा ‘समुंद समाना बूँद में’ घटित हो जाए.

कुल आशय यह कि ‘मैं..मैं.. मैं..’ यानी बकरी की तरह मिमियाना व्यर्थ है…

उपरोक्त बातों के लिए शास्त्रीय उद्धरण या प्रमाण नहीं दे सकता, क्योंकि पढ़ा-लिखा नहीं हूँ… और by god की कसम ये विनम्रता का अहंकार नहीं… सच्ची बात है.

– स्वामी ध्यान विनय

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