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मानो या ना मानो : वामांगी-उत्सव पुनर्जन्म एक प्रेमकथा

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वामांगी, जिसका ज़िक्र पहले आता है उसके बाद आती है वह.. पैरों की ऊंगलियों के नाखून बढ़ाकर रखती है, लेकिन उस पर महावर नहीं होता, बाकी उसके महावर से रंगे पाँव जहाँ जहाँ पड़ते हैं रास्ता गुलाबी हो जाता है। पैरों में पायल नहीं बस काला धागा डाले रहती है, जैसे नदी के दुधिया पानी में बहती दो नाव।

रेशमी बाहों में कभी कुछ नहीं डालती, किसी की बाहें भी नहीं… कमर ऐसी जैसे पहाड़ों से गुज़रती हुई घुमावदार राह में कोई घूम ही आए। शुतुरमुर्गी गर्दन पर कंठ के नीचे गहरा गड्ढा और हंसलियों पर हंसती मोती की माला।

चेहरा न जाने कैसा था कि हर जन्म में बदलता रहा लेकिन बदलते चेहरे पर आँखें कभी न बदली। मृगनयनी ने पिछले कई जन्मों की स्मृतियाँ काजल के किनारों के साथ बाँध रखी थी… कि पीड़ा की किसी बाढ़ में भी यादों की नदिया को उफनकर बह नहीं जाने दिया।

इसलिए जब भी सोती या जागती आँखों से उसने ‘उसे’ देखा तो कभी पिता के रूप में पाया जिसने अपने हाथों से बेटी की चिता को अग्नि दी थी, कभी उस योगी के रूप में जो तपस्या के उस पड़ाव से लौट आया था जब उसकी एक अंतिम छलांग उसे देह को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त कर देती।

लेकिन जब ऐसे योगी की तपस्या इस बिंदु पर आकर भंग हो जाती है तो उसे योग भ्रष्ट योगी कहा जाता है, ऐसे योगी अपने पूर्वजन्म की तपस्या के फलस्वरूप अगले जन्म में राजयोग पाते हैं।

राजा उत्सव ने राजयोग अपने उन्हीं कर्मफलों के अनुरूप पाया था, यथा नाम तथा गुण वाला राजा उत्सवप्रेमी था, अपनी बलिष्ट भुजाओं, तीव्र बुद्धि, उत्सवपूर्ण स्वभाव और चेहरे पर आध्यात्मिक तेज के कारण आस पास के राज्यों तक ख्याति पाई थी।

उसके दरबार में आए दिन आनंद और उत्सव की बहार रहती, जहाँ पद और मद में चूर कई मंत्री, पड़ोसी राज्य के मित्र राजा और दरबारी शामिल रहते। दिन कर्तव्यनिष्ठा से राजकार्य और रातें नर्तकियों गायकों और संगीतकारों के बीच रासरंग में व्यतीत होती।

उधर वामांगी अपने गुरु के आश्रम में क्रिया योग और वाम मार्ग की दीक्षा ले कर अध्ययन काल पूर्ण कर चुकी थी, जिसके बाद गुरु के आदेश पर उसे देश भ्रमण पर निकलना था।

बात उस काल की है जब पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी शिक्षा और दीक्षा का समान अधिकार था लेकिन हर काल की तरह उस काल में भी महिला का ध्यान योग और अध्यात्म में दीक्षित होना पुरुष वर्ग के अहम को ठेस थी, इसलिए वामा जहाँ जाती उसे स्त्री होने की कीमत चुकाना पड़ती।

जहाँ एक ओर उसे सम्मान मिलता तो दूसरी ओर तंत्र शास्त्रों के तर्कों पर मखौल उड़ानेवालों की भी कमी न थी, लेकिन वामा की आस्था और तटस्थता को आज तक कोई डिगा न पाया था।

राजा उत्सव की तार्किक बुद्धि का बखान सुन कर वामांगी यात्रा के दौरान राजा के महल में कुछ दिन व्यतीत करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकी।

वामा की विद्या और राजा उत्सव की बुद्धि के बीच चलने वाली चर्चा और ज्ञान की बातों को सुनने दूर दूर के नगरों से भी लोग आने लगे थे। दोनों की कुशाग्र बुद्धि को देखने और धर्म सम्मत ज्ञान की बातों को सुनने वाले इसी प्रतीक्षा में रहते कि कौन किसको हराता है, लेकिन अब तक की चर्चा में दोनों में से किसी ने हार न मानी थी और दरबार समय पूर्ण होने के कारण उठ जाता।

इन सबके बावजूद राजा उत्सव की मद्य और नर्तकियों के साथ रासरंग में कोई कमी न आई। एक रात्रि राजा ने ऐसे ही किसी रासरंग के उत्सव में वामांगी को भी आमंत्रित किया, उसे लगा था अब तक चल रही तार्किक बहस के आगे वामांगी यहाँ आकर उससे हार जाएगी।

एक स्त्री के लिए मद्यपान उसकी देह की आतंरिक व्यवस्था के प्रतिकूल होता है लेकिन वामांगी को मद्य का प्रस्ताव रखते समय राजा उत्सव यह भूल गया था कि वह सिर्फ ध्यान और क्रिया योग और वेद उपनिषद में ही दीक्षित नहीं, उसके गुरु ने हर अवस्था का सामना करने के लिए उसे वाम मार्ग में भी दीक्षित किया है।

जहाँ वो वेद उपनिषद के श्लोकों और ऋचाओं के आधार पर आध्यात्मिक चर्चा करती रही वहीं आज मद्यपान के बाद बढ़े उसके लावण्य और आभा मंडल की ऊर्जा से राजा के साथ दरबार में उपस्थित अन्य लोग भी प्रभावित हुए बिना न रह सके।

इतने सारे पुरुषों के बीच एक स्त्री का इतने आत्म विश्वास के साथ वहां बैठे रहना सबको अचंभित कर रहा था क्योंकि आज तक लोग वामा को केवल एक साध्वी के रूप में जानते थे, लेकिन आज वामा किसी और ही रूप में दिख रही थी।

कहाँ तो राजा उत्सव उसे हराने के उद्देश्य से इस उत्सव में आमंत्रित किया था और कहाँ तो वो उसके लावण्य और मद्य में डूबी आँखों के आकर्षण और संगीत की ध्वनियों में डूबकर गीत की तान छेड़ देता है…. वामा मुस्कुराते हुए सब पर एक दृष्टि डालती है, अपने राजा को लोग पहली बार गाते हुए देख रहे थे… गीत इतना मधुर की सुनने वाले लग रहा था ध्यान मग्न हो रहे थे।

लोगों की आँखें गीत के स्वरों को सुनते हुए बंद होने लगी… और राजा वामा को देखते हुए गाने में मग्न… तभी घुँघरू की झंकार से अचानक सबकी आँखें खुलती है… वामा एक नर्तकी के रूप में नृत्य की मुद्रा में खड़ी थी।

इधर राजा की तान ऊंची हुई उधर वामा का नृत्य प्रारंभ हुआ… रात भर गायन और नृत्य के बीच में संवाद होता रहा, कभी राजा उत्सव वामा के नृत्य के प्रति समर्पित होता, तो कभी वामा राजा उत्सव के गायन पर मुग्ध…

लग रहा था जैसे राजा इंद्र भी अपनी अप्सराओं को छोड़ प्रेम में डूबे काम-रति से दो प्रेमियों के बीच की जुगलबंदी देखने प्रकट हुए हो, मद्य में डूबा दरबार मोगरे के फूल की सुगंध बिखेर रहा था मानो देवता आसमान से फूल बरसा रहे हो।

तभी अचानक से राजा को भान होता है कि वह क्या कर रहा है… ‘एक बार फिर’ जैसे ध्यान भंग हुआ था, राजा का अहम जागा और उसने बाजू में रखी सोने की मुद्रा से भरी थाली से एक सोने की मुद्रा उठाई और वामा की तरफ फेंकते हुए कहा… वाह!

वामा तो अपने नृत्य में ध्यान मग्न थी वो इस संसार में थी ही नहीं… तो नृत्य करते हुए सिक्का सीधे उसके माथे पर ज़ोर से जा लगा। उसके माथे से रक्त का फव्वारा फूट गया… संगीत अचानक बंद हुआ… दरबार में एकदम सन्नाटा छा गया। वामा के माथे से लहू, आँखों से आंसू में मिलकर धरती पर गिरता रहा… उसके माहवार लगे पाँव लहू में सन गए।

वामांगी नीचे झुककर धीरे से सिक्का उठाती है और उलटे कदमों से लौट जाती है। वामा के लौटने पर उसके माहवार लगे पैर के साथ लहू के साथ पंजे के निशान दरबार से बाहर दरवाज़े की ओर बन गए…

पाँव के निशान देखकर राजा को न जाने क्या हुआ, वो अपने सिंहासन से उठता हुआ दौड़ लगाते हुए वामा को पुकारता है… लक्ष्मी ऐसे रूठकर न जाओ, मैं अपनी मुद्रा वापस लेता हूँ…

वामा कुछ देर रुकी… बिना मुड़े सोने की मुद्रा रखे हाथ को आगे बढ़ाते हुए कहती है… उत्सव… इस सिक्के को लेने के लिए तुम्हें दोबारा आना होगा.. इस अपमान के साथ इस जीवन का मैं यहीं अंत करती हूँ… तुमने मेरे प्रेम का अपमान किया है… मैंने तुमसे कुछ माँगा नहीं, कुछ चाहा नहीं… बस उत्सव के साझा पल को जी लेना चाहती थी।

राजा उत्सव कुछ समझ पाता तब तक वामांगी जा चुकी थी… इधर राजा लक्ष्मी के रूठ जाने पर पूरी तरह से राजपाट खो चुका था… और सबकुछ छोड़कर जंगलों में योगी बनकर घूमता रहा और एक दिन एक कन्दरा में उसे मृत पाया गया।

उधर वामांगी प्रेम और अपमान के उन पलों को स्मृति से निकाल फेंकने में समर्थ न हो सकी और एक रात गुरु की आज्ञा लेकर खेचरी मुद्रा लगाकर चेतना को देह से मुक्त कर देती है। लेकिन उसके पहले वो सोने का सिक्का गुरु को सौंप जाती है और कहती है मैं जहाँ भी जन्म लूं ये सिक्का आप मुझे अवश्य पहुंचा देना, ये सिक्का जहाँ होगा राजा उत्सव को मेरे पास उसे लेने आना ही होगा, जब तक मैं उसे यह लौटा न दूंगी उसे जीवन-चक्र से मुक्ति नहीं मिलेगी।

शैला बानो की उस पोटली में न जाने क्या भरा था कि वो उसे किसी को छूने नहीं देती… लेकिन नौ साल के अनवर की निगाहें हमेशा शैला बानो, जिसे वो चचीजान कहता था, की उस तम्बाकू की पोटली पर ही जमी रहती।

चचीजान बताओ तो सही ऐसा क्या है जो तुम इसे ऐसे कलेजे से लगाए रहती हो?

मुएँ भाग क्यों नहीं जाता, जब देखो तब मेरी पोटली पर नज़र गढ़ाए रहता है… कहा तो तम्बाकू रखी है और बच्चों को ऐसी चीज़ें नहीं छूना चाहिए।

अच्छा मत बताओ ये तो बता दो चचीजान ये तुम्हारे माथे पर चोट का निशान क्यों हैं? बचपन में कहीं गिर पड़ी थी? या अम्मा ने खूब पिटाई की होगी, ज़रूर बचपन से तम्बाकू जो खाती होगी।

मुंह में भरे तम्बाकू वाले पान की पीक थूकते हुए शैला बानो उसी अंदाज़ में कहती – मारे तेरी अम्मा… ये तो जनम के साथ ही लेकर आई हूँ… पिछले जनम का कोई कर्ज है… ।

तो ज़रूर किसी राजा ने मारा होगा ढंग से गाना न गा रही होगी जैसे अभी गाती हो…

चल भाग जा कमबख्त जब देखो तब मारने की बात करता है… तू रुक मेरी छड़ी कहाँ है… तुझे बहुत दिन से मार नहीं पड़ी … रुक जा…

और अनवर सर पर पाँव रख कर दौड़ लगा जाता।

शैला बानो को कोई एक बार गाते सुन ले तो उसका मुरीद हो जाए। ठुमरी तो ऐसे गाती कि खुद ठुमरी ही ठुमक जाए। बड़े बड़े घराने से शैला बानो को गाने का न्यौता आता। शादी ब्याह हो, चाहे बच्चे का जन्म हो.. कुछ तो यूं ही संगीत की महफ़िल लगा लेते सिर्फ शैला बानो की ठुमरी सुनने।

बड़ों की तो ठीक है न जाने इस नन्हे अनवर पर शैला बानो ने कैसा जादू कर रखा था कि इतनी झिड़की के बाद भी वो उसके घर के चक्कर लगाना नहीं छोड़ता। सिर्फ गाने का ही नहीं उस पोटली का जादू भी था जिसे शैला बानो किसी को छूने नहीं देती थी।

एक दिन उसने शैला बानो को किसी बाबा का ज़िक्र करते हुए सुन लिया था और सिक्के जैसा ही कुछ और भी सुना था लेकिन पूरी बात सुनने से पहले ही चचीजान की नज़र अनवर पर पड़ी गयी थी और छड़ी का डर दिखाते हुए उसे भगा दिया था।

फिर एक दिन चचीजान की नज़र बचाकर अनवर वो पोटली चुराने में कामयाब हो जाता है। वो छुपकर एक जगह बैठ जाता है और जैसे ही पोटली में हाथ डालता है एक चांदी का सिक्का उसके हाथ में आता है। अभी वो उसे देख ही रहा होता है कि चचीजान उसे ढूंढते हुए पहुँच जाती है। वो उसे देख भागने लगता है तो शैला बानो छड़ी लेकर उसके पीछे दौड़ती है… रुक कमीने तेरी चचीजान में अभी बहुत जान बाकी है… अगले जन्म तक तेरा पीछा करूंगी…

पकड़ कर देख लो वामा पिछली बार तुम ये सोने का सिक्का लेकर भागी थी इस बार मैं आगे हूँ इसे चांदी का बनाकर.. वामा शब्द सुनते ही शैला बानो के पाँव ठिठक जाते हैं… न जाने कौन से जन्म की स्मृतियाँ उसकी आँखों के सामने घूम जाती है… राजा का दरबार नृत्य… गायन… उसके कानों में बजने लगता है…

रास्ते के बीच खड़ी वो इतनी बेसुध हो जाती है कि उसे पता ही नहीं चलता पीछे से एक बैल दौड़ता हुआ आ रहा है… अनवर पीछे मुड़कर देखता है, बैल को देखते से ही वो आवाज़ लगाता है वामा हट जाओ… शैला बानो के मुंह से बस इतना निकलता है … “उत्सव”… अनवर तब तक दौड़कर उस तक पहुँच चुका होता है और धक्का देकर उसे एक तरफ कर देता है… लेकिन गुस्साए बैल के सिंग तब तक झुक चुके होते हैं उठते हुए सीधे अनवर की छाती में धंस जाते हैं…

शैला चीखते हुए उसे थाम लेती है, अनवर अपने हाथ का सिक्का उसे लौटाते हुए कहता है… पिछली बार लक्ष्मी रूठी थी इस बार सरस्वती भी रूठ गयी। इस जन्म में तुमसे संगीत न सीख पाया… और अंतिम सांस के साथ एक अंतिम वाक्य निकलता है …. बस तुम्हारा गीत सुनने के लिए ही आता था चचीजान…

ठहर कमीने… तेरी चचीजान में अभी बहुत जान बाकी है… अगले जन्म तक तेरा पीछा करूंगी…

जाने किस समय कौन सा शब्द मुंह से निकला हुआ सच हो जाता है…

इस बार माथे पर वही निशान और वही किस्मत की रेखाएं लेकर जन्मी है वो, कदाचित पिछले जन्मों की तपस्या ध्यान और गुरु से मिली दीक्षा का ही परिणाम है कि उसकी किस्मत को लक्ष्मी का और कलम को सरस्वती के साथ माँ काली का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है जिससे उसका आभा मंडल अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा फैलाता है।

रोज़ सुबह उसके ध्यान कक्ष से मन्त्रों की आवाज़ गूंजती है… ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी लक्ष्म्यै सकल सौभाग्यं मे देहि स्वाहा..

और एक दिन ऐसे ही ध्यान के क्षणों में पुरानी स्मृतियाँ जाग जाती हैं… और वो अपने जीवन के उत्सव को खोजने निकल पड़ती है।

न जाने प्रेम, अपमान, विरह और तड़प का यह कैसा ज़िद्दी रिश्ता था कि दोनों एक दूसरे को पहचान जाते हैं… लेकिन पहल करने से दोनों डरते हैं, कदाचित इसीलिए कि पिछले सारे जन्मों की विरह की दर्दनाक कहानियाँ दोनों को याद है… ।

वामा कहे या शैला बानो इस जन्म में नाम के कोई अर्थ नहीं रह गए हैं… वह भी कभी पुत्र, कभी भाई, कभी मित्र, कभी पिया तो कभी पिता की तरह हमेशा उसके आसपास रहता। इसी जन्म में सारे रिश्तों से पुकार चुकी है वह… लेकिन वह उसको सुनकर भी अनसुना कर देता है क्योंकि जो रिश्ता उन दोनों के बीच है उसका कोई नामकरण अभी सांसारिक रिश्तों में न हो सका है इसलिए शायद पुकार उस तक ठीक से पहुँचती ही नहीं…

वामा का यह अंतिम जन्म है… वो उसे वो सिक्का उसे सौंपकर क़र्ज़ से और जीवन चक्र से मुक्त हो जाना चाहती है… लेकिन वो सिक्का गुरु ने इस जन्म में अभी तक पहुँचाया नहीं था… उसकी बस झलक भर उसे स्वप्न में आती रहती थी…

और महामाया के जादू और निर्णय से अनजान ‘उसकी’ यह ज़िद है कि यदि यह वामा का यह अंतिम जन्म है तो वह इस जन्म में उससे कभी नहीं मिलेगा… और अगले जन्म में उसकी कोख से पुत्र बनकर जन्म लेगा।

लेकिन नियति को कौन बदल सका है… एक दिन पूजा के दौरान भोग की थाली माँ काली के चरणों में रखकर वह गहन पीड़ा के साथ माँ से प्रार्थना करती है कि सिक्का मेरे पास न भेजकर सीधे ‘उसके’ पास पहुंचा दे…

महामाया के जादू को कौन समझ पाया है… पूरी तरह प्रार्थना में बदल चुकी थी वह… जैसे ही आँखें खोलती है उसकी भोग की थाली में रक्षासूत्र में बंधा एक सिक्का प्रकट होता है…

उनके रिश्ते की तरह हर युग में सिक्के का स्वरूप बदलता रहा.. क्योंकि हर युग की भौतिकता के साथ आध्यात्मिकता अपना प्रकटन का तरीका बदल देती है…

और फिर एक दिन गुरु सन्देश देते हैं… इस जन्म में ही नहीं अब किसी भी जन्म में दोनों का मिलना संभव नहीं, क्योंकि ‘उसकी’ ज़िद, अहम और मिलन की अधूरी प्यास ही उसके पुनर्जन्म का कारण बनेगा, और सृष्टि के कुछ महत्पूर्ण कार्यों के लिए उसका दोबारा जन्म लेना आवश्यक है, लेकिन तुम्हारे जीवन के प्रति सारे कर्तव्य पूरे हो चुके हैं, इसलिए इस जन्म में मैं तुम्हें मुक्ति का आशीर्वाद देता हूँ…

वो रक्षा सूत्र और सिक्का आज भी उसके पास है और प्रतीक्षा कर रही है उस चमत्कार की कि जैसे उसकी भोग की थाली में यह सिक्का अपने आप प्रकट हुआ था वैसे ही वह उसके पास अपने आप पहुँच जाए… और वह अपने अंतिम कर्तव्य से भी मुक्त हो…

क्योंकि माँ काली का आशीर्वाद और सरस्वती का वरदान तो उसे अपनी तपस्या के कारण भरपूर मिला है लेकिन रूठी हुई लक्ष्मी का दोबारा उस तक पहुंचना आवश्यक है तभी उसे अपना राजपाट वापस मिलेगा और वह सच में राजा उत्सव बनकर संसार और जीवन को उत्सव बनाएगा…

वामांगी के ध्यान कक्ष से आज भी मन्त्रों की आवाज़ सुनाई देती है… ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी लक्ष्म्यै सकल सौभाग्यं मे देहि स्वाहा….

– माँ जीवन शैफाली
(कुछ स्वप्न झलकियाँ और कुछ रहस्यमयी चीज़ों के वास्तविक प्रगटन पर आधारित एक काल्पनिक प्रेम कहानी)

क्योंकि मैं ही प्रथम और मैं ही अंतिम हूँ
मैं ही सम्मानित और मैं ही तिरस्कृत हूँ
मैं ही भोग्या और मैं ही देवी हूँ
मैं ही भार्या और मैं ही कुमारी हूँ
मैं ही जननी और मैं ही सुता हूँ
मैं ही अपनी माता की भुजाएँ हूँ
मैं बाँझ हूँ किंतु अनेक संतानों की जननी हूँ
मैं विवाहिता स्त्री हूँ और कुँवारी भी हूँ
मैं जनित्री हूँ और जिसने कभी नहीं जना वो भी मैं हूँ
मैं प्रसव पीड़ा की सांत्वना हूँ
मैं भार्या और भर्तार भी हूँ
और मेरे ही पुरुष ने मेरी उत्पत्ति की है
मैं अपने ही जनक की जननी हूँ
मैं अपने ही भर्तार की भगिनी हूँ
और वह मेरा अस्वीकृत पुत्र है
सदैव मेरा सम्मान करो
क्योंकि मैं ही लज्जाकारी और मैं ही देदीप्यमान हूँ
– पाओलो कोएलो (इलेवन मिनट्स पुस्तक से प्राप्त कविता)

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