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जीवन : कांच के टुकड़े से प्रिज़्म होने की यात्रा

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किसी मध्यम मार्गी को अचानक से उठाकर अति पर पटक दिया जाए तो वो खुद को संसार से दूर एक सुनसान टापू पर खड़ा अनुभव करता है, जहाँ उसके अलावा उसे मनुष्य नाम का कोई जीव नहीं मिलता… जहाँ एक शाकाहारी सामाजिक इंसान को अपना जीवन बचाए रखने के लिए जंगली जानवर को मारकर खाने में भी कोई गुरेज़ नहीं.

कई बार मुझे मेरी आध्यात्मिक यात्रा ऐसी ही लगती है, जहाँ से मैं अपनी जीजिविषा और मुक्ति की आकांक्षा के बल पर जीवन को हमेशा जीत लाई हूँ और मृत्यु को उस शेर की तरह रहस्यमयी जंगलों में लौटते देखा है…

लेकिन उस यात्रा के दौरान कुदरत के जिन रहस्यमयी ठिकानों का पता मैंने पाया है वो सिर्फ मैं जानती हूँ.

आवश्यक नहीं कि हरेक की यात्रा इतनी ही कठिन हो, इससे अधिक कठिन या इससे अधिक सरल भी हो सकती है. महत्वपूर्ण यह है कि आप अपनी इस यात्रा में खुद को कितना परिष्कृत कर पाते हैं.

सारी अड़चनों और बाधाओं के बावजूद जीवन बहुत ही नाज़ुक होता है, बिलकुल कांच के टुकड़े के समान. ज़रा सी लापरवाही हुई और ये चूर चूर हो सकता है. इसे बहुत सावधानी से संभालना होता है, क्योंकि ये सारी अड़चने, सारी बाधाएं आपके जीवन का कांच के टुकड़े से प्रिज़्म बन जाने के लिए होती हैं.

ताकि जब भी इस पर सूर्य की किरणे पड़े तो ये उस किरण को खुद से गुज़रने के बाद सात रंगों में विभाजित कर विस्तारित कर सके.

जीवन में प्रत्येक घटनाएं उस सूर्य की किरण के समान ही होती है. जब वो आपके जीवन से गुज़रती है तो आप उसे अच्छे या बुरे अनुभवों में परिभाषित कर उसके अनुसार प्रतिक्रिया देते हो. जिस दिन भी यह ख़याल आ जाए कि घटनाएं सिर्फ घटनाएं होती हैं, अच्छी या बुरी नहीं, उस दिन आपके रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

यकीनन हम मात्र कांच की कोई वस्तु नहीं मानव है, तो मानव मन संवेदनशील भी होता है. लेकिन इस मानव मन के अन्दर जो बैठा है वो तो सारी संवेदनाओं से परे हैं. या ये कहें वो इतना ग्रहणशील है कि सारी संवेदनाओं को ग्रहण करने के बाद भी अपनी देह के अधीन नहीं होता.

उसका स्वभाव तो वैसा ही है प्रिज़्म जैसा कि जीवन में चाहे जैसे अनुभव आए, ग्रहण कर एक रंग से उसे कई रंगों में विभाजित करें. ताकि जब भी कोई आपके संपर्क में आए तो उसे आपके उस पार की वो एक किरण दिखाई न दे बल्कि आपसे गुज़रने के बाद जिसने आपके व्यक्तित्व को सतरंगी बनाया है उसमें से अपनी पसंद का कोई ऐसा रंग चुन लें जिसकी उसके जीवन में कमी है.

 

आपको लगेगा बड़ी बड़ी बातें कहना बहुत आसान है लेकिन जिस पर बीतती है वही जानता है. तो मैंने पहले ही कहा मेरी यात्रा तो ऐसी रही है कि कई बार मृत्यु के मुहाने से मैं अपनी जीजिविषा और मुक्ति की आकांक्षा के बल पर जीवन को हमेशा जीत लाई हूँ.

हरेक के जीवन में घटनाएं ऐसे ही आती है… मैं यह नहीं कहती मजबूत हो जाइए, परेशानी में भी मुस्कुराइए… नहीं, जीवन के प्रत्येक भाव को उसकी सम्पूर्णता के साथ अपनाइए, प्रतिक्रिया दीजिये लेकिन बस कांच का टुकड़ा बनकर मत रह जाइए.

जब भी जीवन में आपकी इच्छा के प्रतिकूल कुछ घटित हो रहा हो तो उसे अपने से गुज़रते हुए साक्षी भाव से अनुभव कीजिये… खुद को प्रिज़्म में रूपांतरित कीजिये, और फिर जब वो घटना रूपी किरण आपसे गुज़र जाए तो उसे सात रंगों में विभाजित कर दूसरों के जीवन में रंग भरिये.

– माँ जीवन शैफाली

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1 thought on “जीवन : कांच के टुकड़े से प्रिज़्म होने की यात्रा”

  1. Mohan sonawane says:

    Nice …

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