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Life Love Liberation : ध्यान ही जीवन, जीवन ही प्रेम, प्रेम ही परमात्मा

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मैं अपनी बात शुरू करूं इसके पहले जानिये बब्बा क्या कह रहे हैं, कोई आध्यात्मिक गुरु, कोई ज्ञानी बात कहता है तो हम उसे जल्दी ग्रहण कर पाते हैं.

लाओत्से कहता है, चलो, लेकिन ध्यान नाभि का रखो.

बैठो, ध्यान नाभि का रखो. उठो, ध्यान नाभि का रखो. कुछ भी करो, लेकिन तुम्हारी चेतना नाभि के आस-पास घूमती रहे. एक मछली बन जाओ और नाभि के आस-पास घूमते रहो. और शीघ्र ही तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर एक नई शक्तिशाली चेतना का जन्म हो गया.

इसके अदभुत परिणाम हैं. और इसके बहुत प्रयोग हैं. आप यहां एक कुर्सी पर बैठे हुए हैं. लाओत्से कहता है कि आपके कुर्सी पर बैठने का ढंग गलत है. इसीलिए आप थक जाते हैं. लाओत्से कहता है, कुर्सी पर मत बैठो. इसका यह मतलब नहीं कि कुर्सी पर मत बैठो, नीचे बैठ जाओ. लाओत्से कहता है, कुर्सी पर बैठो, लेकिन कुर्सी पर वज़न मत डालो. वज़न अपनी नाभि पर डालो.

अभी आप यहीं प्रयोग करके देख सकते हैं. एम्फेसिस का फर्क है. जब आप कुर्सी पर वज़न डाल कर बैठते हैं, तो कुर्सी सब कुछ हो जाती है, आप सिर्फ लटके रह जाते हैं कुर्सी पर, जैसे एक खूंटी पर कोट लटका हो. खूंटी टूट जाए, कोट तत्काल ज़मीन पर गिर जाए. कोट की अपनी कोई केंद्रीयता नहीं है, खूंटी केंद्र है. आप कुर्सी पर बैठते हैं–लटके हुए कोट की तरह.

लाओत्से कहता है, आप थक जाएंगे. क्योंकि आप चैतन्य मनुष्य का व्यवहार नहीं कर रहे हैं और एक जड़ वस्तु को सब कुछ सौंपे दे रहे हैं. लाओत्से कहता है, कुर्सी पर बैठो जरूर, लेकिन फिर भी अपनी नाभि में ही समाए रहो, सब कुछ नाभि पर टांग दो. और घंटों बीत जाएंगे और आप नहीं थकोगे.

अगर कोई व्यक्ति अपनी नाभि के केंद्र पर टांग कर जीने लगे अपनी चेतना को, तो थकान–मानसिक थकान–विलीन हो जाएगी. एक अनूठा ताज़ापन उसके भीतर सतत प्रवाहित रहने लगेगा. एक शीतलता उसके भीतर दौड़ती रहेगी. और एक आत्मविश्वास, जो सिर्फ उसी को होता है जिसके पास केंद्र होता है, उसे मिल जाएगा.

तो पहली तो इस साधना की व्यवस्था है कि अपने केंद्र को खोज लें.

और जब तक नाभि के करीब केंद्र न आ जाए ठीक जगह नाभि से दो इंच नीचे, ठीक नाभि भी नहीं, नाभि से दो इंच नीचे जब तक केंद्र न आ जाए, तब तक तलाश जारी रखें. और फिर इस केंद्र को स्मरण रखने लगें. श्वास लें तो यही केंद्र ऊपर उठे, श्वास छोड़ें तो यही केंद्र नीचे गिरे. तब एक सतत जप शुरू हो जाता है–सतत जप. श्वास के जाते ही नाभि का उठना, श्वास के लौटते ही नाभि का गिरना–अगर इसका आप स्मरण रख सकें….

कठिन है शुरू में. क्योंकि स्मरण सबसे कठिन बात है और सतत स्मरण बड़ी कठिन बात है. आमतौर से हम सोचते हैं कि नहीं, ऐसी क्या बात है? मैं एक आदमी का नाम छह साल तक याद रख सकता हूं.

यह स्मरण नहीं है; यह स्मृति है. इसका फर्क समझ लें. स्मृति का मतलब होता है, आपको एक बात मालूम है, वह आपने स्मृति के रेकार्डींग को दे दी. स्मृति ने उसे रख ली. आपको जब ज़रूरत पड़ेगी, आप फिर रिकार्ड से निकाल लेंगे और पहचान लेंगे. स्मरण का अर्थ है: सतत, कांसटेंट रिमेंबरिंग.

– ओशो (ताओ उपनिषद)

उपनिषद जैसे गूढ़ ज्ञान का मुझसे कभी पाला नहीं पड़ा… वो मेरे मार्ग में आता ही नहीं, मेरी बुद्धि कदाचित इस तरह से बनी ही नहीं इसलिए वो मुझसे दस फीट की दूरी बनाकर ही चलता है.

हाँ बब्बा कुछ कहते हैं तो जैसे मेरे लिए थोड़ा आसान हो जाता है. मैं उनकी बातों को तोड़ मरोड़ भी लूं तो उनको बुरा नहीं लगेगा मुझे पूरा विश्वास है, लेकिन ऐसी छेड़छाड़ मैं उपनिषद के साथ नहीं कर सकती.

ऊपर बब्बा ने स्मरण की बात कही है. जब आप अपना ध्यान किसी एक बिंदु पर लगाकर पूरी दिनचर्या उसका स्मरण करते हुए करते हैं तो ऊर्जा का उर्ध्वगमन होता है.

ठीक यही बात मैंने थाइरॉइड को माया बताते हुई कही थी, जब आप चौबीस घंटे किसी बीमारी का स्मरण रखते हुए दिन बिताते हैं तो वो आपकी चेतना में इतनी घनीभूत हो जाती है कि आपकी देह में ही अपना घर बना लेती है, फिर आप लाख दवाई खाते रहो वो कभी आपका पीछा नहीं छोड़ती. इसलिए कहती हूँ बीमारी ठीक करना है तो स्वास्थ्य को पास लाने का स्मरण करें न कि बीमारी को दूर भगाने का.

ठीक वैसे ही जब आप प्रेम में होते हैं तो चौबीस घंटे आप अपने प्रेम के बारे में ही सोचते रहते हैं… आपका हर काम उसके इर्द गिर्द ही होता है… तो जब उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान गाते हैं कि साँसों की माला पे सिमरू मैं पी का नाम… तो आप झूम झूम जाते हैं… क्योंकि कहीं आपको लगता है अरे ये तो मेरे ही मन की बात कही है… तो क्यों न प्रेम को ही ध्यान बना लिया जाए तो जो आप बार-बार मुझसे प्रश्न करते हैं कि ध्यान कैसे किया जाए उसका भी जवाब मिल जाएगा. और फिर आपको पता चलेगा… जिस प्रेम को ध्यान बनाया वह ध्यान ही तो प्रेम है…

ऊपर बब्बा नाभि पर ध्यान केन्द्रित करने को कह रहे हैं, कुछ लोग दो भौहों के मध्य तीसरे नेत्र यानी आज्ञा चक्र पर ध्यान केन्द्रित करने को कहते हैं, कुछ लोग आती-जाती साँसों पर ध्यान केन्द्रित करने को कहते हैं… जब मन ठीक होता है तो हम प्रयास कर भी लेते हैं, लेकिन एक सीमा के बाद या तो यह बहुत जटिल लगने लगता है या फिर एकदम उबाऊ.

मनुष्य के लिए सबसे सरल स्थिति है जिसमें वह पूरा पूरा होता है वह है प्रेम. तो ध्यान अपने प्रेम पर केन्द्रित कीजिये. प्रेम पर कहा है, शुरुआत आप प्रेमी से कर सकते हैं… आप वाकई प्रेम की उस स्थिति में हैं तो चौबीस घंटे उसको याद रखते हुए जी सकते हैं… लेकिन ये एक सिरा पकड़ने के लिए ठीक है…

जैसे बब्बा ने कहा नाभि के ठीक दो इंच नीचे… जब तक नाभि का केंद्र बिंदु न मिल जाए तब तक प्रयास करते रहिये…. वैसे ही जब तक ध्यान का केंद्र बिंदु प्रेमी से प्रेम पर न आ जाए तब तक प्रयास करते रहिये…

आपका हर कार्य प्रेम को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए, आती जाती सांस, उठना-बैठना, खाना-पीना, सोना सबकुछ… तब जाकर आप उस स्थिति पर पहुँच सकेंगे कि साँसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम… अपने मन की मैं जानूं पी के मन की राम….

जब आप प्रेम में केन्द्रित हो जाते हैं तो फिर अपेक्षाएं छूट जाती हैं… प्रतीक्षाएँ टूट जाती हैं… शिकायतें भी रूठ जाती हैं… और प्रेम की डोर ऊर्जा के उर्ध्वगमन से अटूट हो जाती है… और ये डोर आपको सीधे परमात्मा के द्वार तक पहुंचाती है, जिसे हम मुक्ति या मोक्ष कहते हैं.

तो जब मैं कहती हूँ मैं इश्क़ हूँ दुनिया मुझसे चलती है, तो इसका यही अर्थ है मैंने इश्क़ को अपनी दुनिया बना लिया है… इश्क़ किससे, आशिक़ से या ईश्वर से… किसी से नहीं… प्रेम करना नहीं प्रेम हो जाना… इश्क़ करना नहीं इश्क़ हो जाना.

तो ध्यान को जीवन बना लेना है, जीवन को प्रेम और यही प्रेम आपको परमात्मा तक पहुंचाएगा… मोक्ष दिलाएगा.

– माँ जीवन शैफाली

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