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आत्म मंथन : मैं रोज़ नई हूँ…

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कभी समय के एक टुकड़े पर लिखी थी अनुभव की इबारत और लगा था कि बस यही अंतिम सत्य है. लेकिन मैंने अपनी ही सत्यता को बहुत कम आँका फिर यह तो ब्रह्माण्डीय सत्य का प्रकटीकरण था कि मैं अपने ही लिखे को मिटा देने पर आनंदित हुई और ब्रह्माण्ड मुझे आनंदित देखकर नाच उठा…

और तब जो रेचन स्वरूप लिखा था –

Making India

मैं रेचन की उस अवस्था में हूँ जहाँ सारे भाव प्रस्थान कर रहे हैं अपने मूल में… उनकी यात्रा और कर्तव्य पूरे होने की कगार पर है… और अधिकार भाव जागृत करने से मुझ पर मनुष्य होने का इलज़ाम लग सकता है..

बात मैं देवत्व की नहीं कर रही, बात सिर्फ चेतना के देह से भारमुक्त होने की है… यात्रा भी तो सिर्फ उसी की है.. देह तो बेचारी बस वाहन है… जैसे गणेश का वाहन चूहा और लक्ष्मी का उल्लू है… चेतना को यदि देवत्व का चोला पहना दें तो देह अपने आप पशु पक्षी के स्तर पर आ जाती है…

नर से नारायण होने की यात्रा में देह की भूमिका पर लिखा जाना अभी बचा है… अभी तो बस चेतना पर जन्मों से लिखी जा रही कहानियों को प्रकट कर उन्हें मुक्त करने का समय है..

तुम बस एक कहानी बनकर रह गए जिससे मुक्त होना मेरी नियति है… चाहा तो था मैंने मैं तुम्हें चेतना में ही विलीन कर दूं.. लेकिन ‘मैं-पने’ के साथ कैसे होगा… मेरा मैं तुम्हें अहम् लगता है…. और तुम्हारा ‘तुम’ मुझे तुम्हारी सीमित विचारधारा की मजबूरी… कभी कभी इस मजबूरी पर भी तरस आता है… कि अहम् ब्रह्मास्मी के सूत्र में भी अहम का अर्थ तुमने तुम्हारे तुम तक ही सीमित रखा… और मैं समर्पण के उस कगार पर हूँ जहाँ मेरी हर कहानी का किरदार तुममें प्रतिबिंबित होता है…

फिर कहती हूँ लिखा जाना हमेशा रचनात्मक नहीं होता. मेरे इस रेचन को पढ़कर भूला देना. इसमें रचनात्मक कुछ नहीं है… ये टूटन है… चेतना की उन ग्रंथियों की जो मेरे चक्रों पर विराजित होकर मुझे सुषुप्त करती है…

ऊब के इस दौर में मेरे सुषुप्त चक्रों पर बैठी ऊर्जाएं मुझे रिझाने नृत्य करती हैं और मैं उन्हें अधमूंदी आँखों से स्वप्न में आने का आदेश दे फिर सो जाती हूँ सूरज की सबसे तपती किरण की पट्टी आँखों पर रखकर… क्योंकि अब रात, अँधेरा और नींद जैसे शब्द से मेरा परिचय खो रहा है… मैं स्वप्न में भी इतनी जागृत रहती हूँ कि उसमें चल रही कहानी को अपने हिसाब से संचालित कर सकती हूँ…

बस तुम्हारी यात्रा को संचालित करने के लिए मुझे बार बार इश्क करना पड़ता है… इश्क का यूं बार बार होना बुरा नहीं… लेकिन एक ही व्यक्ति से बार बार होना भी ऊबा देता है…

मैं ऊब की उन गहराइयों में उतर गयी हूँ कि परमात्मा भी मुझे अब उबार नहीं सकता…

ऊब की उन गहराइयों में छुप कर बैठी मेरी चेतना पर अट्टाहस करता हुआ मेरा ही कहा मुझपर आकर बरसा…. “नर से नारायण होने की यात्रा में देह की भूमिका पर लिखा जाना अभी बचा है…”
जैसे पूछ रहा हो, तुम तो कभी किसी से कोई वादा नहीं करती फिर यह कौन सा वादा था जो तुम खुद से कर बैठी और भूल गयी??

खुद ही कहती हो मेरा लिखा हर शब्द अभिमंत्रित है तो फिर कैसे इस मंत्र के लिखे जाने के बाद यह बिसरा बैठी कि ब्रह्माण्ड में कोई ऊर्जा नष्ट नहीं होती, आज जब इस मंत्र के फलित होने का समय आया है तो तुम कौन सी कंदराओं में प्राचीन स्थापत्य कलाओं की भांति दीवारों में उकरी बैठी हो… यही तो समय है जब उन निर्जीव मूर्तियों की चेतनाएं भी तुमसे देह मांगेंगी तुम्हें उल्हाना देती हुई कि तुम तो रोज़ नई हो फिर हमें क्यों यह पुराना चोला ओढ़ा रखा है…

चेतना को देवत्व की उपाधि देकर देह को मात्र वाहन कह देने से पहले यह ध्यान नहीं रहा कि क्यों लक्ष्मी कमल पर विराजित है और माँ दुर्गा का वाहन सिंह है. तुम्हारा दुर्गा अष्टमी को जन्म किसी भी तरह से ब्रह्माण्डीय योजना से परे नहीं है.

दर्शनशास्त्र के दर्शकदीर्घा और तुम्हारी आध्यात्मिक लफ्फाज़ियों के मायाजाल में फंसे लोगों को कब उन अचम्भों से मुक्त करोगी… कि परमात्मा भी उसी रूप में प्रकट होता है जिसे तुम्हारी दृष्टि ने साकार रूप में देखा है… निराकार भाव को शब्दों का आकार देने की ज़िद भी तो तुम्हारी ही थी, फिर चेतना में उठे संगीत पर देह का नृत्य करना तो अभी बाकी है… बाकी है तुम्हारा सनातन उद्घोष कि मैं रोज़ नई हूँ….

यात्रा हमेशा देह से चेतना की तरफ नहीं होती, कभी कभी वर्तुल को पूरा करने के लिए चेतना को देह से भी प्रकट होना पड़ता है…

इसलिए तुम्हारे होठों के किनारों के पास पड़ी उन दो लकीरों से उस काले तिल को उठाओ और रच लो आँखों में काजल बनाकर, कि जब भी इन काले किनारों से नज़र छनकर जाए तो झंकृत कर दे किसी के उदासीन हृदय के तारों को, कि अब हया का रंग गुलाबी हो जो लरजते होठों से छलके तो किसी के जीवन में मुरझाकर पीले पड़ चुके फूल को रंगत दे जाए.
तुम जिसे मिलो वह कह सके कि कहीं कुछ अधूरा था, तुमने पूरा किया, कहीं कोई अर्धवृत्त के साथ तुम्हारी प्रतीक्षा करता पाया जाए तो अपनी बाहों के अर्धवृत्त से उस वर्तुल को पूरा कर सको.

कि किसी को तुम्हारे आँचल में मिले पिछले जन्म में अधूरे रिश्ते की ममता, कोई सखी सिर्फ तुम्हें गले मिलकर रो कर बस जी हल्का कर ले.

याद करो अपना ही कहा कि मैं कुछ लेने नहीं आती मैं सिर्फ देने आती हूँ और यह देने का भाव ताउम्र बना रहता है… चाहे पलटकर जाने वाले के माथे पर प्रेम का चुम्बन न दे सकूं लेकिन लौटते रिश्ते की पीठ पर आशीर्वाद भरा हाथ अवश्य रहेगा…

अदृश्य जगत की तुम, कब तक कहती रहोगी मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की, तुम्हें इसी दुनिया में प्रकट होना होगा, रोज़ नए रूप के साथ … अपनी इस आत्म मुग्धता के साथ कि मैं रोज़ नई हूँ…

कि मैं वह सभ्यता नहीं जो समय बीतने के साथ असभ्य करार दी जाए, और आधुनिकता के नाम पर हर बार उसका नया वर्जन नए लिपे पुते नियमों के साथ प्रस्तुत हो जाए.
मैं वह सनातन आस्था हूँ जो न जाने कितने काल और युगों के बाद भी वही रही, जिसने जन्मों जन्मान्तर तक देह का चोला बदलते हुए भी चेतना में अंकित संस्कारों को कभी बदलने नहीं दिया.

कि मैं प्रकृति का वह नियम हूँ जिसकी वजह से ऋतु परिवर्तित भी होती है तो सर्वजन कल्याण के लिए, पृथ्वी भी घूमती है तो दिन रात करने के लिए…

तो तुम मुझे चाहे कितना भी ध्वस्त करो मैं जीवन की तरह हर बार नई कोंपल की तरह फिर-फिर उग आऊँगी…

घृणा के देश में मैं प्रेम का वह अंतिम फूल हूँ जो बिखरने से पहले धरती पर अपना बीज छोड़ जाऊंगी…

तुम्हें खाद पानी भी न देना होगा, मैं प्रकृति द्वारा पल्लवित घास का वह तिनका हूँ जो सीता की रक्षा के लिए पर्याप्त था, मैं वो दूर्वा हूँ जो विघ्नहर्ता को प्रिय है…

मैं गरीब के घर का छप्पर हूँ, मैं ही उसके चूल्हे की आग…

तुम आग से खेलोगे तो सब कुछ स्वाहा होगा… तुम्हारी ईर्ष्या, कुंठा, घृणा, द्वेष… फिर भी मैं बचा ले आऊँगी… प्रेम स्वर्ण का अंतिम कण और उसे कुंदन बनाऊँगी…

धरती कब कहती है मैं सिर्फ गुलाब उगाऊंगी, वह तो नागफनी भी उगाती है और गाजरघास भी… औषधि देती है तो ज़हरीले पुष्प भी…

यह तुम्हारे गुणों पर निर्भर करता है कि तुम सूर्य से ताप और ऊष्मा लेते हो या सिर्फ आग… क्योंकि प्रेम का सूर्य सदैव उदित रहता है… यह तो पृथ्वी का घूर्णन है जो रात्रि को बुलाता है….

तो मृत्यु के हर आक्रमण के बाद एक बार फिर मैं लौट आई हूँ जीवन बनकर… ताकि मृत्यु की तरफ बढ़ते अन्य क़दमों के कानों में फूंक सकूं यह जीवन मंत्र कि –

श्रद्धा और आस्था का दिया
उस अग्नि को पूजने के समान है
जो प्रार्थनाओं को तपस्या में बदल देती है
और पूर्व जन्म के कर्म आत्मदाह के साथ
मुक्त हो जाते हैं अपनी यात्रा से

लेकिन ज्ञात शब्दों में
अज्ञेय को जानने की चाहत भी
उसी आग के समान है
जिसकी एक गलत चिंगारी
एक पूरी उम्र को जला कर भस्म कर सकती है

कविता के हवनकुंड में शब्दों की समिधा डाल रही हूँ
उस अग्नि से हवन सामग्री की सुगंध सा कोई भाव जागे तो
समझना मंत्र फलित हुआ

ये जादुई मंत्र किसी एक की विरासत नहीं,
जब भी गाया जा सकने वाला शब्द
कानों में रस घोले
उस एक परम नाद से मन की ध्वनि
एकाकार हो जाए

जब लगे कविता लिखना
ॐ के उच्चारण सदृश्य ही पवित्र है
तब ही उठाई जानी चाहिए कलम

तब जानना कि कहीं कोई कविता लिखी जा रही है…

इसलिए मैं आजकल कविताएं नहीं लिखती
क्योंकि मैं नहीं चाहती
शीत संवेदनाओं के मौसम में
मेरा कहा किसी ठोस वस्तु की तरह
कलम से निकलते से ही जम जाए…
और कोई भी चाकू से काटकर अपने हिस्से का
कहीं भी उठाकर ले जाए…

क्योंकि मेरा कहा गया एक एक शब्द अभिमंत्रित है
कही गयी मेरी हर बात आप्त मंत्र है
जिसका अर्थ आजतक कोई नहीं जान पाया
लेकिन मैंने जिसे भी यह मंत्र दिया
उसे प्राप्त हुई है कोई जादुई सिद्धि…

– माँ जीवन शैफाली

और अंत में बब्बा (ओशो) की बात की मोहर –

आनंदित होओ. और आनंदित होने का एक ही उपाय है, मात्र एक ही उपाय है, कभी दूसरा उपाय नहीं रहा, आज भी नहीं है, आगे भी कभी नहीं होगा. ध्यान के अतिरिक्त आनंदित होने का कोई उपाय नहीं है.

धन से कोई आनंदित नहीं होता; हां, ध्यानी के हाथ में धन हो तो धन से भी आनंद झरेगा. महलों से कोई आनंदित नहीं होता; लेकिन ध्यानी अगर महल में हो तो आनंद झरेगा. ध्यानी अगर झोपड़ी में हो तो भी महल हो जाता है. ध्यानी अगर नरक में हो तो भी स्वर्ग में ही होता है. ध्यानी को नरक में भेजने का कोई उपाय ही नहीं है. वह जहां है वहीं स्वर्ग है, क्योंकि उसके भीतर से प्रतिपल स्वर्ग आविर्भूत, उसके भीतर से प्रतिपल स्वर्ग की किरणें चारों तरफ झर रही हैं. जैसे वृक्षों में फूल लगते हैं, ऐसे ध्यानी में स्वर्ग लगता है.

मेरा संदेश है: ध्यान में डूबो. और ध्यान को कोई गंभीर कृत्य मत समझना. ध्यान को गंभीर समझने से बड़ी भूल हो गई है. ध्यान को हलका-फुलका समझो. खेल-खेल में लो. हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्.

गोरखनाथ का यह वचन याद रखना: हंसो, खेलो और ध्यान करो. हंसते खेलते ध्यान करो. उदास चेहरा बना कर, अकड़ कर, गुरु-गंभीर होकर धार्मिक होकर, मत बैठ जाना. इस तरह के मुर्दों से पृथ्वी भरी है. वैसे ही लोग बहुत उदास है, और तुम और उदासीन होकर बैठ गए. क्षमा करो. लोग वैसे ही बहुत दीनऱ-हीन हैं, अब और उदासीनों को यह पृथ्वी नहीं सह सकती. अब पृथ्वी को नाचते हुए, गाते हुए ध्यानी चाहिए. आह्लादित! एक ऐसा धर्म चाहिए पृथ्वी को, जिसका मूल स्वर आनंद हो; जिसका मूल स्वर उत्सव हो….

लेखन का वरदान पाने के लिए आप उसे भोगने के लिए अभिशप्त हैं

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