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बाहर के अनुभव, अंतर की यात्रा

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जब मैंने आंखें खोली, पाया स्वयं को एक सुंदर निर्जन टापू पर।

सुबह जागता, सागर में नहाता, नारियल और मछली खाता, नमकीन सिक्ता पर पत्ते बिछा, डूबते सूरज को निहारता।

रात को अग्नि जला, धारणा करता, एक से दो होने की। नसों में रक्त उबलता, और एक दिन, फलीभूत हुआ संकल्प मेरा। निविड़ अंधकार में एक छायाकृति आकर मुझसे लिपट गई। वह चिति थी। मेरी चिति, प्यारी चिति।

अब टापू स्वर्ग बन गया। हम बातें करते, खेल खेलते और एक दूसरे को छेड़ते। हमारी बातें कभी खत्म ही नहीं होती। चिति मेरी, मैं चिति का। मेरे और चिति के साथ, तब, एक और प्राणी आया, प्रकृति।

चिति चैतन्य। प्रकृति जड़। जब मैं बीच में से हट गया, प्रकृति हिलने डुलने लगी। वह चिति का आलिंगन कर मुस्कुराने लगी। जो काम चिति न कर सकी, वह प्रकृति करने लगी। वह बहुत चंचल हो गई। शांत होने का नाम ही न लेती।

उसके पहला प्रसव हुआ महत का। इसे ही हम प्यार से बुद्धि कहते थे। वह बहुत सौम्य, स्वच्छ और पतला था। चिति हर समय उसके साथ खेलने लगी।

तब, प्रकृति के दूसरा प्रसव हुआ अहंकार… वह हर समय मैं मैं पुकारता। बड़ा ही पहलवान। बड़ी आंखें, बड़े गाल, चलता तो बड़े बड़े कदम भर कर। सीना ताने, सबको धमकाता फिरता, हर समय लड़ने को तैयार।

जब वह वयस्क हुआ तो चिति से सारा काम छीन लिया। अब जो करना है, मैं ही करूँगा।
चिति हँसी!!
अच्छा,,,! कर। तू ही कर। कर और भुगत। अब चिति शान्त।

मैं तो वैसे भी पीछे हट गया। अहंकार ने सारे सूत्र सम्भाल लिए। तब एक दिन अहंकार के आंगन में भी किलकारी गूंजी।

मन ने जन्म लिया। वह बहुत ही चंचल, अस्थिर और रूप बदलने में माहिर। पकड़ो तो फिसल जाए। काला कहो तो सफेद बन जाय। छोटा कहो तो बड़ा हो जाय। जब से मन आया, सबकी नाक में दम कर रखा है।

अहंकार पकड़ने दौड़ता तो छूटकर भाग जाता। बुद्धि इसे समझाता। लेकिन मन नहीं माना।
वह साउथ के हीरो की भांति अपने स्थान पर गोल गोल घूमने लगता। उससे तूफान उठने लगे।

बवंडर और उथल पुथल। आकाश बना। वायु बना। अग्नि बना। जल बना। पृथ्वी, वृक्ष और प्राणी बने। ज्ञानेन्द्रियाँ बनीं। मनुष्य बना। मैं से मेरे परिवार का विस्तार हो गया।

आप और मैं…
आप भी तो मैं ही हूँ।
कुछ समझ आया?
नहीं…..?
तपस्या करो तब समझ में आएगा।
मैंने भी तो तपस्या की थी।

– केसरी सिंह सूर्यवंशी

चरित्रहीन -2 : मैं ईश्वर की प्रयोगशाला हूँ

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