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बिना एलोपैथिक दवाई के एक डॉक्टर ने दूर किये खुद के असाध्य रोग

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छात्र जीवन में ही मेरे पिता की मृत्यु हो गई. मेडिकल स्टूडेंट होने के नाते पीछे नज़र घुमा कर देखा तो पाया मेरे दादाजी सहित कई पारिवारिक पुरुषों की मृत्यु वरिष्ठ नागरिक बनने से पूर्व ही हुई. कारण तलाशा तो सभी हृदय रोग, डायबटीज, हाई ब्लडप्रेशर से हुये शारीरिक नुकसान के चलते जल्द ही इस संसार से विदा हुये. समझ में आ गया था मेरे परिवार का कोई जीन्स इन बीमारियों को ढो कर सब तक पहुंचा रहा था.

अब मेरे पास दो ही विकल्प थे खानपान जीवन शैली में परिवर्तन करूं या ऐसे ही जीवन व्यतीत करते हुये पारिवारिक लिस्ट का हिस्सा बन जाऊं. अब युवावस्था में नियम संयम धारण करना हर एक के बस का नहीं तो मेरे भी बस में कैसे होता. मुझे कोई नियम बंधन स्वीकार ना थे दिनचर्या में और इन रोगों का शिकार भी नहीं होना चाहता था.

आज से दस वर्ष पूर्व मेरे बैक पेन होना शुरु हो गया और इतना बढ़ गया कि बैठ कर उठ चलने में पांच सात मीटर झुक कर कमर पर हाथ रख चल पाता था.

आज मेरा दावा है मैं अपने से आधी उम्र के युवा के साथ कदमताल मिला सकता हूं वह थक जायेगा पर मैं नहीं.

चार साल पहले नहाने जाने के लिये जैसे ही कपड़े उतारे पत्नी चीख कर बोली हाय इतना आपको किसने मारा?
मुझे भला कोई क्यों मारेगा ऐसा क्यों बोला?
अरे अपनी पीठ और जांघ देखिये कितने लंबे लंबे नीले निशान पड़े हैं जैसे किसी नें बेंत से पीटा हो.
मैंने शीशे में अपनी पीठ देखी सच में पूरी पीठ में ऐसे निशान थे जैसे किसी ने डंडे से जम कर मारा हो.

कृपया गूगल कर लें या अपने फेमिली डॉक्टर से पूछ लें ऐसे निशान किस गंभीर बीमारी में पड़ते हैं.

आज शरीर पर ऐसा एक भी निशान नहीं है.

छह सात साल पहले cluster head का शिकार हुआ जिसमें माथे पर टीका लगाने वाले स्थान पर भयानक पीड़ा होती है लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं है और यह जीवन भर साथ निभाता है. तीन तीन दिन इस दर्द से मरीज तड़पता रहता है कोई पेनकिलर भी राहत नहीं देती.
पांच साल पहले ही इससे निजात पा चुका हूं.

कई माह से लगातार वज़न गिरने और सात किलो वेट घट जाने पर तमाम जांचे नॉर्मल मिलने पर रिच डाइट लेने लगा फिर भी वज़न ना बढ़ा. व्यग्र मन को यह कह कर शांत किया कि हो सकता है यह सात किलो मेरे शरीर का संतुलन बिगाड़ रहे हों इसीलिये शरीर ने स्वत: ही इनको कम कर दिया. अब सामान्य डाइट ही ले रहा हूं और वजन घटना भी रुक गया है. सारे तनाव से मुक्ति मिली सिर्फ सोच की दिशा परिवर्तित कर के.

जो युवक मुझसे मेरी प्रेक्टिस के शुरुआत से चिकित्सीय परामर्श ले रहे हैं और अभी तक मुझसे जुड़े हुये हैं और आज मेरी ही तरह प्रौढ़ हो चले हैं उनमें से भी अधिकांश किसी भी प्रकार के जटिल रोग से पीड़ित नहीं हैं.

और हां डॉक्टर होते हुए भी पीठ पर पड़े निशानों के लिये कोई दवा ना ली और ना हीं क्लस्टर हेड के दर्द में. बैक पेन के लिये सबने कैल्शियम सप्लीमेंट लेने की सलाह दी पर मेरा मानना था कि जो डाइट मैं ले रहा हूं वही कैल्शियम प्रोड्यूस करेगा भले ही उसमें कैल्शियम नाममात्र का ना हो.

आज “रोग जीत” बनने के मंत्र आप सबको बतलाने जा रहा हूं जो पिछले तीस साल से मैं अपनाये हुये हूं व बराबर अपने मरीजों के कान में फूंकता रहता हूं. ध्यान से पढ़िये अच्छा लगे तो अपनाइये अन्यथा लेख से बाहर निकलने का विकल्प आपके लिये खुला ही है.

वह चार मंत्र हैं—-

“मुझको कुछ नहीं हो सकता”

” लक्षण तो सारे वही है पर मुझको नहीं हुआ है”

“यह जो शरीर के साथ अनपेक्षित घटता देख रहा हूं यह अल्पकालिक है और मैं इस अवस्था/ पीड़ा से अवश्य ही बाहर निकल आऊंगा”

“मुझे यमराज मृत्यु तब तक नहीं दे सकते जब तक कि मेरी सहमति उसमें शामिल ना हो”

देखिये शरीर को एक गाड़ी मानिये जैसा गाड़ी पर ड्राइवर नियंत्रण रखता है वैसे ही हमको भी रखना है. कुछ ड्राइवर आपने ऐसे देखे होंगे जो गाड़ी बहुत संभाल कर ट्रैफिक नियमों का पालन करते हुये चलाते हैं जैसे नियम संयम से जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति.
दूसरे किस्म के वह ड्राइवर होते हैं जिनको गाड़ी चलाते देख लोग चिल्लाते हैं अब मरा तब मरा पर वे शरीर क्या गाड़ी पर तक एक भी खरोंच नहीं आने देते हैं. यह वैसा ही है जैसे असंयमित खानपान दिनचर्या वाले व्यक्ति का रोगमुक्त रहना.

मेरे एक संबंधी हैं रिटायर हो चुके हैं जीवन में कभी बीमार नहीं हुये. घर के सारे कार्य खुद करते थे, चाहे गेंहू पिसाने का हो, चाहे एजेंसी से सिलेंडर लाना हो. बसों में भागते दौड़ते चढ़ जाते थे. एक बार अपने बेटे बहू के पास दिल्ली गये. एक रात बेटा बोला पापा कल मेरे साथ हॉस्पिटल चलियेगा आपका हेल्थ चेकअप करवाना है.
मुझे भला क्या हुआ है जो मैं इन चक्करों में पड़ूं.
अब बहू ने काफी अनुनय विनय करी तो बेचारे तैयार हो गये.
तमाम जांचे हुईं बताया गया कि हार्ट के एक वाल्व को रक्त भेजने वाली आर्टरी ब्लॉक है पर कुदरत ने चमत्कारिक रूप से कुछ छोटी छोटी रक्त वाहिकाओं का जाल तैयार कर दिया था जो उस वाल्व तक रक्त पहुंचा रहीं थीं. डाक्टर्स ने आपरेशन की सलाह दी. थोड़े नानुकुर के बाद वह भी आपरेशन के लिये तैयार हो गये.

अब वह चार कदम चलने में हांफते हैं और जो कुदरत ने वाहिकायें बना कर स्वस्थ जीवन का तोहफा दिया था उसने भी अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध हो कर कार्य करना बंद कर दिया.

कहने का आशय यह है कि शरीर अपनी विसंगतियों को रिपेयर करने का कार्य स्वयं ही करता है यदि हम अनाधिकृत हस्तक्षेप ना करें.

– डॉ आलोक भारती

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