Menu

एक विवाह ऐसा भी

0 Comments


विवाह को न जाने क्यूं हमारे यहाँ सिर्फ रस्म से जोड़ लिया गया है, विवाह एक भाव है कि जब भी दो चेतनाएं मिल कर अपना वर्तुल पूरा करेंगी विवाह घटित होगा… ये विवाह दो चेतनाओं के बीच की बात है.

वैसे ही हर वो भाव जो चेतनाओं के साथ जुड़कर अपना वर्तुल पूरा करे, वहां विवाह घटित होगा. विवाह शब्द कदाचित आपके अन्दर प्रश्न उत्पन्न करेगा, आप मेरे इस शब्द प्रयोग पर हसेंगे भी, लेकिन जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ मेरा शब्दकोष बहुत सीमित है और भावकोष इतना विस्तृत कि कई बार मेरे भावों के प्रकटीकरण के लिए मुझे शब्द नहीं मिल पाते.

जैसे, कृष्ण की सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियाँ होते हुए भी वो उनकी पत्नियां नहीं थीं, और राधा के संग विवाह नहीं हुआ था, तब भी वो दो ऊर्जाओं के एकात्म की बात है…

इसलिए सामाजिक रूप से आप इस शब्द को स्वीकार ना कर सके, तो सिर्फ भाव स्वीकार कीजिये, कि राम और सीता का विवाह दो तत्वों का मिलन है, शिव और पार्वती का विवाह दो ऊर्जाओं का मिलन है, विनायक का रिद्धि सिद्धि से विवाह दो संस्कारों का शुभता के साथ गठबंधन है.

विष्णु का लक्ष्मी से विवाह हो या गौतम ऋषि का अहिल्या से विवाह और फिर त्याग, शालिग्राम और तुलसी का विवाह हो या द्रौपदी का पांच पांडवों से…

हमारे ग्रन्थ में हर कथा के पीछे कोई न कोई सन्देश संकेत रूप में अवश्य होता है… लेकिन हम उन संदेशों को ग्रहण करने के बजाय, कहानी का उद्देश्य समझने के बजाय, पात्रों के अभिनय और कहानी के दृश्यों में उलझकर ही रह जाते हैं.

कथाएँ काल्पनिक भी हो सकती हैं, वास्तविक भी, लेकिन उसके पीछे के सन्देश काल्पनिक नहीं होते. धर्म पथ पर चलने के लिए देवताओं तक को श्राप और कलंक माथे पर लिए घूमना पड़ता है…

लेकिन ये धर्म पथ पर चलने का ही पुरस्कार है कि श्राप भी आशीर्वाद में बदल जाता है… लेकिन आपको उसके लिए धर्म का वास्तविक अर्थ भी अनुभव से ज्ञात होना चाहिए, सिर्फ किसी पुस्तक में इसका अर्थ पढ़ लेना काफी नहीं.

और इसका भी अर्थ जानना होगा कि क्यों देव सो जाते हैं तब विवाह नहीं होते और देवों के जागने पर ही विवाह संपन्न होते हैं. और जब देव जागते हैं तो हमारे यहाँ देव उठनी एकादशी के रूप में बाकायदा उत्सव होता है. क्योंकि हम उत्सव प्रेमी लोग हैं, सामाजिक से लेकर आध्यात्मिक जीवन तक हमने इन उत्सवों में बाँध लिया है, हम सूली पर लटके रोनी सूरत वाले ईश्वर की पूजा या ईश्वर के नाम पर बच्चों के माथे पर चाकू से गोदकर खून बहाने जैसा काम नहीं करते.

इसलिए विवाह भी हमारे यहाँ एक उत्सव है, जहाँ दो व्यक्ति नहीं, दो परिवारों को, उनकी सामूहिक ऊर्जा को एक साथ जोड़े रखने का भाव होता है क्योंकि हम जानते हैं जब ऊर्जा संगठित होती है तो बड़े बड़े जादू कर जाती है… हालांकि आज के राजनीतिक माहौल में हम यह भूला बैठे हैं कि आप वाकई कोई जादू घटित होता देखना चाहते हैं तो संगठित होना अनिवार्य है.

खैर यहाँ में उन सूक्ष्म संकेतों की बात कर रही थी कि कैसे हिन्दू ग्रंथों में लिखी कहानियां हमें संकेत देती है, हाँ बाकी कुछ क्रियाएं ऐसी भी होती हैं जो सामान्यजन की बुद्धि और व्यवहार में नहीं आ पाती क्योंकि कुछ रहस्य ऐसे भी हैं जो जीवन ऊर्जा को एक अलग ही आयाम में ले जाकर काम करते हैं, जहाँ यह सामाजिक नियम काम नहीं आते. बल्कि कई बार सृष्टि के स्वर्णिम नियमों के पालन के लिए समाज के मिट्टी के नियम ध्वस्त भी करना पड़ते हैं. जैसे उपनिषद को समझने के लिए आपको गुरु का सानिध्य आवश्यक है, जब गुरु और शिष्य की तरंगे एक आवृत्ति में तरंगित होती हैं, तभी वह संकेत गुरु से शिष्य में स्थानांतरित हो पाते हैं, वहां लिखे गए शब्द भी पहुँचने में असफल हो जाते हैं.

इसलिए जब असुर जलंधर की आसुरी शक्ति से हारे शिव ने जब धरती को बचाने विष्णु का आह्वान किया तो विष्णु ने जलंधर का रूप धर उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रत धर्म नष्ट किया…

अब सोचिये कैसे किसी व्यक्ति की आसुरी शक्ति उसकी पत्नी का शील भंग कर कमज़ोर हो सकती है. हमारे नारीवादी लोग इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते कि एक पुरुष की शक्ति का स्त्रोत नारी ही है…

वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपने पुरुष की शक्ति की सहभागिनी होती है… ब्रह्माण्ड का शिव और शक्ति के दो बिम्बों पर खड़े होना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…

जलंधर की शक्ति तो क्षीण हुई, लेकिन वृंदा जो देवताओं के इस षडयंत्र से अनभिज्ञ थी समझ नहीं पाई कि देवता भी जब परनारी का भोग करते हैं… तो उसके पीछे किसी असुरी शक्ति को नष्ट करने का ही उद्देश्य होता है…

आम मानव कदाचित इसे धर्म के विपरीत बात समझे, इसे आम बलात्कार से जोड़कर देखेगा, लेकिन एक तांत्रिक इस यांत्रिक क्रिया का अर्थ भली भांति समझ सकता है…

वृंदा भी सामाजिक मर्यादा से ऊपर की बुद्धि नहीं रखती थी… तो उद्देश्य समझ नहीं पाई और विष्णु को श्राप दे बैठी…

विष्णु ने श्राप सहज स्वीकार किया, उस नारी का जिसे उसने स्पर्श किया था… उसका दिया हुआ उपहार उन्हें स्वीकार था… विष्णु पत्थर के हो गए…

देवता इस अनअपेक्षित परिणाम से चिंतित हो उठे… ब्रह्माण्ड की तीन शक्ति में से एक यदि पत्थर हो जाएगी तो ब्रह्माण्ड टिक नहीं पाएगा… इसका अर्थ ही यह है कि यहाँ विष्णु  एक पुरुष मात्र प्रतीक के रूप में हैं, वास्तव में ब्रह्माण्ड की तीन मूलभूत शक्तियों में से एक की बात हो रही है…

तो सब देवता मिलकर वृंदा के पास गए… उसे उद्देश्य और कारण समझाया… लेकिन वृंदा को समझ आता इसके पहले श्राप उसके मुंह से निकल चुका था…

हर नारी यदि बोलने से पहले ये बात समझ ले कि उसके मुख से निकलने वाला हर शब्द ब्रह्माण्ड की व्यवस्था को प्रभावित करता है तो उसे अपनी उस शक्ति का दर्शन होगा जिसे वो परमात्मा की शक्ति समझ कर पूजती है…

जिस दिन उसे अपनी इस शक्ति का अनुभव हो जाएगा उस दिन वो उस अवस्था को प्राप्त कर लेगी जहां उसे पूजा जाएगा…

वृंदा ने श्राप वापस लेने का प्रयास किया, लेकिन विष्णु जिसने उसके साथ बलात्कार नहीं किया था बल्कि उसके पति का रूप धर पत्नी के रूप में प्रेम किया था, उस प्रेम को भुला नहीं पाया…

कहते हैं मनुष्य की आत्मा चाहे सबकुछ भूल जाए लेकिन उसकी देह को सारे स्पर्श हर जन्म में याद रहते हैं…. उसे देह की सुगंध याद रहती है… विष्णु के मानस पटल पर वृंदा का एक स्पर्श इतनी गहराई में छाप छोड़ गया था कि उस एक सम्भोग के बाद उन्होंने वृंदा को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था…

और फिर उन्होंने शालिग्राम का रूप धरा और वृंदा को वचन दिया कि यदि वृंदा के रूप में तुम खुद को कलुषित समझती हो तो मैं आशीर्वाद देता हूँ कि अगले जन्म में तुम पूजनीय तुलसी का रूप पाओगी और यही सामाजिक प्राणी हमारा विवाह करेगा…

वो दिन और आज का दिन … कार्तिक, शुक्ल पक्ष, एकादशी को विष्णु शालिग्राम के रूप में वर हैं और वृंदा तुलसी के रूप में वधु और हम उस विवाह के साक्षी हैं, जो जब ब्रह्माण्डीय रूप धर लेता है तो सामाजिक परम्पराएं भी उसे स्वीकार कर लेती है…

यह आवश्यक नहीं कि हर किसी की बुद्धि वहां तक काम करे ही, किसी फिल्म को देखते हुए जैसे कुछ लोग आगे की पंक्तियों में बैठकर सीटी बजानेवाले भी होते हैं, कुछ सिर्फ फिल्म के गाने पर अपनी राय दे जाते हैं, कोई फिल्म के संवाद पर.

एक फिल्म को उसकी सम्पूर्णता से देखने के लिए आवश्यक नहीं कि आपको फिल्म मेकिंग की सारी विधा आना आवश्यक है, यहाँ सिर्फ और सिर्फ आपकी छठी इन्द्री काम करती है कि कैसे पांच इन्द्रियों के अनुभव को एक साथ घोलकर आप उसका सार तत्व निकाल पाते हैं.

और यह छठी इन्द्री सिर्फ पुस्तकें और ग्रन्थ पढ़कर विकसित नहीं होती, उसके लिए हमारे ऋषियों ने ध्यान की कई विधियां बताई हैं. यहाँ ध्यान का मतलब यह नहीं कि आँख बंद करके तीसरे नेत्र पर केन्द्रित हो गए. यहाँ ध्यान वह भी है जब आप किसी के साथ संवाद कर रहे होते हैं और आपके द्वारा कही गयी किसी बात पर सामने वाला कह उठे अरे आपको कैसे पता मैं यही तो कहना चाहता या चाहती थी… और आप मुस्कुराकर कह सको…. मैं इसे ही तो जादू कहता या कहती हूँ.

और यकीन मानिए यह जादू घटित होता है, हर उस विवाह में घटित होता है जहाँ दो चेतनाएं एक ही स्तर पर विराजित होती है. यहाँ स्तर का अर्थ उच्च या नीचे का स्तर नहीं… एक ही तरंग और एक ही आवृत्ति की बात कर रही हूँ…. और जहाँ यह वर्तुल पूरा नहीं हो पाता वह विवाह टूटता भी है. फिर भी हिन्दू समाज में यह व्यवस्था अभी उतनी नहीं चरमराई, जितनी विदेशों में ध्वस्त हो चुकी है या इस्लामिक व्यवस्था में जिस तरह से तलक और हलाला जैसी अजीब व्यवस्था है.

इसलिए हमारे यहाँ फेरों के समय मंत्रोच्चार का महत्त्व है, क्योंकि ध्वनि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, वह सदैव आपके सम्बन्ध के साथ आपके आभा मंडल में विद्यमान रहती है कि जब कभी आप इससे विचलित हो जाएं तो वह आपको फिर फिर संभाल लेती हैं.

और इतनी गहरी बात वही व्यक्ति समझ सकता है जो सनातन धर्म का अर्थ जानता हो, या सिर्फ धर्म का वास्तविक अर्थ भी जानता हो तो भी काफी है, सामान्य जीवन शैली में रस्मों और कर्म काण्डों का अपना महत्त्व है, हाँ जो इन्हें साक्षी भाव से देखते हुए यह पड़ाव पार कर जाता है, आगे की यात्रा को देख पाता है.. वह इन रस्मों और कर्म काण्डों पर निर्भर नहीं रह जाता, इन सारी व्यवस्थाओं में रहते हुए भी वह इन व्यवस्थाओं में बंधा नहीं होता.

आप व्यक्तिगत स्वतंत्रता न जाने किसे कहते हैं… मेरे लिए वास्तविक स्वातंत्र्य यही है कि मैं जो चाहे करने के लिए पूरी तरह मुक्त हूँ फिर भी मेरी हर अगली सांस परमात्मा की कृपा और आदेश से चलती है, मेरा कहा गया एक भी शब्द मेरा होते हुए भी, मेरा नहीं होता, मेरा जीवन मेरा होते हुए भी मेरा नहीं है… मैं ईश्वरीय सत्ता के स्वर्णिम नियमों में पल रही सबसे मुक्त चेतना हूँ. और इस दुनिया की बातें करते हुए भी मैं बार यही कहती हूँ मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की…

तो यदि आपको समाज की किसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर पाते इसका अर्थ है आप उससे गुज़रकर उसे समझकर उससे ऊपर उठ चुके हैं, और जो व्यक्ति ऊपर उठता है वह नीचे दिख रही किसी भी चीज़ के प्रति कोमल दृष्टि रखता है, सहानुभूति रखता है, उसके सकारात्मक-नकारात्मक पहलू को देखते हुए उसे संसार के लिए और अधिक लाभदायी बनाने के लिए प्रयासरत रहता है…. बाकी आपका विवेक आपकी विनयशीलता आपका आध्यात्मिक आभामंडल आपके शब्दों और कृत्यों से ही बनता है, जो आपके अपने हाथ में हैं.

– माँ जीवन शैफाली

वो दुनिया मेरे बाबुल का घर … ‘ये’ दुनिया ससुराल…

 

Facebook Comments
Tags: ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!