ये जो रुख़सार पे तिल सजा रखा है, दौलत-ए-हुस्न पे कातिल बैठा रखा है

मित्रों, सुई की नोक जितना छोटा तिल भी रुख़सार में कशिश डाल देता है। यह बात बताती है कि हमारा किरदार सूक्ष्म विशेषताओं से भी किस कदर निखर सकता है।

आपका कोई एक छोटा सा गुण भी आपके व्यक्तित्व में सुगंध उत्पन्न कर सकता है। ईश्वर की कृपा दिला सकता है।

श्वेताम्बर जैन तेरापंथी आचार्य ब्रम्हलीन श्री तुलसी ने इसी संदर्भ में “अणुव्रत सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, जो बहुत ही व्यवहारिक सिद्धांत है। कभी समय मिले तो अवश्य पढ़ियेगा।

जीवन में छोटे छोटे व्रत लीजिये, तिल समान। यही व्रत ले लीजिए कि आप कमरे से निकलते समय सभी गैर जरूरी स्विच ऑफ करेंगे। यह भी एक इबादत है, अगर किरदार में ढाल ली जाय।

इबादत है क्या हम क्यों करे इबादत, इसका ब्रह्म से क्या रिश्ता जैसे सैकड़ों प्रश्न मेरे पुत्र जितनी उम्र के (22-25) बच्चों के मन में आते हैं। वह पूरी उम्र जिसमें इबादत शुरू हो कर जवाब मिल जाना चाहिए था, सवालों में ही बीत जाती है।

पूजा, जाप, आसन का महत्व इसलिए नहीं है कि ईश्वर देख सुन के खुश होगा। वह न तो कभी खुश होता है, न दुखी, एक आनंद भाव में खोया रहता है।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं,
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

वह तो साफ़ मना कर रहा है।

तो क्या पूजा पाठ नाम जप सब निरर्थक है?

फिर दूसरी तरफ कह रहा है कि

कलजुग केवल नाम अधारा।

इन दो बातों में इतना विरोधाभास क्यों?

मित्रों ये विरोधाभास नहीं है। पहली धारणा उसने अपने स्वभाव के बारे में दी है जबकि , दूसरी हमारे बारे में है।

वस्तुतः सारा खेल संकल्प शक्ति के विकास का है। मित्रों सहज बुद्धि की बात है कि जिस सृष्टि में हमारा प्रवेश ईश्वर के संकल्प से हुआ, उस सृष्टि को अपने अनुकूल बनाने या उससे बाहर निकलने के लिए भी तो ईश्वरीय संकल्प के तुल्य संकल्प ही चाहिए।

ये व्रत, तप, नाम, जप धीरे-धीरे हमारी संकल्प शक्ति को उसी स्तर पर ले जाते हैं। इंद्रियों को अनुशासित करते हैं। हमारा मन एक फूटी बाल्टी समान है जिसमें छोटे-छोटे छिद्र अनुशासनहीनता, लापरवाही के रूप में है, जिसमें से हमारी संकल्प शक्ति लीक होती रहती है। अपना वॉल्यूम नहीं बढ़ा पाती।

धीरे धीरे छोटे छोटे नियमों से इन छेदों को बंद करो। छोटे संकल्प का अभ्यास ही बड़े संकल्प की ओर ले जाएगा। संकल्प में ही सारी शक्ति निहित है। उसे जागृत करो।

पंखे का स्विच बंद करना, राह का पत्थर हटा देना, किसी अनजान की मदद कर देना, किसी मजलूम को तन मन धन से सहयोग न कर पाओ तो कोई हर्ज़ नहीं मगर मन में उस के प्रति दया भाव रखना, ये सब भी वही संकल्प शक्ति उत्पन्न करता है जो जप तप से आती है। लेकिन होना नियमित, अनुशासन आवश्यक है।

कोई एक नियम पाल लो, कोई एक ईष्ट को पकड़ लो, कोई एक सिद्धांत बना लो, आपका काम बन जाएगा।

वाल्मीक ने नाम रट पकड़ा, हरिश्चन्द्र ने सत्य, तो महावीर ने अहिंसा को पकड़ा, विठोबा ने माता पिता की सेवा पकड़ी, विभीषण, सुग्रीव ने मित्रता पकड़ी, रावण कंस ने शत्रुता पकड़ी, मीरा हनुमान ने समर्पण पकड़ा, पूतना, मंथरा ने छल पकड़ा सब अंत तक पकड़े रहे, सब तर गये।

इनमें से कौन जप तप हवन के सहारे पार हुआ?

कहने का मतलब है यदि जीवन शैली के कारण जप तप वाला रास्ता न अपना पाओ तो भी पार होने के रास्ते हैं। व्यवहारिक नियम पालन से, फिर उस संकल्प शक्ति से चाहे तो इंद्र बन सुख उठाओ, चाहे ध्रुव बन अमर हो जाओ, चाहे मीरा बन विलीन हो जाओ।

विशेष – ऐसा न समझें कि हीरा दिखा के खीरा टिका दिया।

– आशीष पिपलोनिया

जीवन-रेखा : मैं अज्ञात हूँ, तुम्हारे खोजे जाने तक…

आजकल बहुत बोलने लगी हूँ
इतना बोलना भी ठीक नहीं
नज़र लगते देर नहीं लगती

पिछली बार जो काजल का डिठौना
होठों पर लगाया था
उतर कर गर्दन पर आ गया है

सुराही के छेद से रिस कर तृष्णा
नाभि पर तृप्ति बन इकठ्ठा हो रही है
तुमने ही तो कहा था प्यास को
इतना पानी पिलाओ कि
उसे खुद याद न रहे
कि वो प्यास है

तो कौन किसकी प्रतीक्षा में बैठा है
अब यह भी याद नहीं…
तृप्ति की गाथाएं बहुत जानी पहचानी सी हैं
लेकिन प्यास को तृप्ति में बदलते कितनों ने देखा है

जाने पहचाने भावों में कैसे दिखेगी
उस अनजानी प्यास-तृप्ति के रूपांतरण की कहानी
जो उपजी है अज्ञात से प्रेम के कारण

देखने की प्रथा भी तो सृष्टि के उपजने के साथ जुड़ी है
अनदेखे को मेरी तरह
सदैव नज़रों में बसाए रखना कितनों ने सुना है

क्या सुनना भी
ॐ की उत्पत्ति जितना पुराना नहीं?
हाँ ये एक नई बात है कि
तुम्हारी अनकही बातों को
मेरे कान की बाली से टकराकर लौटते
किसी ने नहीं देखा, जाना या समझा…

लेकिन जितना जान लिया है
उससे तो वो अन-जाना ही बेहतर है ना!

क्या अब भी तृप्त नहीं हुई है जिज्ञासा
और कितना मुझे जानने की चाह बची है
पहले भी कहा था आज फिर कहती हूँ
मैं रोज़ नई हूँ
अपने ही पुराने किसी स्वरूप के
ठीक विपरीत,
मेरी देह को जनने वाले भी मुझे जान न सके
जिनकी आत्मा को मैंने जना वो भी मुझे जान न सकेंगे
पुराना जानने तक मैं नई हो चुकी होऊंगी
ज्ञात शब्दों में अज्ञात के अर्थ नहीं मिलेंगे…

पर तुम जान लो..
ये जो ‘मैं’ ‘मैं’ कहती रहती हूँ
जिसे लोग मेरा अभिमान कहते हैं
वो मेरा गर्व है
क्योंकि उस ‘मैं’ में भी
‘तुम’ ही ध्वनित हो
लेकिन इसको सुनने के लिए
ज्ञात ज्ञानेन्द्रियाँ पर्याप्त नहीं होती…

मैं तो फिर भी शम, दम, दण्ड, भेद लगा
अज्ञात भाव को
ज्ञात पर सवार कर तुम तक पहुंचा ही देती हूँ
क्योंकि मुझे तुम्हें कहीं खोजना नहीं था,
तुम तो मेरा ही अविष्कार हो
मैंने तुम्हें रचा है अपनी रचनाशीलता से
काया दी है अपनी कल्पना से
नाम इतने दिए हैं कि
तुम्हें अपना सांसारिक नाम भी याद न होगा

लेकिन तुम्हारी कोई बात मुझ तक पहुंच नहीं पाती
मैं इतनी ही अज्ञानी हूँ…
और अज्ञात भी…
जब तक तुम मुझे खोज नहीं निकालते…

– माँ जीवन शैफाली

 

लेखन का वरदान पाने के लिए आप उसे भोगने के लिए अभिशप्त हैं

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