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तू खाली-सी जगह हो गया, जिसमें मैं भर आई हूँ

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हर एक के जीवन में ऐसा क्षण अवश्य आता है जब वह रिक्तता के चरम बिंदु पर पहुँच जाता है. जीवन में यह रिक्तता दो तरफ से काम करती है, बाहर की तरफ से व्यक्ति असुरक्षित और एकाकी अनुभव करता है तो अन्दर से कोई उसे इस अवस्था के आनंद को जी लेने के लिए प्रेरित कर रहा होता है.

‘खाली हाथ आया है खाली हाथ जाएगा’ जैसी दार्शनिक बातें दिमाग़ को समझाती रहती है और ह्रदय के खाली कुण्ड में वो खुद को पूरी तरह से किसी विशेष भावना से भरा पाता है.

हमारे शब्दकोष में कुछ भावनाओं को अभी शब्द नहीं मिल सके हैं, और उनको शब्द न मिल पाना ही उनके महत्व को बनाए रखे हैं. मन में एक ऐसा भाव है जो बहुत कुछ कह देने को आतुर है लेकिन शब्दों में उसे न उतार पाने की विवशता उस भाव को और गहन करती जाती है.

पता नहीं ध्यानी ज्ञानी लोग ध्यान में होना किस अवस्था को कहते हैं. लेकिन सामान्य मनुष्य के लिए यह अवस्था ही ध्यान की वह परम अवस्था है जहाँ आप अन्दर से पूरी तरह रिक्त हो गए हो, जैसे एक खाली गहरा कुआं जिसमें जल की एक बूँद भी नहीं…

आँखें कई बार वही गहरा कुआँ हो जाती हैं… जिसकी गहराई तो हम समझ पाते हैं लेकिन उसमें पानी की एक बूँद भी दिखाई नहीं देती. ऐसी ही अवस्था को विचार शून्यता कहते हैं.

ऐसा नहीं है कि विचार नहीं आ रहे… सद्गुरु कहते हैं विचार शून्य जैसी वास्तविक स्थिति नहीं होती … जब तक आप ज़िन्दा है दिल धड़केगा, जब तक आप ज़िंदा है फेफड़े फड़केंगे, फिर आप जीते जी दिमाग को शून्य होने का आदेश कैसे दे सकते हैं.

इसलिए जैसे आप दिल की हर धड़कन पर ध्यान नहीं देते, जैसे आप फेफेड़ों से आने जाने वाली हर सांस पर ध्यान नहीं देते वैसे ही दिमाग में आनेजाने वाले हर विचार पर ध्यान नहीं जाता. और फिर ठीक इसका उल्टा, जैसे ध्यान के समय आने जाने वाली सांस पर ध्यान केन्द्रित करना होता है, दिल की हर धड़कन को ध्यान से सुनना होता है वैसे ही यदि आप सक्षम हैं तो दिमाग में आने जाने वाले हर विचार पर भी ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं…

इसलिए विचार शून्यता जैसी कोई अवस्था नहीं होती. बस एक ऐसी अवस्था जब आने जाने वाले विचार आपको प्रभावित न करे… आप इतने रिक्त हो जाएं कि चेतना में हो रही गुंजन, कम्पन्न के अलावा कुछ अनुभव न हो… चेतना इतनी हल्की हो जाए कि लगे इस समय कोई हलके से फूंक भी देगा तो आप उड़ जाएंगे…

ऐसे ही किसी क्षण में “वह” अवतरित होता है जिसे आप प्रेम कह लीजिये, परमात्मा कह लीजिये, ईश्वर कह लीजिये, मेरे पास ऐसा कोई नाम नहीं है… वही भाव स्थति में हूँ जहाँ शब्दकोष छोटा पड़ जाता है… फिर वह खालीपन भी अपना नहीं रह जाता…

बस ऐसे में संक्षिप्त में एक ही वाक्य निकलता है –

“जैसे तू एक खाली सी जगह हो गया, जिसमें मैं भर आई हूँ”…..

और इस भाव के साथ गुलज़ार मियां की पंक्ति याद आती है कि –

हलके हलके कोहरे के धुंए में
शायद आसमान तक आ गयी हूँ
तेरी दो निगाहों के सहारे
देखो तो कहाँ तक आ गयी हूँ
कोहरे में
बहने दो
प्यासी हूँ प्यासी रहने दो…..

जिसका सुधा सिंह जी ने बहुत सुन्दर वर्णन किया है कि –

इसी कोहरे में भीगती रही ज़िंदगी ज़मीन और आसमान के बीच…

कुछ बातें हमें किसी खाली जगह ले जाकर छोड़ देती हैं… सूनी जगह… ऐसी जगह चीजें स्पष्ट होती हैं पर जैसे ढंकी हुई होती हैं…

खाली जगह भरी नहीं जा सकती, इच्छाओं को रूप नहीं दिए जा सकते, प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए जा सकते… कितनी बिखरी और उदास चीजों के बीच झूलना, ऊपर ऊपर जीने में भीतर बहुत कुछ खाली होता जाता है और भीतर को भरने में और खाली हो जाता है…

साथ में दो जीवंत आदमी कितने लम्हे गुज़ारते हैं और कितना कुछ ऐसा जिया जाता है जो यादों के बैंक में फिक्स डिपॉज़िट की भाँति एकत्रित होता जाता है… और तब कितना आसान था जब जीवन बह रहा था, एक अंजुली में पूरा दरिया था, तृप्त होना नहीं था, बस अधूरा रहना था क्योंकि अधूरा ही सुंदर होता है…

कभी कभी आदमी अपने को एक पतंग की तरह ढीला छोड़ देता है कि उड़ने दो हवा के संग संग. उन्हें शायद लगता होगा कि देखा जायेगा जैसे जैसे मोड़ जीवन लायेगा वैसे जी लेंगे…

एक पुरुष मन अपने खालीपन के अहसास को कदाचित अलग तरह से परिभाषित करता है, सुदीप सोहनी कहते हैं-

बेचैनी और याद का कोई ओर-छोर नहीं. धुएँ की तरह कहीं से भी उसका आना जाना चलता रहता है.

शाम से इसका अलग कनेक्शन है. ढलते सूरज में यह और गुनगुनी हो जाती है. पर यह गुनगुनाहट अकेलेपन में हुमकती ही है.

क्या अजब है यह सब -दुनिया का सबसे सुंदर दृश्य, सामने पानी ही पानी, किनारे पर चाय का कप हाथ में, एक अंतहीन समय, हिचकोले खाती परछाई और कप से निकलती भाप!

कितना समेटा जा सकता है? कितना बचाया जा सकता है? कभी-कभी मुझे लगता है तस्वीरें झूठ बोलती हैं. उनमें उतना अकेलापन नहीं होता जितना हम जी लेते हैं. उनमें उतनी तड़प भी नहीं होती जितनी हम छोड़ देते हैं. उनमें उतना समय भी नहीं होता जितनी हमारी स्मृति.

फिर भी यह झूठ सच से ज़्यादा सुंदर और अपना लगता है. यह अपनापन एक अलग क़िस्म की दुनिया है. भीतर की. समझाइश की. ये मान लेने जैसी कि ‘ऐसा है’!

पर जीवन में कितना सारा हिस्सा तो इस मान लेने का जमा है. प्रतिसृष्टि का है. अनुभव करना और स्वीकार करना दो बिलकुल अलग बातें हैं. मान लेना तकलीफ़देह है. ऐसी कितनी ही शामें होंगी, सुबहें होंगी, रातें होंगी. धीरे-धीरे हम मान लेने के आदी हो जाते हैं.

समय सरकता रहता है और एक दिन हम स्मृतियों से भी बाहर हो जाते हैं. पानी की दुनिया में सूरज और अंतहीनता छोटेपन का वो अहसास देते हैं जब साथ चाहिए होता है. समंदर को दो आँखों में नहीं समेटा जा सकता. सूरज दो हथेलियों में नहीं गिराया जा सकता. अकेलेपन में एक जीवन नहीं जिया जाता. उसे एक और जीवन की ज़रूरत होती है.

यह अनिवार्य-सा कुछ है. पानी के इस हिस्से पर एक सूखी और एक गीली आँख का हिसाब हर बार नहीं किया जा सकता. विदा का हर अहसास ख़ुद की हथेली की छुअन को भूलने जैसा है. उड़ती हवा-सा ख़याल आता है, क्या हर बार चाय और अकेलापन साथ ही होगा?

 

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