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ओमुआमुआ : वह अतीत का अग्रदूत!

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अंतरिक्ष मेरे लिए हमेशा से बहुत रहस्मयी रहा है, बचपन से ही रात के आसमान को तकने की आदत रही है…. बहुत सारे ऐसे अद्भुत दृश्य बिना टेलिस्कोप के देखे हैं, लगता था जैसे कोई सिनेमा के परदे पर उभरता दृश्य देख रही हूँ…

कभी लिखा था यह – अवकाश का आकाश

“पहला नियम …. कोई नियम नहीं ………..”
कहीं सुना, पढ़ा, फिर अनुभव किया… लेकिन ये अनुभव कोई मुट्ठी में बंद मिट्टी नहीं कि आकाश की ओर उछाली और उस पर बादल मंडराने लगे… कुछ बादल से बरसे और कुछ आँखों से … आह! ये पानी तुमने अनुभव किया कभी मेरी तरह… जैसे मुझे भिगोता है कभी तुम्हें भिगोया है इसने???

नहीं, ये अनुभव नहीं ये घटनाएं है, जो उन्नीस-बीस के फर्क के साथ सबके जीवन में एक सी होती है…. अनुभव कुत्ते की तरह छलांग मारकर एकदम से आपकी गोद में नहीं आ बैठता, वो तो केंचुएँ की तरह धीरे-धीरे सरकता हुआ आता है, और धीरे-धीरे ज़मीन से ऊपर की यात्रा शुरू करता है…

कभी-कभी ये दीमक की तरह भी हो जाता है जो आपको अन्दर तक खोखला कर जाता है… कभी अपनी ही आँखों की कटोरियों से झांकर देखना….. खाली आँखें खाली आकाश की तरह हो जाएगी…. जिसे खिड़कियाँ बनाकर तुम झाँक सकोगे उस असीमित आकाश की ओर जहां बहुत सारी आकाश गंगाएं विचरती रहती है बिना किसी नियम के… कुछ उल्काएं भी नज़र आएंगी इधर-उधर बिखरी हुई गिरती पड़ती सी, तो कोई तारा अपनी लम्बी सी पूँछ को लहराता हुआ निकलेगा , जिसे जब तुम हुश्श!! कहते हुए भगाओगे तो छिपकली की पूंछ की तरह तुम पर ही आ गिरेगा…

उसका क्या गया वो तो दोबारा उगा लेगा अपनी पूँछ लेकिन तुम उस पूंछ को थामे पूरी ज़िंदगी मत निकाल देना… ये अनुभव नहीं… अनुभव स्थूल नहीं होता ..बहुत सूक्ष्म होता है…. वो तो उस पुच्छल तारे की गति के साथ बढ़ गया आगे, या उस उल्कापिंड को गिरते हुए देखने में गिर गया…….. वो हाथ नहीं आता, यूं ही बिखरा रहता है तुम्हारे मस्तिष्क के आकाश में अवकाश लेकर…

इस बार मुट्ठी में बंद मिट्टी नहीं, अपने हौसले को उछालना मस्तिष्क के आकाश में पूरी ताकत से ऐसे कि कोई बादल बीच में आए तो वो भी फट जाए लेकिन हौसले को रोक न पाए…….

और हाँ जैसे बादल के बरसने का कोई नियम न होते हुए भी सम्पूर्ण प्रकृति एक ही नियम में प्रतिबद्ध हो चलती है, वैसे ही गति के उस नियम को तुम स्वीकार लो… कि चाहे सामाजिक भय के नियम टूट भी जाए गति का ये सार्वभौमिक नियम टूटने न पाए…
धरा की धुरी पर तुम भी चॉक से एक लकीर खींच लो बस याद रखना तुम्हारी लकीर बाकी लोगों की खींची लकीर से सदैव बड़ी रहे….

जो खुद इतना विस्तारित हो, जिसका कोई ओर हो न छोर हो, उस पर विज्ञान ने बहुत कुछ खोज निकाला है. लेकिन उसकी भौतिकीय और गणितीय भाषा में यह सबकुछ समझना बहुत उबाऊ रहा है मेरे लिए.

मेरे जैसी कला-साहित्य प्रेमी को विज्ञान भी कलात्मक तरीके से समझना है. अपनी कविताओं में भी मैंने अक्सर इस अंतरिक्ष और उसके तारा मंडलों का ज़िक्र किया है… जैसे मेरी यह कविता…

यह मेरी सबसे पहली आध्यात्मिक कविता है
जो देह से प्रारम्भ होकर
देह पर ही समाप्त हो जाती है

यहाँ आत्मा और परमात्मा जैसी
सूक्ष्म बातों का समावेश नहीं है

क्योंकि मेरे विराट देह का हर रोम कूप
आकाशगंगा के असंख्य तारों को
गुरुत्वाकर्षण बल से
अपनी ओर आकर्षित करता है
मेरी आँखों के चन्द्रमा और सूरज
हर रात अपनी पलायन गति
को पा लेते हैं
और चमकते हैं वहां, जहाँ मैं चाहती हूँ चमके

मेरे होंठों पर प्रेम के लिए उकेरा गया
स्थायी आमंत्रण सूत्र
किसी पुरातत्ववेत्ता की प्रतीक्षा नहीं करता
कि वो अपने अस्त्रों से खुरचकर
उसके पुरानेपन को लिपिबद्ध करे
क्योंकि मैं रोज़ नई हूँ
मेरे हर चुम्बन का स्वाद भिन्न है

मेरी भुजाओं का पहला और अंतिम आलिंगन
जीवन और मृत्यु के लिए जन्मों से संरक्षित है
क्योंकि मैं मध्यम मार्गी नहीं
मेरा हर कार्य अति पर जाकर रीतता है

मेरी नाभि पर टिका है
स्पर्श का पहला कमल
जिस पर अपने कान धर
कोई भी सीख सकता है
अहम् ब्रह्मास्मि का सूत्र

मेरे वक्षों पर अपना मुंह टिकाये
लौटा जा सकता है उन पलों में
जहाँ शैशवावस्था जन्म का पहला नहीं
अंतिम पड़ाव है

क्योंकि वहीं पर समाप्त होती है
मेरी देह की यात्रा
और प्रारम्भ होती है
तुम्हारी चेतना की आध्यात्मिक यात्रा

– माँ जीवन शैफाली

इसके पहले भी एक कविता डॉ स्कन्द शुक्ला के नवें ग्रह वाले लेख में प्रस्तुत कर चुकी हूँ… लेकिन डॉ स्कन्द शुक्ला का यह ‘ओमुआमुआ’ तो जैसे किसी कवियित्री के काल्पनिक प्रेमी सा लगता है…

यह ऐसा लग पाया है इसका मतलब ही यही है कि डॉ स्कन्द ने मेरे उस सपने को साकार किया है कि काश कोई अंतरिक्ष विज्ञान को भी कला साहित्य की भाषा में समझा दे…

एक बार आप भी पढ़िए उस मुएँ ‘ओमुआमुआ’ के बारे में जो इस अगम, अगोचर, अज्ञेय, अविनाशी अंतरिक्ष में भूले भटके कहीं से आ जाता है… और आकर चला जाता है… जिस पर न जाने कितने कवियों और कवियित्रियों ने विरह कविता लिखी होंगी लेकिन डॉ स्कन्द अपनी विज्ञान के अध्ययन को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं…

चलें ओमुआमुआ पर? सम्भव है? कल्पना तो एक क्षण में पहुँच जाती है. लेकिन सच यह है कि उसकी गति बहुत तेज़ है. वह अब हमसे दूर इस रफ़्तार से जा रहा है कि हम उस तक अपनी तकनीकी के प्रयोग से पहुँच न पाएँगे. बस उसे स्वयं से दूर जाता निहारेंगे. अँधेरे आसमान में घूमती एक लाल चट्टानी दण्डिका. अग्रदूत का विदा-नृत्य!


ओमुआमुआ : वह अतीत का अग्रदूत!

दूर देस से दूत आया है. आया है और आकर निकल जाएगा. लेकिन घर से निकलने-निकलने में उसे बीस हज़ार साल लग जाएँगे.

ओमुआमुआ! हवाई भाषा में इस शब्द का अर्थ अग्रदूत होता है. वह जो न जाने कितनी दूर से यात्रा करते-करते हमारे सौरमण्डल में प्रवेश कर गया. हवाई में स्थित एक टेलिस्कोप से उसे वैज्ञानिकों ने देखा और उसकी पुष्टि की. फिर उस पर चर्चाएँ चल पड़ीं. कौन है? क्या धूमकेतु? कहाँ से आया है? कहीं कोई रेडियो-सिग्नल तो नहीं किसी अन्य प्रजाति का? जीवन का कोई संकेत?

सौरमण्डल में भटकते हर पत्थर पर हम जीवन ढूँढ़ते फिरते हैं. हमने ओमुआमुआ पर भी यही तलाशने का प्रयास किया. नहीं, यह धूमकेतु नहीं था. धूमकेतु जब सूर्य के समीप आते जाते हैं, तो उनके एक पूँछ उग आती है. साथ में एक आवरण भी चारों ओर. इस आवरण को कॉमा नाम दिया जाता है. धूमकेतु की पूँछ और यह आवरण कॉमा बने होते हैं वाष्प और धूल से.

लेकिन ओमुआमुआ के पास न कोई आवरण था और न कोई पुछल्ला. वह एकदम नग्न पिण्ड था. लम्बाकार, न कि गोल. रंग में लालिम. पथरीला. इसलिए उसे अन्तरतारकीय पिण्ड (इंटरस्टेलर ऑब्जेक्ट ) की संज्ञा वैज्ञानिकों ने प्रदान की.

ओमुआमुआ के उद्भव पर भी बड़ी चर्चाएँ चलीं. कहाँ से आया है? सौरमण्डल के बाहरी गहरे अँधेरों से? वहीं से जहाँ से हैली और न जाने कितने की अन्य धूमकेतु आते और सूर्य के चक्कर लगाकर जाते हैं? नहीं? तो फिर कहाँ से? बाहर से? कितने बाहर से?

सच तो यह है कि हम यह भर जानते हैं कि ओमुआमुआ हमारे घर का नहीं है. लेकिन कहाँ का है, इससे हम अनभिज्ञ हैं. आसमान में किसी रक्तिम दण्डिका-सा लहराता-घूमता वह तेज़ गति से सूर्य की ओर आता गया और फिर परिक्रमा करते हुए उससे अब दूर हटता जा रहा है. कक्षा-वृत्त हायपरबोलिक. इतनी तेज़ रफ़्तार से उसकी आहट से ही हमें समझ आ गया कि वह हमारे परिवार का पिण्ड नहीं है, बाहरी है.

अपने तरह का ऐसा बाहरी पिण्ड हमने पहली बार देखा है. मुसाफ़िर कई आते होंगे, अँधेरे में नज़र बचा कर निकल जाते होंगे. ओमुआमुआ आया वीगा तारे की ओर से है. वीगा जो लाइरा तारा-मण्डल में पड़ता है. लेकिन किसी दिशा से आने का अर्थ यह नहीं कि उसका जन्म वहीं उसी तारे या समीप के किसी ग्रह से हुआ हो. इसलिए हम दिशा जानकर भी ओमुआमुआ का जन्मस्थल जानने में असफल हैं.

हमारी आकाशगंगा में पदार्थ के घूमने की जो औसत गति है, उसे लोकल स्टैण्डर्ड ऑफ़ रेस्ट कहा गया है. आकाशगंगा का सभी कुछ घूम रहा है. ओमुआमुआ की गति भी इस गति से बहुत मेल खाती है. इससे वैज्ञानिक यह सोचते हैं कि यह अग्रदूत आकाशगंगा के किसी अन्य ही हिस्से की उपज है और करोड़ों वर्षों से ऐसे ही अँधेरे में चक्कर खाता भटक रहा है.

चलें ओमुआमुआ पर? सम्भव है? कल्पना तो एक क्षण में पहुँच जाती है. लेकिन सच यह है कि उसकी गति बहुत तेज़ है. वह अब हमसे दूर इस रफ़्तार से जा रहा है कि हम उस तक अपनी तकनीकी के प्रयोग से पहुँच न पाएँगे. बस उसे स्वयं से दूर जाता निहारेंगे. अँधेरे आसमान में घूमती एक लाल चट्टानी दण्डिका. अग्रदूत का विदा-नृत्य!

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