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कितनी फीकी थी मैं, सिन्दूरी हो जाऊं… ओ सैंया…

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जिनके घर कॉलोनी के नहीं, मोहल्लों और गली के नामों से पहचाने जाते हैं वही जान सकते हैं मुम्बई की चाल में रहने वालों का इश्क.

इसे पहली बार फिल्म ‘कथा’ में देखा था, पड़ोसी से शक्कर, चाय-पत्ती माँगने के बहाने मिलने जाना भी बहुत रोमांटिक लगता था. कॉलोनी में रहने वालों से हम पड़ोस से एक कटोरी शक्कर मांगने वाली जीवन शैली की उम्मीद नहीं रख सकते.

Whatsapp के संदेश, मोहल्लों और चाल की बालकनी के आर-पार की खिड़कियों से झांकती नज़रों को पार नहीं कर सकते…

फिल्म ‘अग्निपथ’ के इस गीत को जिस लोकेशन पर फिल्माया गया है, उस लोकेशन को बहुत सारी फिल्मों में देखा है मैंने… उस चाल का नाम तो याद नहीं लेकिन बरसों पहले अपनी मुम्बई यात्रा के दौरान इस चाल में एक रात गुज़ारने का मौका मिला था. जिनके यहाँ ठहरना हुआ था उन्होंने बताया था यहाँ आए दिन किसी न किसी फिल्म की शूटिंग होती रहती है.

उस रात बहुत गौर से देखा था इस चाल को… और न जाने कितनी ही फिल्मों के सीन आँखों के सामने से घूम गए थे…

तब जानती नहीं थी किस्मत एक बार फिर उस चाल में ऐसे घुमाएगी… कि उससे बाहर निकलने का मन ही ना होगा… दोबारा वहां जाना तो न हुआ लेकिन जब भी इस गाने को देखती हूँ लगता है जैसे मैं वहीं रह गयी हूँ…

विरह में तड़पती नायिका का नायक से मिलना और उस मिलन पर बहुत से गीत रचे गए हैं, लेकिन ये एक कटोरी शक्कर में घुला प्रेम मुझे कहीं नहीं मिला…

प्रियंका के फ़िल्मी करियर का सबसे प्रगाढ़ अभिनय, उस एक कटोरी शक्कर से बनी दो तार की चाशनी जैसा प्रेम और चाशनी की मिठास में घुलते दो प्रेमी…

बारीश में महकती देह की मिट्टी पर उगते स्पर्श के फूल गीत पूरा होते होते पूरे आँगन में फ़ैल जाते हैं…

पीड़ा की लम्बी दास्तान के बाद ऋतिक का चेहरा ऐसा रोशन होता है कि जीवन की सारी बाधाओं को दर किनार कर उसकी आँखें प्रियंका की कमर में बंधती गाँठ के साथ बंध जाती हैं… कुछ गांठें बड़ी प्यारी होती हैं… जहाँ स्वतंत्रता समर्पण कर देती है… और बंधन भी प्यारा लगने लगता है…

देह पर लिखी प्रेम की इस इबारत को पढ़ते हुए मैं खुद को बहुत अधिक ज़मीन से जुड़ा पाती हूँ… कि प्रेम का रंग सिर्फ आसमानी ही नहीं होता, नायिका जब उसे मिलन के बाद मांग में भरती है तो वह सिंदूरी हो उठता है…

प्रेम का पहला चुम्बन कानों के पीछे इत्र की खुशबू सा बहकता है, तो नाभि पर कस्तूरी बन स्थिर भी हो जाता है…

और नायिका कहती है…

ओढूं तेरी काया, सोलह श्रृंगार मैं सजा लूं
संगम की ये रैना, इसमें त्यौहार मैं मना लूं
खुशबू तेरी छू के, कस्तूरी हो जाऊं
कितनी फीकी थी मैं, सिन्दूरी हो जाऊं…

विवाह सिर्फ देह या आत्मा के मिलन को नहीं कहते… जब दो चेतनाएं अपने अधूरेपन को पूरा भोगकर मिलन की पूर्णता को प्राप्त करते हैं तब भी विवाह घटित होता है…

ये ब्रह्माण्डीय चरमोत्कर्ष का पल होता है जो सांसारिक रूप में प्रकट होता है तो नायिका की मांग में बिना सात फेरे के भी सिन्दूर भर जाता है…

वही सिंदूरी रंग जो ढलते सूरज के साथ आसमान को भी सिंदूरी कर जाता है…

और यही सिंदूरी रंग रात होते होते जब आसमान को स्याह कर देते हैं… तो आँखों से बरसते आंसू भी किस्मत के चमकते सितारों में तब्दील हो जाते हैं…

मेरे आसमां से, जो हमेशा
गुमशुदा थे, चाँद तारे
तूने, गर्दिशों की, लय बदल दी
लौट आये, आज सारे
ओ सैंया…

विरह एक अधूरी कहानी है और मिलन वो चमत्कार है जो बहुत कम लोगों के जीवन में घटित होता है… और जब घटित हो रहा होता है तब भी यकीन नहीं आता क्या हम सच में इतने खुशकिस्मत हैं कि…

ज़िन्दगी ने पहनी है मुस्कान…
करने लगी है
इतना करम क्यूँ ना जाने
करवट लेने लगे हैं
अरमान फिर भी
है आँख नम क्यूँ ना जाने
ओ सैंया…

– माँ जीवन शैफाली

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