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कुम्हारन के हाथ तो सदैव मिट्टी में सने रहते हैं…

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कुम्हारन के हाथ तो सदैव मिट्टी में सने रहते हैं… मिट्टी जो उसकी माँ भी है और सखी भी… गुरु भी है और पिता भी… सुहाग है, तो चिता की राख भी…

इस मिट्टी को इस बात से कोई लेना देना नहीं कि उसके बने पात्र में किसको पानी पीना नसीब हुआ है, इस मिट्टी को इस बात से भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि पात्र को पक्का करने के लिए कौन सी भट्टी में तपाया गया…

मिट्टी कभी ये नहीं पूछती कि मेरी छाती पर उगे वृक्ष का फल किसने खाया, या उसकी पीठ पर खुदे कुँए का पानी किसने पिया…

मिट्टी नहीं पूछती नदी को कि किस ओर बहा ले जा रही हो मुझे… कौन देस जाकर बनेगा मेरा ठिकाना…

जीवन… तुम बस मिट्टी ही रह जाना, तो पूरे हो सकेंगे सारे सार्थक काज, तुम पात्र बन जाने की अपेक्षा मत रखना, तुम वृक्ष में लगे फल का स्वप्न नहीं देखना, अपने आँचल में लहरा देना धान, गेहूं, सरसों और गन्ना, जीभ की स्वाद कलिकाओं को सारे स्वाद का सौभाग्य देना और पेट को भरे रहने का आशीर्वाद…

तुम पोषण करना मिट्टी से जुड़े संस्कारों को… तुम सूखे की दरारों के साथ बन जाना वर्षा की प्रार्थना, हवन की वेदी बनाने के लिए तुम देना अपना सहयोग ताकि अग्नि देवता को प्रसन्न करने दी जा रही आहुति से उठती सुगंध से प्रकृति की साँसें पवित्र हो…

मिट्टी हो जाने के लिए कभी मिट्टी में भी मिल जाना पड़ता है, तुम मिट्टी में मिला देना अपनी सारी ईर्ष्या, सारी कुंठा, सारा अहंकार और उसी मिट्टी से उगाना प्रेम का बीज और अपनी कोख में संभाले हुए उसे साहस देना वृक्ष हो जाने की संभावना के लिए टूट जाने को… ताकि वो तुम्हारी सतह से अंकुरित हो सके… उसके लिए सूर्य से प्रकाश की भिक्षा मांगने में भी नहीं झिझकना, ये जानते हुए कि तुम्हारे बिना मांगे भी वो तुम्हें पोषित करने को दे रहा है अपना सर्वस्व…

मैं कुम्हारन… जिसके हाथ सदा मिट्टी में सने रहते हैं… पात्र बनाते-बनाते कब मिट्टी से एकाकार हो जाती है पता ही नहीं चलता….

– माँ जीवन शैफाली

पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे…

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