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ईश्वर के दूत : साहित्यकार आबिद सुरती और आईटी प्रोफेशनल विमल चेरांगट्टू

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वे मेरी नज़र में ईश्वर के दूत हैं, जो मानव सेवा के लिए किसी मदद की प्रतीक्षा नहीं करते, ना ही ईश्वर की कृपा बरसने की राह देखते हैं, जिन्हें अपने हौसलों पर विश्वास होता है, वह अपना पहला कदम स्वयं बढ़ाते हैं.

और इस पहले कदम के बढ़ने के साथ ही ईश्वर की कृपा बरसने लगती है, लोगों के मदद के लिए हाथ बढ़ने लगते हैं…

84 वर्षीय साहित्यकार आबिद सुरती को कौन नहीं जानता…

40-50 साल पहले बाल पत्रिका ‘पराग’ में आबिद सुरती की छपी धारावाहिक रचना ’72 साल का बच्चा’ जिसने पढ़ी होगी वो आबिद सुरती को अवश्य जानता होगा. आज ये खुद एक बच्चे की सी ऊर्जा छलकाते हुए कहते हैं – “मैं सिर्फ 84 साल का हूँ”

और फिर ये 84 साल का बच्चा चुनौती देते हुए सा कहता है – “If I can, you can”

अमिताभ बच्चन इनसे परिचय करवाते हुए सिर्फ इतना ही कहते है – ‘देवियों और सज्जनों… आबिद सुरती’…

बस नाम ही काफी है, बाकी उनकी साहित्यिक रचनाओं के अलावा उन्हें जाना जा रहा है ईश्वरीय रचनात्मक कार्य के लिए…

पानी बचाने के लिए बड़े बड़े पोस्टर लगवाना, हाथ में झाडू लेकर फोटो खिंचवाना, लोगों को इकठ्ठा कर पानी बचाने के लिए नारे लगवाना … क्या नहीं कर सकते थे ये पानी बचाओ अभियान के लिए… लेकिन इन्होंने चुना हाथ में औजार लेकर लोगों के घर के टपकते नल ठीक करना….

एक प्रसिद्ध साहित्यकार और कार्टूनिस्ट जिसने कलम के साथ पाना पिंचिस भी उठा लिया … किसलिए सिर्फ और सिर्फ बूँद बूँद टपकते पानी को बर्बाद होने से बचाने के लिए… और ऐसे उन्होंने 1 करोड़ लीटर पानी बचाने का रिकॉर्ड बनाया… और आज भी जीवन उसी कार्य में लगा है…

जब आप प्रकृति को बचाने के लिए कृत संकल्पित होते हैं, फिर कोई बाधा आपको रोक नहीं सकती… ऐसे ही जब आबिद सुरती ने घर घर जाकर लोगों के टपकते नल मुफ्त में ठीक करने का बीड़ा उठाया, तो उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे, जो बजट लेकर यह प्रोजेक्ट शुरू करना था उसके लिए पर्याप्त धन नहीं था… ऐसे में वे कहते हैं… जब आप सच्चे मन से कुछ करना चाहो तो परमात्मा अवश्य मदद करता है… और उन्हें अचानक से एक दिन अपने लेखन के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड का पैसा मिला और उस पैसे को उन्होंने समाज सेवा, राष्ट्र सेवा और प्रकृति सेवा के इस अभियान में लगा दिया..

राष्ट्रभक्ति सिर्फ राजनीति करके या सोशल मीडिया पर लम्बी लम्बी पोस्ट्स लिख कर ही नहीं की जाती… जो लोग सच्चे राष्ट्र भक्त हैं वह किसी नेता की प्रतीक्षा नहीं करते, खुद ज़मीन पर उतर कर काम करने लग जाते हैं… ऐसे सच्चे राष्ट्रभक्तों पर ईश्वर की विशेष कृपा होती है.

आबिद सुरती की कहानी पूरी देखने के लिए यह अद्भुत वीडियो अवश्य देखें और साथ ही नीचे रचित सतीजा की ऐसी ही ईश्वर के दूत की अद्भुत कहानी भी अवश्य पढ़ें.

– माँ जीवन शैफाली

छत नहीं दे सकते तो “छाता” दे रहे

तस्वीर 28 वर्षीय मुम्बईकर और आईटी प्रोफेशनल विमल चेरांगट्टू की है। भारी बारिश के बीच एक दिन विमल ऑटो में सवार अपने ऑफिस की ओर जा रहे थे। ऑटो लाल बत्ती पर रुका और तभी एक नन्ही सी लड़की अपने एक हाथ कुछ गुलाब के फूल लिये विमल के समक्ष आ खड़ी हुई।

“साहब। फूल ले लो”

इतने में विमल ने ध्यान से देखा तो लड़की ने अपने दूसरे बाजू में एक छोटे से बच्चे को उठा रखा था। दोनों बारिश में भीग रहे थे। विमल ने एक फूल खरीदा और अपनी जेब से कुछ पैसे निकाल कर लड़की को दे दिये।

परन्तु लड़की वहीं खड़ी रही। एक टक कुछ देख रही थी।

विमल थोड़ा असहज हुये।
लड़की से पूछा ” और क्या चाहिये। फूल ले तो लिया।”

लड़की ने दबे स्वर में विमल के पास पड़े उनके छाते की ओर ईशारा किया और बोली ” छाता चाहिये”।

उस क्षण विमल की आत्मा कांप उठी। एक नन्ही सी बच्ची अपनी गोद में एक अबोध बालक को लेकर घूम रही है और दोनों सर से पैर तक बारिश में भीग चुके हैं। लड़की ठंड से कांप रही है और कांपती आवाज़ में कह रही है …..” छाता चाहिये ”

अगले ही क्षण बत्ती हरी हो और अगले ही क्षण विमल ने अपना छाता बच्ची के हवाले कर दिया।

परन्तु उस बच्ची का चेहरा और उसकी गोद में कांपते बच्चे की तस्वीर विमल के मस्तिष्क में घूम रही थी। विमल ऑटो से उतरे और बच्ची की एक तस्वीर खींच ली।

तस्वीर व्हाट्सएप पर वायरल कर दी गयी और उसके साथ एक ऐसी मुहिम छेड़ दी जिससे अब हज़ारों की संख्या में लोग जुड़ चुके हैं।

” छाता चाहिये ” ….
“एक नहीं हज़ारों चाहियें”

यह बात अब बारिश में भीगती बच्ची नहीं अपने आलीशान ऑफिस में बैठे विमल कह रहे थे। एक छतरी दान कर के विमल को लगा के अभी तो मुम्बई मे ऐसे हज़ारों लोग होंगे जो भरी बरसात में भीग रहे होंगे और जिनकी छाता खरीदने की हैसियत ही नहीं होगी। ऐसे कितने अबोध बच्चे ट्रैफिक सिग्नल पर भरी बरसात में कांप रहे होंगे।

लक्ष्य स्पष्ट था। कुछ और कर सकें या ना कर सकें पर अब बारिश में भीगते हर दरिद्र के सर पर एक छाता देना था।

असल मे समाज जितना बुरा दिखता है उतना है नहीं। विमल की गुजारिश ने मुम्बईकर्स के दिलों को झकझोर दिया। 10 दिनों में विमल की मुहिम के समर्थन में लोगों ने 700 छतरियां दान कर दी। यही नहीं थोड़ा थोड़ा कर के 40,000 रुपये भी इक्कट्ठे हो गये।

यही नहीं मुम्बई के मलाड में एक छतरी बनाने वाला व्यापारी मुहिम का हिस्सा बन गया और उसने मात्र 80 रुपये प्रति छाते के हिसाब से मुहिम को बढ़ाने के लिये हज़ारों छाते दे डाले।

फिर मेघ बरसे।

परन्तु इस बार विमल और उनके साथ जुड़ी उनकी टीम तैयार थी। एक ही दिन में हज़ारों छाते बांट दिये गये। फुटपाथ पर कोई भीगता बच्चा दिखा तो उसे छाता दिया गया। बारिश के पानी से कंपकंपाता कोई वृद्ध दिखा तो उसे छाता दिया गया। बरसात में दिहाड़ी मजदूरी करती कोई महिला दिखी तो उसे छाता दिया गया।

मुहिम बारिश के पानी से भीगी एक बच्ची की व्यथा को देख कर शुरू हुई थी और आज उस व्यथा को दूर करने के लिये विमल के साथ हज़ारों लोग जुड़ चुके हैं।

यह है हमारा समाज और यह है हमारे समाज की ताकत।
जिससे जितना हो सकता है वह समाज की बेहतरी के लिये उतना योगदान दे रहा है।

छत नहीं दे सकते तो “छाता” दे रहे हैं।

गर्व है विमल और उनसे जुड़े हर व्यक्ति पर जिसने इस मुहिम के ज़रिये मानवता को नये आयाम दिये हैं।

– रचित सतीजा

इस लेख में मिलिए एक और ईश्वर के दूत से, आचार्य राजेश कपूर

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