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धर्म और विज्ञान : दो नावों की सवारी

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हम सभी ने देखा है कि प्रकाश की कोई किरण किसी प्रिज़्म में से गुज़रने पर सात रंगों में विभाजित हो जाती है.

कल्पना की जाए कि वह प्रकाश प्रिज्म में उलझ कर अपनी असली पहचान भूल गया और स्वयं को कांच का प्रिज्म ही समझने लगा और बाहर दिखने लगी उसे एक सतरंगी दुनिया, जो कि असल में वह खुद ही था.

यह तो हुयी केवल कल्पना की बात, किन्तु यही कोई 500 वर्ष पहले तक दुनियाभर के तमाम दर्शनों (दीन, धर्म , रिलिजन ) की जगत को लेकर कुछ कुछ ऐसी ही धारणा थी.

प्रकाश है चेतना (ईश्वर/अल्लाह/आत्मा), प्रिज़्म है हमारा शरीर (नर्वस सिस्टम) और बाहर दिखने वाली एक सतरंगी दुनिया. सभी दर्शनों ने एक मत से माना है कि हम शरीर नहीं बल्कि प्रकाशस्वरूप चैतन्य तत्व हैं जो इस भौतिक शरीर में उलझ कर इसे ही सत्य मानने लगते हैं और बाहर दिखने वाला संसार भी कुछ और नहीं बल्कि हमारी (निराकार ब्रह्म) ही अभिव्यक्ति (साकार ब्रह्म )है.

अर्थात जो भीतर है वही बाहर प्रतिबिंबित हो रहा है. वेदांत दर्शन में अन्तःकरण को inner instrument माना जाता है जिसके (चित्त) परदे पर whirlpool की भांति उठने वाली “वृत्तियाँ” (मॉडिफिकेशन ऑफ़ माइंड) बाहरी संसार का निर्माण करती है.

इस प्रक्रिया को यदि करोड़ों गुणा बड़े स्केल पर समझा जाए तो आप अंदाज़ा लगा पायेंगे कि आइन्स्टीन के दिमाग में स्पेस-टाइम के फैब्रिक में curvature का ख़याल कहाँ से आया होगा.

दरअसल इस अध्यात्मिक मत के अनुसार आकाश में दिखाई देने वाले सूर्य और चन्द्रमा भी हमारे भीतर ही हैं और ये बाहरी आकाश में ठीक वैसे ही चित्रित हो रहे हैं जैसे प्रोजेक्टर से सिनेमा के परदे पर कोई दृश्य चित्रित होता है.

योग दर्शन में सात चक्र और यहूदियों के कबाला रहस्यवाद के 10 sephirots के माध्यम से इस विषय को डिटेल में समझाया जाता है.

किन्तु मध्यकाल में आये पश्चिमी विचारकों, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों जैसे Rene Descarates, Galileo, Leonardo da Vinci इत्यादि ने संसार को समझने का एक नया नजरिया पेश किया जो कि उस वक़्त की धारणाओं के ठीक विपरीत (inversely opposite) था.

वर्तमान में हमारी तमाम वैज्ञानिक मान्यतायें इन्हीं महान विभूतियों के देन हैं जिसके अनुसार किसी वस्तु पर पड़ने वाला प्रकाश रिफ्लेक्ट हो कर आँख के रेटिना से टकराता है और यह सन्देश optical nerves के माध्यम से मस्तिष्क को भेज दिया जाता है और हमें बाहर का दृश्य दिखाई देने लगता है.

यह ज़रा भी नयी बात नहीं थी, केवल इतना भर है कि आप किसी लाइन को बायें से दायें लिखने की बजाय दायें से बायें लिख दें. इस विचार को आगे ले जाने पर विज्ञान यह मानने के लिए विवश है कि चेतना का निर्माण मस्तिष्क में होता है जबकि अध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार मस्तिष्क केवल रिसीवर और एम्पलीफायर की भांति काम करता है. विज्ञान के पास इसका कोई प्रमाण नहीं और दार्शनिक प्रमाण को विज्ञान मान्यता नहीं देता.

विज्ञान ने बड़े बड़े लेंस बना कर ढेर सारा प्रकाश एकत्रित कर ब्रह्माण्ड में दूर से दूर देखने का प्रयास किया, किन्तु जितना वह दूर गए ब्रह्माण्ड उतना ही बड़ा होता गया, लेंसों की सहायता से पदार्थ के सूक्ष्म कणों तक में झाँकने का प्रयास किया, साधारण प्रकाश से बात नहीं बनी तो ना जाने कौन कौन सी किरणें पदार्थ में घुसेड़ कर उसको समझने का प्रयास किया, किन्तु जितना भीतर गए गुत्थी और उलझती गयी. जितना ये दूर गए, जितना ये भीतर गए, अध्यात्मिक मान्यताएं उतनी ही पुष्ट होती गयी. (Relativity, Space-Time Topology, Quantum Physics)

धर्म और विज्ञान में जो निरंतर बहस चल रही है उसके मूल में यही दो विपरीत विचार हैं. यहाँ प्रश्न यह भी उठता है कि अध्यात्मिक मत ही यदि सही है तो वैज्ञानिक चन्द्रमा की सतह पर पैर रखने में कैसे कामयाब हुए? क्योंकि चन्द्रमा (चंद्रलोक) पर तो केवल भीतरी अन्तः कर्ण (स्पेस-टाइम ) को ध्यान के माध्यम से सिकोड़ कर ही पहुंचा जा सकता है. और फिर ये मंगल यान क्या बला है? मिथ्याकाश में वैज्ञानिक उपकरण कैसे यात्रा कर रहे हैं? धरती का चक्कर लगाने वाले artificial satellites तक तो ठीक है किन्तु उसके आगे जाना कैसे संभव हो सकता है?

यदि आप किसी भी ईश्वर, अल्लाह अथवा किसी अन्य भगवान में यकीन करते हैं किन्तु moon landing को सच मानते हैं तो यकीन मानिए आप एक साथ दो कश्तियों के सवारी कर रहे हैं.

कृपया सोच समझ कर अपनी नाव का चुनाव करें.

– विकास शर्मा

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