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सती -2 : जब पत्नी और पति के विचार एकाकार होते हैं, तब वह सती होती हैं

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आप लोगों से निवेदन है कि पहले “सती” पर आप लोग पहला लेख पढ़ लें उसके पश्चात इसे पढ़ें.

जैसा कि मैने पहले भी लिखा है तीन महानतम सतियों में सती अनुसूइया, सती सावित्री और सती जब वह शिव की पत्नी थी दक्ष की बेटी के रूप में, तीनों के पति जीवित थे जब उन्हें सती कहा गया था.

सती बनने की एक प्रक्रिया है और वह जब दाम्पत्य में पति और पत्नी के विचारों में एकाकार होने लगता है.

मैंने नीचे कुछ चौपाई रामचरितमानस से उद्धृत की है और मिलते जुलते श्लोक शास्त्रों में सैकड़ों स्थानो पर हैं. इन चौपाइयों की पूरी व्याख्या मैं अभी न करके केवल एक दृष्टांत दूँगा और आप पर छोड़ दूँगा कि आप आसमानी किताब वालों की मानसिकता से बाहर निकले कि नहीं.

चौपाई:

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा. कहहु कृपाल काग कहँ पावा..
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी. कहहु मोहि अति कौतुक भारी..
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी. हरि सेवक अति निकट निवासी..
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई. सुनी कथा मुनि निकर बिहाई..
कहहु कवन बिधि भा संबादा. दोउ हरिभगत काग उरगादा..
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई. बोले सिव सादर सुख पाई..
धन्य सती पावन मति तोरी. रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी..
सुनहु परम पुनीत इतिहासा. जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा..
उपजइ राम चरन बिस्वासा. भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा..

दृष्टांत :

ऊपर जो चौपाई है वह उमा और शिव का पहला संवाद है, विवाह के उपरांत.

सती के पिता, दक्ष थे. दक्ष का अर्थ होता है “निपुण”. और सती में पिता के दक्ष प्रजापति की बेटी होने का गर्व भी था. वह, शिव में सत्यनिष्ठ थी पर शिव के अलावा वह अपने पिता को समझती थी. उनको लगता था कि सभी ऋषि मुनि ज्ञानी इत्यादि तो उनके पिता के सामने सर झुकाते हैं.

अत: जब भी शिव, भगवत चर्चा करते थे तब उन्हें संशय होता था. ऐसा ही संशय उन्हें राम के लिए हुआ, वे सीता का रूप धारण करके, राम के सम्मुख गई, राम ने उन्हें प्रणाम किया, और शिव ने कहा कि यह तन सती भेंट अब नाहीं.

उसके बाद पिता दक्ष के यज्ञ में जाकर देखती हैं और अपने पिता के अभिमान को देखकर उन्हें भान हो जाता है कि उनके पास का सारा अभिमान उनके पिता के संस्कारों के कारण ही है.

अग्नि में सती अपने देह का विलोप करती है और पार्वती के रूप में “हिमालय“ के घर जन्म लेती हैं.

अब ध्यान दीजिए, हिमालय का अर्थ होता है पत्थर अर्थात जड़. भगवती ने सोचा कि एक “दक्ष” पिता से अच्छा है एक “पत्थर बुद्धि“ पिता, जो उचित संस्कार दे.

तत्पश्चात शिव पार्वती के विवाह का पूरा दृष्टांत है.

पार्वती ने विवाह के पश्चात, शिव से राम कथा कहने को कहा.

और भगवान शंकर ने, पार्वती को सबसे पहले किस नाम से संबोधित किया :

“धन्य सती पावन मति तोरी “

सती के नाम से… क्यों? क्योंकि पार्वती का मन अब पावन हो गया है. वह भी शिव के जैसे ही राम भक्ति में डूब गई है.

निष्कर्ष : जब पत्नी और पति के विचार एकाकार होते हैं तब वह सती होती हैं.

अर्थात, सती एक प्रकिया है. आप दाम्पत्य जीवन में, एकाकार लाएँ. सती, अपने को अग्नि में डालकर सती नहीं हुई, पर पार्वती के रूप में भगवान शिव ने उन्हें “ सती” कहा क्योंकि शिव के मन से पार्वती का मन जुड़ गया.

पार्वती को भगवान शिव ने सबसे पहले “सती” कह कर संबोधित किया और उसके पश्चात सभी आगम और निगम ने उन्हें “ उमा” कहा.

आँख खोलकर एक एक शब्द ध्यान से पढ़िए.

शिव को “ॐ” कहा गया है और जब शिव ने पार्वती को सती कह कर संबोधित किया वह “उमा” हो गईं.

उमा का अर्थ समझ लीजिए. उमा का अर्थ “प्रणव स्वरूप ओंकार” ही होता है.

अब आप धीरे धीरे ॐ का उच्चारण करिए. आपको एक ओर से ॐ और दूसरी ओर से उमा की ध्वनि सुनाई पड़ेगी.

– राज शेखर तिवारी

सती

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