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Sandakphu Trek : तपस्वियों सी हैं अटल ये पर्वतों की चोटियाँ

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“तपस्वियों सी हैं अटल ये पवर्तों की चोटियाँ
ये बर्फ़ की घुमरदार घेरदार घाटियाँ
ध्वजा से ये खड़े हुए हैं वृक्ष देवदार के
गलीचे ये गुलाब के, बगीचे ये बहार के
ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है
ये कौन चित्रकार है, ये कौन चित्रकार !! ”

प्रकृति, हम जीवधारियों के लिए ऑक्सीजन का प्रतिरुप है, जिसमें हमारे प्राण सजते हैं – ऐसी मेरी सोच है और यही मेरा विश्वास है. यही कारण है कि कुछ समय के अंतराल में मैं स्वयं को तरोताजा करने उसके सानिध्य में जाती रहती हूँ.

पहाड़, जंगल और नदी-झरने अपने अंतरंग रूप में सदैव मुझे मोहित, निमंत्रित और आकर्षित करते रहते हैं. प्रेम का विशुद्ध रूप मुझे यहीं समझ में आता है बारंबार और उसके बाद सबकुछ बहुत हल्का और गौण लगने लगता है.

यही कारण है कि कभी ऋषि मुनियों और संन्यासियों ने जप-तप-ध्यान के लिए ऐसे स्थानों को चुना.

जनवरी में अरुणाचल से लौटने के बाद से ही मन एक बार फिर उन्हीं वादियों में लौटने का करता रहा था. निरंतर लगता रहा कि पीछे कोई / कुछ छूट सा गया है, जो मुझे लगातार आवाज दे कर बुला रहा है. असंभव था उस आमंत्रण की अवहेलना. उस बुलावे पर मैं यंत्रवत सी खिंचती पाँवोंपाँव चलती गयी इस बार कंचनजंघा की ओर.

बंगाल में उसके सर्वोच्च शिखर संदकफू पर.

बंगाल प्रांत अपने प्राकृतिक सौन्दर्य, अपने इतिहास, अपनी परंपरा, अपने साहित्य, अपनी कला, अपने विचारों, अपनी संस्कृति, अपने व्यापार और अपनी राजनीति, तथा वाणिज्यिक प्रतिभा के लिए सदैव जाना जाता रहा है. प्राचीन संस्कृत साहित्य में गौड़ या बंग के नाम से बंगाल को पहचाना जाता था.

महाभारत के युद्ध में बंगराज ने पांडवों के विरूद्ध कौरवों का साथ दिया था. ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी में बंगाल मौर्य साम्राज्य का अंग था और चौथी से छठी ईसवीं (ए.डी.) शताब्दी में यह गुप्त वंश के अधीन रहा. किंतु नवीं शताब्दी में पहुँचने तक बंगाल ने अपने स्वाधीन राजाओं के वंश की परंपरा स्थापित कर ली और पलास राजाओं ने बिहार, उड़ीसा तथा असम तक अपना साम्राज्य फैला लिया.

वर्षा की अधिकता के कारण बंगाल के चप्पे-चप्पे पर हरियाली है. इसकी शस्य-श्यामला भूमि में हिमित पर्वत श्रृंखलाएं अत्यंत आकर्षक और मनोहारी हैं और दार्जिलिंग सिरमौर है. अपने बर्फीले शिखरों के कारण दार्जिलिंग की सुंदरता के दर्शनार्थ संसार भर से पर्यटक आते रहते हैं.

संदकफू पश्चिम बंगाल से सिक्किम तक फैली सिंगालिला श्रृंखलाओं की सबसे ऊँची चोटी है. संदकफू की ऊंचाई समुद्र तल से 3611 मीटर है. यहाँ से दुनिया की पाँच सबसे ऊँची चोटियों में से चार को एक साथ देखा जा सकता है. माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर), तीसरे नंबर की और भारत में सबसे ऊँची कंचनजंघा (8585 मीटर), चौथे नंबर की लाहोत्से (8516 मी) और पाँचवे नंबर की मकालू (8463 मी). विशेषतौर पर कंचनजंघा व पंडिम चोटियों का नजारा तो बेहद आकर्षक होता है.

पूरा रास्ता ठीक भारत-नेपाल सीमा के साथ-साथ है या कहें कि ये रास्ते ही सीमा है. हमारे पाँव कब नेपाल में हैं और कब भारत में, यह पता ही नहीं चलता. दिन में चलेंगे तो भारत में, रात में रुकेंगे तो नेपाल में. थोड़ी-थोड़ी दूर पर लगे पत्थरों के अलावा न सीमा के कोई निशान हैं और न कोई पहरुए. इस रास्ते की हर बात विशेष है – चाहे वो संदकफू तक ले जाने वाली लैंडरोवर हो जो देखने में किसी संग्रहालय से आई लगती है या यहाँ के सीधे-सादे मेहमानवाज लोग हों जो बौद्ध धर्म की अनुयायी हैं. पूरे इलाके में फैले गोम्पा व मठ इसके गवाह हैं.

इस पथ पर बादल हमारे संगी रहे, जो पूरे रास्ते आँख-मिचौली खेलते रहे. इन मेघों के चलते गाँवों के नाम “मेघमा” पड़ जाते हैं.

मनयभंजन, धोत्रे, चित्रे, तुंबलिंग (टोंगलू), कालीपोखरी, संदकफू, आॉल और वापसी में गुरदुम, रिम्बिक या श्रीखोला – हर स्थान पर हमें सौंदर्य का खान मिला.

अपने साथियों के साथ मेरी पूरी यात्रा ( trekking ) जो 5 दिनों में पूरी हुई – हर प्रकार से संतोषप्रद और हर्षदायक रही. गीत-संगीत, फोटोग्राफी, हँसना-हँसाना और खुशी-उदासी में सबका साथ, इस यात्रा के अमूल्य क्षण दे गए . . .

अंतर्मन से धन्यवाद हमारे गाईड गोपाल का, जो मेरे लिए वाकई गोपाल सिद्ध हुआ – वापसी में फिसलन भरी सीढ़ियों पर मेरी रक्षा करता हुआ, जिसके बिना कदाचित् मैं सकुशल न लौटी होती.

यह Sandakphu trekking मेरे लिए एक अविस्मरणीय यात्रा रहेगी, जो मेरे लिए न केवल शारीरिक रूप से पहाड़ी बीहड़ से गुजरी बल्कि मानसिक रूप से भी मेरे लिए एक अमूल्य धरोहर थी.

– प्रकृति, साथी और मैं … सुनीता पाण्डेय

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