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समुद्र मंथन : शुभ-अशुभ हमारी धारणा है, प्रकृति की नहीं

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दो विपरीत विचार स्वभाव के समूह देव और दैत्यों के सहयोग से, समुद्र में विपरीत धारायें उत्पन्न की गईं, जिससे कई रत्नों के साथ अमृत पाया गया।

गुण अवगुण, सभी प्रकृति में उपयोगी होते हैं। प्रकृति गुण अवगुण के सम्मिलन से ही बनी है। विपरीत के अभाव में अस्तित्व को सिद्ध कर पाना संभव ही नहीं।

शुभ अशुभ हमारी धाराणाओं पर आधारित हैं। वास्तव में प्रकृति में कुछ भी निरर्थक नहीं है। यह हमारे ज्ञान विवेक कौशल पर निर्भर है कि हम तथ्यों का किस तरह उपयोग कर पाते हैं।

यदि हम किसी तथ्य का सही उपयोग नहीं कर पाते, उससे वह तथ्य व्यर्थ नहीं हो जाता, बल्कि ऐसा हमारी अज्ञानता के कारण होता है।

वैदिक संस्कृति में सर्व स्वीकार का भाव है। देशकाल के अनुसार सबकी उपयोगिता स्वतः सिद्ध है। पुराण कथाओं में इसके संबंध में स्पष्ट संकेत हैं ।

कई कथाओं में ऋषियों के ऐसे आचरण व्यवहार का वर्णन है जो लोकाचार नियम विरुद्ध दिखते हैं। फिर भी समाज में उन्हें हेय भाव से नहीं देखा गया।

ज्ञानी विवेकवान धाराणाओं से मुक्त होते हैं। वे धाराणाओं का उपयोग करते हैं। पर उन पर आश्रित नहीं होते। संसार में विभिन्न प्रकार के भाव उपलब्ध हैं। साहित्य में उन्हें रस कहा गया। कोई भी भाव व्यर्थ नहीं है। सभी उपयोगी हैं।

कोई भी भाव जो हमने स्वयं चुना हो उपयोगी है। और जिस भाव को हमने नहीं चुना पर उस भाव के अनुसार आचरण के लिए विवश हैं तो वे भाव अशुभ ही हैं। भले ही वे शुभ लगते हों।

जैसे बच्चों के अपराध पर क्रोधित होना हमारा चुनाव होता है। भीतर करुणा होती है पर बाहर क्रोध दिखाना आवश्यक होता है। ऐसे में क्रोध हमारा चुनाव है जो शुभ ही है।

वहीं दूसरी तरफ किसी के द्वेष पूर्ण आचरण पर क्रुद्ध होना हमारा चुनाव नहीं होता, बल्कि हम क्रुद्ध होने पर विवश होते हैं। इस विवशता के कारण हमारा क्रोधित होना अशुभ होता है। ठीक यही स्थिति सभी भावों के साथ है।

जैसे प्रेम हमारा चुनाव है या हम प्रेम के लिए विवश हुए। यदि चुनाव हमारा है तो हम हर हाल में प्रेम पूर्ण रहेंगे। यदि हम प्रेम के लिए विवश हुए हैं तो निश्चित ही आकर्षण से (सम्मोहन से) मुक्त होते ही प्रेम शेष नहीं रहेगा। यथार्थ में विवशता में किया गया प्रेम, प्रेम होता ही नहीं।

शुभ माने जाने वाले भाव ही उपयोगी हों ऐसा नहीं है। बल्कि अशुभ माने जाने वाले भाव भी उपयोगी होते हैं।

जैसे भय, समय परिस्थिति के अनुसार भय दिखाना भी होता है। तथा कभी स्वयं को भी भयभीत करना होता है।

तंत्र में कई साधनायें भाव को समझने तथा उनको भोगने की विवशता से मुक्त होने के लिए ही की जातीं हैं। अघोरियों की साधना घृणा भय क्रोध आदि को जीतने (मुक्त होने) के लिए ही होती है।

तांत्रिक साधक स्वयं ही महाभय को (महाकाली, महाकाल आदि) आमंत्रित करते हैं। तथा उसे जानकर उससे मुक्त हो जाते हैं।

वैदिक संस्कृति में सर्व स्वीकार का भाव है। देशकाल के अनुसार तत्वों के उपयोग उपभोग का निर्देश वेद और पुराणों में वर्णित है ही।

समुद्र मंथन में देव और दैत्य दोनों का उपयोग हुआ। विपरीत धाराओं का सुनियोजित उपयोग कर अभीष्ट पाने के सूत्र पुराण कथाओं में पाये जाते हैं।
घृत पाने के लिए दही में दो विपरीत धारायें उत्पन्न की ही जाती हैं।

वर्तुलाकार घूमती हुई ऊर्जा चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करती है। इतना तो वर्तमान विज्ञान ने सिद्ध कर ही दिया है। निश्चित ही हमसे बहुत सी बातें रहस्यमय सूत्र छूट गये, खो गए।

सभी मंदिरों पर वर्तुलाकार पूर्ण परिक्रमा का विधान है। पर शिव मंदिर पर पूर्ण परिक्रमा वर्जित है। शिव लिंग से निकलने वाली जलधारा की नाली के उल्लंघन का निषेध है। साधक को उक्त नाली से लौटकर विपरीत दिशा में परिक्रमा करना होती है।

अब बात थोड़ी समझ में आ रही हैं कि जब साधक अधिक हों सामूहिक रूप से शिव मंदिर की परिक्रमा कर रहे हों तो परिक्रमा रत साधकों की पंक्तियाँ विशेष प्रकार के वर्तुल का निर्माण करेंगी। जो उक्त क्षेत्र में विशेष चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करेंगी।

मंदिरों पर परिक्रमा के उपरांत जिस बिंदु (स्थान पर) परिक्रमा पूर्ण होती है। उस स्थान पर इष्ट को प्रणाम करने के बाद कुछ समय निर्विचार की दशा में बैठना चाहिए। ताकि उस क्षेत्र में उत्पन्न उपस्थित ऊर्जा को आत्मसात किया जा सके।

उक्त समय सजग और संवेदनशील बने रहना होता है। जिससे हमें अपने चित्त पर पड़ने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रभाव को समझा अनुभव किया जा सके।

अनुभव से पाया गया ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान होता है। ऐसा ज्ञान ही हमारी संपदा होता है। दूसरों से पाया गया ज्ञान जो हमारे अनुभव में नहीं आया, वह उधार का ज्ञान होता है। वह हमारी संपदा नहीं होता।

– शत्रुघ्न सिंह

यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे

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