रुद्राक्ष

“रुद्राक्ष” के विषय में प्रसिद्ध उक्ति है : “रुद्राक्ष धारयेद्बुध:”।

[ अर्थात् ज्ञानीजनों को रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। ]

जहाँ “रुद्राक्ष” की चर्चा होती है, वहां धर्म और विज्ञान एक दूसरे से भिन्न हो जाते हैं!

विज्ञान कहता है :

“पहाड़ों व पठारों पर समुद्र तल से क़रीब दो हज़ार मीटर तक पाए जाने वाले एक जङ्गली वृक्ष के फल की गुठली को “रुद्राक्ष” कहते हैं। फल औसत रूप से जामुन के आकार का और स्वाद में बेर के समान होता है।”

किन्तु धार्मिक साहित्य की बातें पारलौकिक हैं!

धार्मिक महत्त्व के कारण ही “रुद्राक्ष” ही सम्पूर्ण संसार का एकमात्र फल है, जो विषाक्त न होने के बाद भी खाया नहीं जाता।

अलबत्ता, “रुद्राक्ष” के फल की गुठली को आभूषण बना कर धारण किया जाता है।

ये “गुठली” समग्र विज्ञान को दुत्कारते हुए, एक मात्र ऐसा काष्ठ है जो असाधारण आपेक्षिक घनत्व के कारण जलमग्न हो जाती है।

हालाँकि “एबोनी” नामक एक लकड़ी और भी है, जो अपने घनत्व के कारण जलमग्न हो जाती है। किन्तु इस वृक्ष का उद्गम “रुद्राक्ष” जितना प्राच्य नहीं है।

“रुद्राक्ष” ऐसा काष्ठ है, जिसमें लोहा, जस्ता, निकल, मैङ्गनीज, एल्यूमिनियम, फास्फोरस, कैल्शियम, कोबाल्ट, पोटैशियम, सोडियम, सिलिका, गन्धक जैसी धातु-अधातुओं का सम्मिश्रण है।

“सुश्रुत” और “चरक” की प्राचीन चिकित्सा विज्ञान में “रुद्राक्ष” का विशद वर्णन और प्रयोगात्मक अनुभवों का बृहद उल्लेख है।

“शिवपुराण” कहती है : “सती” और “शिव” के प्रेम के प्रतीक हैं, “रुद्राक्ष”!

“सती” के प्रजापति “दक्ष” के यज्ञ में भस्म हो जाने और सभी शक्तिपीठों की स्थापना के उपरान्त “शिव” एकाकी व समाधिस्थ हो गए थे।

अट्ठासी हज़ार वर्ष तक “सती” व उनके साथ व्यतीत किया गया समय “शिव” की समाधि में चलचित्रों की भाँति चलता रहा। और उनके तीनों नेत्रों में जल भरता रहा।

समयावधि पूर्ण होने के उपरान्त जब “शिव” ने नेत्र खोले तो प्रत्येक नेत्र से “अश्रुधारा” बह निकली।

एक अन्य क्षेपक कथा के अनुसार, “शिव” ने “त्रिपुर” दैत्य के वध के किए “कालाग्नि” नामक अस्त्र से प्रहार किया था।

उसे धारण करते समय, उसके तेज से “शिव” के नेत्रों में पीड़ा हुई। उन्हें अश्रु आ गए।

किन्तु ये कथा उतनी विश्वसनीय नहीं है। भला शस्त्र के स्वामी को शस्त्र से कोई पीड़ा हो सकती है?

हालाँकि अश्रु आने का कारण उक्त दोनों में से जो भी रहा हो, परिणाम सुखद रहा!

दो नेत्रों के क्षैतिज विस्तार के कारण केवल एक एक बूँद अश्रु गिरे। किन्तु तीसरे नेत्र के ऊर्ध्वाधर विस्तार के कारण अश्रु जल दो बिन्दुओं में प्रवाहित हुआ।

इसप्रकार, कुल चार अश्रु भूमि को प्राप्त हुए!

प्रत्येक अश्रुजल बिन्दु का रङ्ग पृथक् था : श्वेत, पीत, रक्त और कृष्ण।

एक एक अश्रुजल बिन्दु से एक एक वृक्ष का निर्माण हुआ। जिस अश्रुजल बिन्दु का जो रङ्ग था। उसी रङ्ग के फल उस वृक्ष से प्राप्त हुए।

यथा : श्वेत बिन्दु वाले वृक्ष से “सफ़ेद”, पीत से “पीले” आदि।

और इस तरह “रुद्राक्षों” को चार भिन्न प्रकार के रङ्ग प्राप्त हुए। इन रङ्गों के अनुसार ही विभिन्न वर्णों के मनुष्यों के लिए “रुद्राक्ष” धारण करने के नियम बनाए गए हैं!

ब्राह्मण हेतु “श्वेत”, क्षत्रिय हेतु “रक्ताभ”, वैश्य हेतु “पीत” और शूद्र हेतु “कृष्ण”।

यह भी कहा जाता है कि “रुद्राक्ष” की माला से जाप करने पर, ज्यों ज्यों जाप की मात्रा बढ़ेगी, त्यों त्यों उन दानों का रङ्ग “कृष्ण” होता जाएगा।

वर्ण कोई भी हो, ईश्वर भेद नहीं करता। ईश्वर के सम्मुख सभी को “शूद्र” ही होना है!

फल की “गुठली” को संस्कृत में लिङ्गानुसार “द्राक्ष” या “द्राक्षा” कहा जाता है। “रुद्र” से प्रकटे “द्राक्ष” को “रुद्राक्ष” का नाम मिला है।

एक सम्प्रत्यय यह भी है कि ये गुठलियां “रुद्र” के नेत्रों के प्रतीक चिन्ह हैं। अतः उन्हें “रुद्राक्ष” पुकारा गया है।

“शिव” को अश्रु आने का कारण रहा होगा कि सती ने भी मेरा साथ पाने के लिए आभूषणों की इच्छा त्याग दी थी। किन्तु मैं सती को आभूषण न दे सका!

इसी कारणवश, “रुद्राक्ष” में प्राकृतिक रूप से छिद्र होता है!

ये उन अश्रुओं का जो परिणाम था, जो पूर्व नियोजित “छिद्र” लिए हुए था। ताकि आभूषण बना कर धारण किया जा सके।

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“रुद्राक्ष” पर उपस्थित धारियों को ही “मुख” कहा जाता है।

“सन्तरा” के फल की धारियों जैसी रेखाओं की सङ्ख्या से ही “रुद्राक्ष” की “आइडेंटिटी” निर्धारित होती है। उन्हें नाम मिलता है।

काजू की भान्ति आकृति वाले एकमुखी “रुद्राक्ष” पर कोई धारी नहीं होती। एकसाथ दो गुठलियाँ “गौरीशङ्कर” अर्थात् “सती-शिव” का रूप मानी गयी हैं!

एक साथ तीन गुठलियाँ “पाटा” अर्थात् “सती-शिव-गणेश” का रूप मानी जाती हैं। “पाटा” को भद्राक्ष भी कहा जाता है। इनपर उपस्थित धारियों की सङ्ख्या बाइस से सत्ताइस होती है। वर्तमान समय में इस तरह की गुठलियाँ लुप्तप्रायः हैं।

श्वेत अश्रु से प्रकट हुए “रुद्राक्ष” भी विलुप्त हैं। उन्हें “इन्द्राक्ष” कहा जाता है। इनपर उपस्थित धारियों की सङ्ख्या पंद्रह से बीस होती है।

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यों तो “रुद्राक्ष” की वास्तविकता का सर्वश्रेष्ठ प्रमाण उसका जलमग्न होना है।

किन्तु आजकल इसमें दो समस्याएं हैं :

1) शीशम या एबोनी की लकड़ी से बने छद्म रुद्राक्ष का जालमग्न होना।
2) कच्चे या अधपके “रुद्राक्ष” फल की गुठली का जल सतह पर रहना।

वास्तविकता जानने के कुछ अन्य प्रयोगों में दो ताँबे के सिक्कों के मध्य “रुद्राक्ष” को रखकर, दोनों ओर से दबाव डालने पर उसका गोल गोल घूमना, ऊपरी सतह का प्राकृतिक रूप से ऊबड़-खाबड़ होना, तेल में भिगोने और घिसने पर रङ्ग न छूटना, जल में उबालने पर जल व दाने का रङ्ग पूर्ववत् रहना आदि प्रसिद्ध हैं।

धातु की पिन से मुआयना करने पर “रुद्राक्ष” की सतह को हानि पहुँचती है। अतएव, वास्तविकता की जाँच में, “रुद्राक्ष” के रेशे निकालने वाला प्रयोग सम्माननीय नहीं है।

एक और प्रयोग, जहाँ से मनुष्य ने “क्यूआर” कोड का फार्मूला सीखा है। “रुद्राक्ष” की सतह ठीक वैसे ही है, जैसे मनुष्य के फ़िंगर-प्रिन्ट। ये कभी भी दूसरे “रुद्राक्ष” के समान नहीं हो सकती।

यदि ऐसा है तो वो “रुद्राक्ष” नहीं बल्कि काष्ठ का मानव निर्मित आकार मात्र है!

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यों तो “रुद्राक्ष” का उल्लेख शिवपुराण, महाकालसंहिता, मन्त्रमहार्णव, निर्णय सिन्धु, बृहज्जाबालोपनिषद्, लिङ्गपुराण व कालिकापुराण में विस्तार से प्राप्त होता है।

किन्तु सनातन साहित्य के सुपरिचित १०८ उपनिषदों में से एक “रुद्राक्षोपनिषद्” इसी हेतु समर्पित है।

“रुद्राक्ष” के आकार से उसका प्रभाव निश्चित करने में ग्रन्थों का आपसी विवाद सामने आता है। कुछ ग्रन्थ आकार को प्रभाव का समानुपाती तो कुछ व्युत्क्रमानुपाती मानते हैं।

“रुद्राक्षोपनिषद्” के अनुसार भिन्न भिन्न मुख वाले “रुद्राक्ष” धारण करने के भिन्न भिन्न नियम हैं।

यथा —

1. एक से अधिक “रुद्राक्ष” एक ही सूत में धारण करने हैं तो पञ्चमुखी श्रेष्ठ है।
2. दाहिनी भुजा में छः मुखी और बाँयी भुजा में नौ मुखी धारण करना चाहिए। एक से अधिक धारण करना हो तो सोलह-सोलह प्रत्येक भुजा में।
3. मणिबन्ध में बारह “रुद्राक्ष” धारण करने चाहिए।
4. हृदयस्थल पर पचास दानों की माला श्रेयस्कर है।
5. मस्तक पर व कण्ठ में एक दाने हेतु क्रमशः बारह मुखी व एकमुखी श्रेष्ठ है।
6. “रुद्राक्ष” का यज्ञोपवीत निर्मित करने हेतु एक सूत में तीन सौ साठ दाने का प्रयोग हो और तीन से अधिक सूत न हों, अर्थात् इस प्रकार का यज्ञोपवीत केवल ब्रह्मचारी ही धारण कर सकता है।

“रुद्राक्ष” के अन्य नामों में “रुद्राक्ष”, “शिवाक्ष”, “शिर्वाक्ष”, “भूतनाशन”, “पावन” (पवित्र), “नीलकण्ठाक्ष”, “हराक्ष”, “शिवप्रिय”, आदि आते हैं।

इनका उल्लेख दुर्लभ ग्रन्थ “निघण्टु भूषण” के “वटादि” वर्ग: में आता है :

“रुद्राक्षम् च शिवाक्षम् च शर्वाक्षम् भूतनाशनम्।
पावनम् नीलकण्ठाक्षम् हराक्षम् च शिवप्रियम्॥”

“शिव” की उपहार और उनकी प्रिया “सती” के आभूषणों का “रुद्राक्षोपनिषद्” अनन्त है। अभी इस आलेख में इतना ही!

इति नमस्कारान्ते।

– योगी अनुराग

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