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ना उम्र की सीमा हो, ना जन्मों का हो बंधन

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रिश्तों के कोंपल उसी मिट्टी में अंकुरित होते हैं, जहाँ अनुकूल वातावरण मिलता है, फिर चाहे विवाह हो, प्रेम हो या फिर दोस्ती. किसी भी रिश्ते को फलने-फूलने में सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, सामंजस्य की, सहनशीलता की और प्रेम की.

जिस रिश्ते में इनमें से कोई एक भी चीज कम हो तो रिश्ते की उम्र कम हो जाती है. वैसे तो न रिश्ते की कोई उम्र होती है, न रिश्ते बनाने की ही कोई उम्र होती है. फिर ये किसने कहा है कि दोस्ती सिर्फ हमउम्रों के बीच ही होती है?

हम जब भी दोस्ती की बात करते हैं, हमारे मस्तिष्क में दो हमउम्र दोस्तों की ही छवि उभरती है. हम कभी भी बड़ी उम्र की महिला और कम उम्र के लड़के या लड़की और बड़ी उम्र के पुरुष के साथ कम उम्र की लड़की या लड़के की कल्पना नहीं कर पाते. ऐसा क्यों? क्या दोस्ती के लिए किसी ने उम्र की सीमा तय कर रखी है? या हमारे संविधान में ऐसा कोई नियम है? फिर समाज में ऐसे दोस्ती के उदाहरण देखने पर हम उसे स्वीकार क्यों नहीं कर पाते?

दोस्तों के बीच लड़ाई-झगड़े, ईर्ष्या और प्रतियोगिता की भावना आम होती है. लेकिन यही रिश्ता किसी परिपक्व व्यक्ति का अपने से कम उम्र के दोस्त के साथ हो तो इसकी आशंका कम ही रहती है. अपने अनुभवों और बड़प्पन की भावना से वो सिर्फ दोस्ती की ही नहीं, सुरक्षा की भी छत्रछाया देता है. विशेषकर जब दोस्त पारिवारिक समस्याओं पर कोई निर्णय न ले पा रहा हो, तब बड़ी उम्र के दोस्त के साथ होने से बहुत फायदा होता है. वह सही मार्गदर्शन करता है और राह दिखाता है.

लाभ सिर्फ एकतरफा ही नहीं है. ऑफिस में काम करने वाली हमउम्र महिलाओं के बीच भी यही देखा गया है कि वो अपने घर की आम समस्याओं से ऊपर नहीं उठ पातीं. ऐसे में यदि कोई युवा दोस्त हो तो उसकी जीवंतता और जोश जीवन को एक खुला आसमान देता है. विचारों को उस खुले आसमान में उड़ते बादलों पर बिठा दो तो वे जहाँ बरसेंगे, जीवन की तपती भूमि को तृप्त कर जाएँगे. अर्थात युवाओं के सपने, कुछ कर दिखाने का जज़्बा और अपनी एक अलग पहचान बनाने का जोश उन महिलाओं पर जादू की तरह असर दिखाते हैं. वह अपने संकुचित दायरे से निकलने में कामयाब हो पाती है.

यही नहीं, कई ऐसे भी रिश्ते हैं, जो दोस्ती के रिश्ते नहीं है, जैसे पिता-पुत्र का रिश्ता या पति-पत्नि का रिश्ता, लेकिन इन सभी रिश्तों में अपनी मर्यादा के साथ साथ दोस्ती का चुलबुलापन न हो तो रिश्ता नीरस-सा लगता है. क्योंकि दोस्ती का रिश्ता अपने आप में एक पूर्ण रिश्ता है, जो सभी रिश्तों में पूर्णता लाता है.

रिश्ता कोई भी हो, उम्र के बंधन से परे बनता है तो जन्मों तक साथ रहता है, क्योंकि हर कोई अपनी उम्र लिखवाकर आया है और रिश्तों को कोई उम्र में नहीं बाँध पाया है. वे तो आज भी उतने ही स्वतंत्र और स्वच्छंद हैं, जैसे पिता की सुरक्षित निगाह में सड़क पर खेलता बच्चा.

यही बात कोई ग़ज़ल गायक अपनी गायकी में बयान करता है कि “न उम्र की सीमा हो, ना जन्मों का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन”., तब हमारे मुंह से बरबस निकल जाता है …”वाह”.

लेकिन यही बात जब वास्तविक रूप से जीवन में घटित होती है तो हमारे अन्दर ऐसा कौन सा विष बुझा इंसान या मसखरा जाग जाता है कि हम उस गीत का वास्तविक स्वरूप देख नहीं पाते. क्यों हमारी दृष्टि इतनी संकुचित हो जाती है कि हम सम्मान की सारी हदें पार कर जाते हैं.

व्यक्तिगत जीवन में चाहे वो कैसा भी हो यदि उसने समाज को कुछ सकारात्मक दिया है तो कम से कम उसका सम्मान करना हमारा धर्म है. आधुनिकता के साथ हमने LGBT जैसी कम्युनिटी को स्वीकार्यता दे दी, एक अभिनेत्री यदि अपने से दस पंद्रह वर्ष छोटे या बड़े लड़के से विवाह कर लेती है तो भी हमें स्वीकार्य है, लेकिन एक सामान्य स्त्री-पुरुष के अधिक वय अंतर के साथ विवाह को स्वीकार करने में हमने अपना हृदय बहुत छोटा कर लिया.

आवश्यकता है एक विस्तृत दृष्टिकोण की जीवन में यदि कुछ भी प्राकृतिक रूप से संभव है, तो उसे समाज में सम्मान अवश्य मिलना चाहिए, हाँ अप्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय नियम के विरुद्ध जो कुछ भी है, वह अवश्य विरोध दर्ज करने लायक है.

बस एक दिन तुम लौट आना अपनी देह में…

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