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जीवन-रेखा : पहुंचेली

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रेखा, विरह का सबसे सुन्दर अधूरा गीत

कहते हैं मिलन का सबसे सुन्दर और भीना गीत वही लिख सकता है जिसने विरह की सबसे तपती भूमि पर नंगे पैर चलने का अनुभव प्राप्त किया हो. लेकिन कुछ गीत ऐसे भी होते हैं, जो विरह से मिलन तक नहीं पहुँच पाते, पूरे नहीं हो पाते. रेखा विरह का वही अधूरा लेकिन सबसे सुन्दर गीत है.

रेखा वह औरत है, जिसके हाथों में मेहंदी तो लगी, लेकिन कभी मेहंदी का रंग नहीं चढ़ा, फिर भी उसके हाथों से उसकी खुशबू ताउम्र आती रही.

रेखा, जिसकी किस्मत में विवाह की वेदी तो थी, लेकिन उसमें कभी अग्नि प्रज्ज्वलित नहीं हो सकी, फिर भी उस हवन-कुण्ड से उठते पवित्र धुंए की खुशबू ताउम्र उसके इर्द-गिर्द बनी रही….

रेखा, जिसके गले में जब भी मंगलसूत्र पड़ा, सदा ही अमंगल रहा…

मेरी नज़र में रेखा एक ऐसी औरत है जो न पूरी तरह विवाहित है, न पूरी कुंवारी, लेकिन उसके माथे पर वैधव्य भी हमेशा श्रृंगारित रहा, इसलिए वो आज भी मांग में सिन्दूर भरती है…

रेखा, जिसकी एक आँख में मुझे विरह की आग दिखाई देती है, तो दूजी में प्रेम की बहती नदी. रेखा के जीवन में ये प्रेम कई रूपों में आया, कुछ हमउम्र थे, कुछ उम्र में छोटे लोगों के साथ भी नाम जुड़ा.

लेकिन एक नाम होठों पर लगे उस काले तिल की ही तरह रेखा ने अपने हाथ से लगाया, जो वास्तव में जन्मजात नहीं है बल्कि अलग से काजल से लगाया हुआ होता है. लेकिन उस काले तिल की वजह से ही उसके उस प्यार को कभी किसी की बुरी नज़र नहीं लगी और वो नाम न लेते हुए भी रेखा के नाम के साथ अनुगूंज की तरह सदा सबको सुनाई देता है.

हर औरत के जीवन में प्रेम इसी तरह कई रूपों में आता है, लेकिन किसी एक के नाम को वो प्रेम का जीवन गीत बना लेती है. उनमें से जब किसी खुशकिस्मत औरत को अपने गीत लिखने के लिए इमरोज़-सी पीठ मिल जाती है… तो वो अमृता प्रीतम बन जाती है. और जब किसी औरत के जीवन से बहुत से पुरुष पीठ फेर कर चले जाते हैं और उसका गीत अधूरा रह जाता है, तो वो रेखा बन जाती है.

बाहर की घटनाएं, अंतर के अनुभव

जब भी हम किसी वाद की बात करते हैं तो उसके साथ अपवाद अपने आप जुड़ जाता है. जैसे आप दिन की बात करते हैं तो दिन का दिन होना, रात होने के कारण है. यदि रात का अँधेरा ना होता तो दिन का 24 घंटे का उजाला हमारी आँखों को चुभने लगता.

ठीक वैसे ही जब हम हेमा मालिनी, परवीन बॉबी, राखी, ज़ीनत जैसी सुंदरियों की बात करते हैं, जिनमें कोई अपनी ख़ूबसूरती के कारण ड्रीमगर्ल कहलाता है, कोई अपनी झील सी नीली आँखों के लिए नशीली, कोई अपनी आकर्षक देह के कारण कामुक. तब एक सांवली, मोटी सी लड़की इन सुंदरियों के सामने अपवाद रूप में ही प्रस्तुत होती है.

उस लड़की को देखकर किसी को विश्वास ही नहीं हुआ था कि सुन्दरता और अभिनय में किसी भी पैमाने पर फिट ना बैठने वाली ये लड़की अपने पैमाने खुद गढ़ेंगी और फिर उस पैमाने पर आने वाली नस्ल को तौला जाएगा.

फिर तो उस लड़की रेखा ने ऐसा Make Over किया कि उस मोटी सी लड़की पर जवानी में खूबसूरत नाम से फिल्म बनी, तो बुढ़ापे (इस शब्द के लिए क्षमा सहित) में सुपर नानी नाम से.

रेखा के बारे में मेरे पूर्वलिखित लेखों से कई लोग सहमत नहीं. बिलकुल वैसे ही जैसे आजकल की आधुनिक पीढ़ी एमी (अमृता प्रीतम) के लेखन को उस स्तर तक पहुँच कर नहीं पढ़ पाती जिस स्तर पर जाकर उन्होंने लिखा है. जिसको कभी आप सुफियाना कहते हैं, कभी आध्यात्मिक तो, कभी सांध्य भाषा में लिखे विज़न. अब आजकल की पीढ़ी जो दिन प्रतिदिन भौतिक सुख सुविधा के नज़दीक होती जा रही है और आध्यात्मिक प्रयोगों से दूर, ऐसे में आप उनसे अधिक उम्मीद रख भी नहीं सकते.

लेकिन इस मामले में रेखा ज़रा एक क़दम आगे हैं, रेखा ने नारी स्वतंत्रता के पुराने नियमों को ध्वस्त कर अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से जिया. और जो चेतना देह और दैहिक नियमों में नहीं समाती उसे बाग़ी करार दिया जाता है. रेखा सामाजिक जीवन में एक बाग़ी परन्तु आत्मिक स्तर पर एक पूर्ण स्वतन्त्र चेतना है.

यह जो बाहर की घटनाएँ होती हैं वो आपको सोने से कुंदन बनने के लिए तपाती है. कई लोग रेखा को सोना नहीं पीतल समझते हैं, लेकिन उस पीतल ने हर बार नई कलई के साथ ऐसी चमक दिखाई जो आपको शुद्ध सोने में भी कभी नहीं दिखी होगी. और सबसे बड़ी बात पीतल अपनी आप में पूरा होता है. सोने को तो फिर भी आभूषण में ढलने के लिए अन्य धातु की मिलावट चाहिए होती है.

मैं रेखा के बारे में जब भी विचार करती हूँ मुझे उसके आत्मिक अनुभवों की रेखा इतनी लम्बी दिखाई पड़ती है कि बाहरी अनुभवों की रेखाएं छोटी और गौण हो जाती है. मानस माँ अमृता प्रीतम ने जैसे रसीदी टिकट के प्राक्कथन में लिखा है… “बाहर की घटनाएं, अंतर के अनुभव”.

हम वो लोग हैं जो किसी व्यक्ति के इर्दगिर्द के बाहरी अनुभवों में ही उलझकर रह जाते हैं, और उसकी छवि भी उसी अनुसार गढ़ लेते हैं. लेकिन व्यक्ति का वास्तविक व्यक्तित्व तो तब बनता है जब वो उन घटनाओं से गुज़रकर आत्मिक अनुभव प्राप्त करते हुए चेतना को ऊंचे पायदान पर ले जाता है.

रेखा अपने समकालीन अभिनेत्रियों के साथ प्रतियोगिता में किसी भी पायदान पर नहीं ठहरती, बल्कि रेखा अपने आप में एक सीढ़ी है जिसका हर पायदान उसकी अपनी उन्नति का परिचायक है. आजकल की अभिनेत्रियां यदि केवल इस एक सीढ़ी पर भी चढ़ने का प्रयास करें, तो उसका हर पायदान उनके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होगा.

इसे आप तब तक किसी व्यक्ति के लिए उपयोग में लाई अलंकारिक भाषा की पराकाष्ठा कह सकते हैं, जब तक आपने परा व्यक्ति कोण (Transdimenssion) की नज़र से उसे नहीं समझा. रेखा के व्यक्तित्व को छोटा करके देखने के लिए आपको उससे बड़ी रेखा खींचनी होगी जो हर किसी के बस की बात नहीं, क्योंकि उन बाहरी घटनाओं के साथ अंतर के अनुभवों को जानने के लिए भी आपको दो बिन्दुओं की आवश्यकता होगी.

रेखा के लिए तो एक ही बिंदु काफ़ी है जिसको वो होठों पर लगाकर इठलाती हुई समाज की देहरी पारकर जाती है और लोग उसे अनंत में तक जाते हुए देखते रह जाते हैं… लेकिन कोई नहीं जानता वो दूसरा बिंदु कहाँ है जहाँ पर यह रेखा ख़त्म होती है.

रेखा, बदलते दैहिक अनुभव के बीच एक तटस्थ आत्मा

कहते हैं जो हर इश्क़ ख़ुदा की नेमत समझकर, उसे इबादत की तरह करता है, एक दिन वो ख़ुद इश्क़ बन जाता है.

रेखा के जीवन में जब भी इश्क़ नाज़िल हुआ, उसके चेहरे के नूर को बढ़ा गया और साथ में चार चाँद लगा गया उसकी अदायगी को. आप रेखा से जब भी रूबरू होते हैं, चाहे परदे पर ही सही आपको अभिनय की उस उत्कृष्ट सीमा के दर्शन होते हैं, जहां अभिनय समाप्त हो जाता है और वास्तविकता शुरू होती है. कारण फिर वही है, कि जब कोई अपने किरदार को वास्तविक चरित्र में उतार लेता है तो आपको अभिनय से अभिनेता को हटा देना पड़ता है और उस व्यक्ति के वास्तविक चरित्र को उभारना पड़ता है.

उभारना पड़ता है, कहना भी गलत होगा, ये कहना अधिक उपयुक्त होगा कि अभिनय उस अभिनेता में इतना जीवंत हो उठता है कि उसे ख़ुद ये समझना मुश्किल हो जाता है कि वो अभिनय है या वास्तविकता.

लेकिन रेखा के लिए ये इतना भी आसान नहीं था. उसे उस समय अपने अभिनय को पकड़ कर रखना था जब वास्तविकता हावी हो रही थी. जी हाँ हम बात कर रहे हैं फिल्म सिलसिला की. सिलसिला में वो मुझे पूरी तरह एक अभिनेत्री ही नज़र आई. क्योंकि वो रोके हुए थी उसमें वास्तविकता को उतरने से. इस फिल्म में जया भादुड़ी का अभिनय वास्तविकता की ओर अधिक मुखर लगा मुझे.

ख़ूबसूरत की चुलबुली मंजू से लेकर आस्था की मानसी तक का सफ़र करते हुए रेखा ने जिन परतों को अपने चेहरे पर ओढ़ा, वो उसके अनुभव की पूरी एक क़िताब है, जिसका हर पन्ना अपनी कहानी कहता हुआ-सा लगता है.

रेखा अपनी सारी कहानियों की एकमात्र नायिका है, जिसके जीवन में नायक आते जाते रहे. लेकिन उस क़िताब की किसी नायिका को वो अपने साथ ले जा न सके. क्योंकि रेखा एक larger than life चरित्र है और किसी में इतनी कूवत नहीं कि अपनी ज़िंदगी को उसके नाप का कर सके. हर नायक उसके व्यक्तित्व के आगे बौना ही रहा और वो जाते हुए अपना “कुछ” रेखा में छोड़ गया और रेखा बड़ी होती चली गयी…

उम्र जब सीढियां चढ़ती है, तो नीचे की सीढियां देह की तरह सिकुड़ती जाती है और ऊपर का आसमान विस्तृत होता जाता है, रेखा का उम्र से यही ताल्लुक है. रेखा उस समन्दर की तरह है जिसके आँखों के किनारे पर लहरें टूटती गयी और झुर्रियों के रूप में जमा होती गयी. लेकिन सागर की असीमता के आगे टूटे किनारों पर नज़रें कहाँ टिकती है.

यूं तो हर औरत या कहें हर अभिनेत्री खुद को चिरयौवना बनाए रखने के प्रयास में बहुत कुछ करती है, रेखा ने भी किया, योग. भोग से योग तक की यात्रा को पूरा-पूरा जीने वाली रेखा के आभामंडल में परिपक्वता तो बढ़ती गयी लेकिन अपने अन्दर की बच्ची को उसने सदा जीवित रखा और साथ ही जीवित रहा बच्चों के लिए लगाव और ममता. इसलिए रेखा, जिन सह-अभिनेताओं और अभिनेत्रियों से जुड़ाव अनुभव करती हैं, उनके बच्चों को मिलने अक्सर जाया करती है.

आपने हॉलीवुड की ऐसी कई फिक्शन मूवीज़ देखी होंगी जिसमें कोई वैम्पायर अपनी यौवन ऊर्जा को बनाए रखने के लिए युवा या बच्चों से उनकी ऊर्जा चुरा लेती है और फिर से युवा हो जाती है. लेकिन रेखा एक ऐसी आत्मा है जो बच्चों से मिलकर उन्हें अपनी ऊर्जा दे आती है और उनके प्रति ममता से स्वत: ही उसकी त्वचा में ऊर्जा यूं भर आती है जैसे किसी माँ की छाती में किसी अनजान रोते बच्चे की किलकारी से दूध भर आता है. तभी उसकी उम्रदराज़ देह में उसकी आत्मा आज भी युवा है.

रेखा के बारे में एक बात ये भी सुनने में आई कि वो कभी भी दोपहर के एक बजे से पहले फोटो शूट नहीं करवाती थी और फोटो शूट के समय अपने सामने इतने बड़े आईने लगवाया करती थी कि वो खुद को हर एंगल से देख सके. कहते हैं एक उम्र के बाद सुबह उठने के समय चेहरे पर जो सूजन आ जाती है वो दोपहर तक ही उतर पाती है. तो इससे पहले फोटो शूट करवाना रेखा को पसंद नहीं था.

अपनी सुन्दरता के लिए सजग होने के बावजूद और फोटो शूट के लिए तरह-तरह के वेस्टर्न ड्रेस पहनने के बावजूद, रेखा किसी भी फ़िल्मी पार्टी या इंटरव्यू में हमेशा गोल्डन साड़ी में ही नज़र आती है, साथ में छोटा सा पर्स, चोटी में परांदा, मांग में सिन्दूर और माथे पर बड़ी सी बिंदी. ये रेखा के उस चारित्रिक गुण को दर्शाता है कि चाहे वो दैहिक स्तर पर कितने ही परिवर्तन और अनुभव ग्रहण करती रहे लेकिन उसकी आत्मा हमेशा तटस्थ रहती है.

आईना है मेरा चेहरा, अपनी तस्वीर तू देख ले

हर देवता में कुछ मानवीय गुण होते हैं और हर मानव में कुछ असुर तत्व, इससे हम उसे देवता या मानव होने से पदच्युत नहीं कर सकते. वैसे ही किसी पुरुष में स्त्री तत्व प्रबल हो जाता है, तो कभी किसी स्त्री में पुरुष तत्व प्रबल हो जाता है, तो हम उसे उसके पुरुष या नारी होने से पदच्युत नहीं कर सकते.

बस उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है. कभी कोई पुरुष नारी की तरह कोमल ह्रदय होकर समर्पण कर देता है तो कोई नारी पुरुष की भांति आक्रामक हो जाती है.

मुझसे कुछ लोगों ने रेखा और उसकी महिला सेक्रेटरी के बीच समलैंगिक संबंधों के बारे में पूछा, तो मैं उपरोक्त बातों के द्वारा उसकी पुष्टि तो कर सकती हूँ, लेकिन साथ में ये भी कहना चाहूंगी, जब रेखा के जीवन में घटित हुई घटनाओं को प्रस्तुत करते हुए मैंने किसी भी पुरुष का नाम लिखने की आवश्यकता नहीं समझती, तो यहाँ पर भी मैं इस बात का ज़िक्र आवश्यक नहीं समझती.

सेलेब्रिटी का जीवन कितना भी सार्वजनिक हो जाए “कुछ” तो हर व्यक्ति का बहुत व्यक्तिगत होता है, जिसे पार करने का दुस्साहस हम उसकी आज्ञा के बिना नहीं कर सकते. और मुझे अभी तक ऐसी कोई आज्ञा लेने की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई. जिस दिन होगी ले भी लूंगी. लेकिन वो रेखा और मेरे बीच का साझा क्षण होगा, जब मैं अपना कोई राज़ उसे सौंप दूंगी और वो अपना कुछ निजी मुझे सौंप कर किसी बात से भारहीन हो जाएगी.

ये भी मैं इतने आत्मविश्वास से इसीलिए कह रही हूँ क्योंकि मैं प्रकृति के सामने रखी कामना पूर्ति के जादू को बहुत शिद्दत से अनुभव कर सकी हूँ.

किसी मित्र ने एक बहुत सुन्दर सन्देश मुझे लिख भेजा जिसे मैं आपके सामने प्रस्तुत करना चाहूंगी-

“आप जब रेखा पर लिखती हैं तो ऐसा लगता है मानों कि जो ज़िंदगी रेखा जी रही है या तो आप उनके साथ थी या आपने बहुत करीब से महसूस किया हो… ”

तो मैं यही कहना चाहूंगी एक स्त्री होने की अनुभूति और अनुभवों से गुजरने की जिस पीड़ा को भोगना होता है, वो पूरी औरत जात के लिए एक ही तरह की होती है.

हालांकि स्त्री एक कल्पवृक्ष होते हुए भी उससे कई शाखाएं निकलती हैं, जिसमें कुछ पतिव्रता, कुशल गृहणियां पूरी तरह से इस बात को अंगीकार नहीं कर पाती या फिर कोई आधुनिक बाला जिसके लिए कोई भी प्रेम आत्मा को गहरे से नहीं छू पाता, उसके लिए भी समझना मुश्किल होगा. फिर अपवाद कहाँ नहीं होते.

औरत प्रेम को सतहों में नहीं बांटती, उसके लिए हर प्रेम सिर्फ प्रेम होता है, जहां हर बार पूरा समर्पण, हर लांछन पूरा अनुभव और हर विरह पूरी की पूरी पीड़ा होती है. और रेखा के लिए ये बात पूरी शिद्दत से मैंने अनुभव की है.

क्योंकि रेखा एक आईना है, कल प्रेम से भरकर देख रहे थे तो उसमें आपको प्रेम नज़र आ रहा था, आज नफरत से भरकर देखोगे तो आपको नफरत नज़र आएगी, रेखा तो कल भी आईना थी आज भी आईना है.

पूरी नफरत के साथ पत्थर उछालोगे तो वो टुकड़े-टुकड़े तो हो जाएगी लेकिन आपका प्रतिबिम्ब भी उसमें उतने ही टुकड़ों में बंट जाएगा. वो तो टुकड़े होकर भी खरोंच तक नहीं देगी जब तक कि आप अपन प्रतिबिम्ब निकालने की कोशिश में उन टुकड़ों को छूने का प्रयास नहीं करोगे.

और यह बात रेखा पर ही नहीं हर औरत पर लागू होती है… औरत हमेशा एक आईना है, आप प्रेम से भरे रहोगे तो प्रेम दिखेगा नफरत से भरे रहोगे तो नफरत दिखेगी. कभी किसी औरत पर पत्थर उछालो तो पूरी शिद्दत से उछालना, आईना चूर होगा तभी तो तुम भी उससे मुक्त हो पाओगे. वरना अपने ही प्रतिबिम्ब से लड़ते-लड़ते थक जाओगे.

रेखा के लिए निदा फ़ाज़ली की एक रचना मुझे याद आती है-

वो किसी एक मर्द के साथ

ज्यादा दिन नहीं रह सकती

ये उसकी कमजोरी नहीं

सच्चाई है

लेकिन जितने दिन वो जिसके साथ रहती है

उसके साथ बेवफाई नहीं करती

उसे लोग भले कुछ भी कहें

मगर !

किसी एक घर में

जिंदगी भर झूठ बोलने से

अलग अलग मकानों में सच्चाई बिखेरना

ज्यादा बेहतर है ।

मुझे मेरा एकांत प्रिय है, जैसे प्रिय से मिलना एकांत में

इश्क़, कभी न ख़त्म होने वाला सिलसिला

तेरी तलाश में वक़्त का कोई लम्हा
जब किसी सवाल की रूह में उतरता है
तो जवाब एक ज़बान हो जाता है
जहां आंसू के मायने मेरा दर्द
और खुशी के मायने तेरा मुस्कुराना हो जाता है

एक जवाब खुशबू में उतरा
तो मेरी मोहब्बत हरसिंगार से ढंकी सुबह की ज़मीन हो गयी
और रात रानी की तरह तेरा ज़िक्र निकलता रहा

और यही जवाब जब आँखों की रोशनी में उतरता है
तो अँधेरा तेरी जुल्फें
और उजाला मेरी आरज़ू हो जाता है

कभी ये जवाब आसमान पर चढ़ता है
तो माहताब तेरी बातें
और आफताब मेरी जूस्तजूं हो जाता है

आज ये जवाब मेरी रूह में उतर आया है
तो सवाल बन बैठा है मेरे वजूद का
क्या मोहब्बत यही होती है
कि जब रूह पानी में और बदन आग में तब्दील हो जाता है

गर हाँ तो मैं फिर कहता हूँ
हां हमें मोहब्बत है…. मोहब्बत है… मोहब्बत है…
अब दिल में यही बात, इधर भी है, उधर भी…..

नायिका तत्व ही रेखा की असली कमाई है

मेरी नज़र में रेखा प्रेम का झरना है, जो ऊंचाई से गिरता हुआ उच्छृंखलता, सुन्दरता और कशीश से सराबोर होता है, और नीचे बहते हुए शीतल कलकल करता हुआ शांत, लेकिन जलतरंग की भांति मन में तरंग पैदा करता है.

यही झरना नदी में तब्दील हुआ तो कई घाटों में बंट गया, नदी के घाट पर लोग अलग-अलग प्रयोजन से आते हैं, कुछ देह का मैल धोने, कुछ पाप विसर्जित करने, कुछ आस्था का दीया प्रवाहित करने…. नदी किसी को मना नहीं करती, हर प्यासे की तृप्ति उसका धर्म होता है.

प्रकृति के इस शाश्वत नियम को रेखा ने अपने पूरे अस्तित्व से स्वीकारा लेकिन सागर में विलीन हो जाने की आख़िरी उम्मीद को उसने कभी नहीं छोड़ा.

शायद इसी उम्मीद में उसने विवाह का एक आख़िरी प्रयास किया, लेकिन कुछ नदियों की किस्मत में केवल घाट ही होते हैं. समंदर उसकी किस्मत से जन्मों दूर होता है. इसलिए अपने अंतिम विवाह के बाद पति का आत्महत्या कर लेना रेखा की जन्मपत्री पर नियति की अंतिम मोहर थी.

रेखा के विवाह से जहां दुनिया अचंभित सी मुंह बाए खड़ी थी, वही दुनिया पति की आत्महत्या की खबर तक वैसी ही खड़ी रही लेकिन रेखा हवा के तेज़ झोंके की तरह इन परिस्थितियों से भी बाहर निकल आई.

इस बाहर निकलने की प्रक्रिया में उसके अन्दर क्या तूफ़ान आए और उसकी आत्मा पर कितने निशान छोड़ गए ये बात केवल वो तूफ़ान जानता है या सिर्फ रेखा. मैं सिर्फ कल्पना कर सकती हूँ एक औरत होने के नाते और इस कल्पना के बल पर ही खड़े होकर इतनी तटस्थता से उसके बारे में इतना कुछ लिख सकती हूँ.

तो सावन भादों की वो सांवली लड़की सुपरनानी बनने तक का सफ़र जब तय करती है, तो उसकी अलग-अलग फिल्मों में उसके किरदार की चर्चा होने के बावजूद रेखा का रेखा तत्व हमेशा सर्वोपरि होता है.

और यही वास्तविक अर्जित कमाई है. नायक या नायिका ने कितनी फ़िल्में और कितने किरदार कमाए ये मायने नहीं रखता, मायने रखता है इन सारी कमाई के बीच अपने नायकत्व या नायिका तत्व नहीं खोया.

सारी असफल प्रेम कहानियों की सबसे सफल नायिका

Rekha, The Untold Story, यासिर उस्मान की किताब में रेखा के जीवन की घटनाओं को किस तरह से लिखा गया है ये तो मैं नहीं जानती, लेकिन एक औरत जब अपने जीवन के अच्छे बुरे अनुभवों से पर्दा उठाती हैं, तो खबरों की दुनिया में जिन चटखारों के साथ उसका प्रदर्शन होता है, वो उस औरत के लिए दोबारा उन घटनाओं से गुजरने के समान ही है.

अपनी रहस्यमयी ज़िंदगी के दरवाजों को हमेशा बंद रखने वाली रेखा ने ज़रा सी खिड़की क्या खोली, पूरी दुनिया की भीड़ उस खिड़की के आगे जमा हो गयी है… और खिड़की से दिखाई देनेवाले दृश्य को अपने अपने हिसाब से खबरों की दुनिया में उछालते रहे…

उनमें से एक बात भी यहाँ कहना एक औरत के गरिमापूर्ण जीवन का अपमान करना होगा… उस औरत का जिसकी आज़ादी के लिए लोग झंडे उठाये फिरते हैं. और ये तो एक आज़ाद रूह की दास्तान है, जो जब देह की सीमाओं में नहीं समाती तो समाज की नज़रों में बाग़ी करार दी जाती है.

यासिर उस्मान की किताब के लिए रेखा ने वो तथ्य दिये जो वो जानती है, जिस दिन मैं रेखा के जीवन पर किताब लिखूँगी तब ऐसे रहस्यों से पर्दा उठाऊंगी जिनके बार में रेखा खुद भी नहीं जानती होगी.

जीवन वही नहीं होता जो घटित होता है, वास्तविक जीवन वह होता है जिसकी वजह से घटनाएं घटित होती हैं… जीवन की यात्राएं घटनाओं से अधिक उसके कारकों द्वारा नियंत्रित होती हैं.

Rekha, The Untold Story, वह होगी जो रेखा द्वारा भी Untold रह जाएगी… और जो लिखा जाएगा वो वह होगा जिसे रेखा को कहने की ज़रूरत ही नहीं, उसके अनुभवों को जानना, उसी प्रेम और पीड़ा के प्रसव से गुज़रकर एक नई रेखा को जन्म देने के समान होगा.

जीवन-रेखा : मैं अज्ञात हूँ, तुम्हारे खोजे जाने तक…

आजकल बहुत बोलने लगी हूँ
इतना बोलना भी ठीक नहीं
नज़र लगते देर नहीं लगती

पिछली बार जो काजल का डिठौना
होठों पर लगाया था
उतर कर गर्दन पर आ गया है

सुराही के छेद से रिस कर तृष्णा
नाभि पर तृप्ति बन इकठ्ठा हो रही है
तुमने ही तो कहा था प्यास को
इतना पानी पिलाओ कि
उसे खुद याद न रहे
कि वो प्यास है

तो कौन किसकी प्रतीक्षा में बैठा है
अब यह भी याद नहीं…
तृप्ति की गाथाएं बहुत जानी पहचानी सी हैं
लेकिन प्यास को तृप्ति में बदलते कितनों ने देखा है

जाने पहचाने भावों में कैसे दिखेगी
उस अनजानी प्यास-तृप्ति के रूपांतरण की कहानी
जो उपजी है अज्ञात से प्रेम के कारण

देखने की प्रथा भी तो सृष्टि के उपजने के साथ जुड़ी है
अनदेखे को मेरी तरह
सदैव नज़रों में बसाए रखना कितनों ने सुना है

क्या सुनना भी
ॐ की उत्पत्ति जितना पुराना नहीं?
हाँ ये एक नई बात है कि
तुम्हारी अनकही बातों को
मेरे कान की बाली से टकराकर लौटते
किसी ने नहीं देखा, जाना या समझा…

लेकिन जितना जान लिया है
उससे तो वो अन-जाना ही बेहतर है ना!

क्या अब भी तृप्त नहीं हुई है जिज्ञासा
और कितना मुझे जानने की चाह बची है
पहले भी कहा था आज फिर कहती हूँ
मैं रोज़ नई हूँ
अपने ही पुराने किसी स्वरूप के
ठीक विपरीत,
मेरी देह को जनने वाले भी मुझे जान न सके
जिनकी आत्मा को मैंने जना वो भी मुझे जान न सकेंगे
पुराना जानने तक मैं नई हो चुकी होऊंगी
ज्ञात शब्दों में अज्ञात के अर्थ नहीं मिलेंगे…

पर तुम जान लो..
ये जो ‘मैं’ ‘मैं’ कहती रहती हूँ
जिसे लोग मेरा अभिमान कहते हैं
वो मेरा गर्व है
क्योंकि उस ‘मैं’ में भी
‘तुम’ ही ध्वनित हो
लेकिन इसको सुनने के लिए
ज्ञात ज्ञानेन्द्रियाँ पर्याप्त नहीं होती…

मैं तो फिर भी शम, दम, दण्ड, भेद लगा
अज्ञात भाव को
ज्ञात पर सवार कर तुम तक पहुंचा ही देती हूँ
क्योंकि मुझे तुम्हें कहीं खोजना नहीं था,
तुम तो मेरा ही अविष्कार हो
मैंने तुम्हें रचा है अपनी रचनाशीलता से
काया दी है अपनी कल्पना से
नाम इतने दिए हैं कि
तुम्हें अपना सांसारिक नाम भी याद न होगा

लेकिन तुम्हारी कोई बात मुझ तक पहुंच नहीं पाती
मैं इतनी ही अज्ञानी हूँ…
और अज्ञात भी…
जब तक तुम मुझे खोज नहीं निकालते…

जीवन-रेखा : वो बहुत झगड़ालू हो गयी है, आजकल ईश्वर से ठनी है…

मेरी नैतिकता की परिभाषा
जब संसार की किसी पुस्तक में
मिल नहीं पाती
या मेरी भावनाएं
उनकी ज्ञात संख्या
की गणना से
बाहर हो जाती है

तो वो नैतिक के पहले
ज्ञात शब्दों का सबसे पहला अक्षर
“अ” का उपसर्ग लगाकर
और भावना के बाद
उनके द्वारा खोजी गयी पहली
“अ”मूल्य संख्या “शून्य” का
प्रत्यय लगाकर
मुझे अपने संसार का होने से ही
खारिज कर देते हैं…

लेकिन वो नहीं जानते
मैं प्रकृति की अंतिम
लाडली, ज़िद्दी और सरचढ़ी
संतान हूँ…
इसलिए उसके किसी नियम को
तोड़ने पर
मुझे सज़ा नहीं मिलती…

बल्कि मेरी हर नई शरारत
प्रकृति में
नए नियम के रूप में
दर्ज हो जाती है…

मेरी इसी आत्ममुग्धता से
प्रकृति का सौन्दर्य और
उसकी प्राकृतिकता बरकरार है…

– माँ जीवन शैफाली (रेखा पर लिखी जा रही पुस्तक “पहुंचेली” के अंश)

चित्र साभार बॉलीवुड फ़ोटोग्राफ़र जयेश शेठ

रेखा जहां पर ख़त्म होती है, वहां से शुरू होते हैं अमिताभ

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