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तन नुं बनावे तम्बूर अने मन ना करे मंजीरा, तो तमे मानजो के ए हशे, राधा ने कां मीरा

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एक राधा, एक मीरा दोनों ने श्याम को चाहा
अन्तर क्या दोनों की चाह में बोलो
इक प्रेम दीवानी, इक दरस दीवानी

राधा ने मधुबन में ढूँढा
मीरा ने मन में पाया
राधा जिसे खो बैठी
वो गोविन्द और दरस दिखाया
एक मुरली एक पायल, एक पगली, एक घायल
अन्तर क्या दोनों की प्रीत में बोलो
एक सूरत लुभानी, एक मूरत लुभानी
इक प्रेम दीवानी, इक दरस दीवानी…

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर
राधा के मनमोहन
राधा नित श्रृंगार करे
और मीरा बन गयी जोगन
एक रानी एक दासी, दोनों हरि प्रेम की प्यासी
अन्तर क्या दोनों की तृप्ति में बोलो
एक जीत न मानी, एक हार न मानी
इक प्रेम दीवानी, इक दरस दीवानी

एक भजन आप दो विधा में सुनिए, एक स्वर कोकिला लता मंगेशकर के स्वर में दूसरा भजन सम्राट उस्मान मीर की आवाज़ में…

आप एक ही गीत सुनते हुए दो अलग संसार को अनुभव कर सकते हैं, एक आपको ध्यान की ऊंचाइयों तक ले जाता है लगता है आप ब्रह्माण्ड के उस छोर पर पहुँच गए हैं जहाँ से ॐ की उत्पत्ति हुई है.

दूजा भक्ति और समर्पण की उस धरती पर अकेला छोड़ देता है जहाँ पाने की उत्कंठा खुद में ऐसी समाधिस्थ हो जाती है कि अप्राप्य को भी ह्रदय में स्थित पाते हैं…

लोग अक्सर पूछते हैं मुझसे कि कृष्ण के बाद राधा के जीवन का इतिहास में कोई वर्णन नहीं मिलता… मैं उन्हें जिस रहस्यमय जगत में ले जाकर उत्तर देना चाहती हूँ वे मेरे साथ वहां तक चलने को राजी नहीं होते.

उन्हें साक्ष्य चाहिए तत्व के मानवीकरण के और मैं उन्हें अनुभव करवाना चाहती हूँ उस प्रक्रिया का जहाँ मानव तत्व में रूपांतरित हो जाता है.

राम और कृष्ण के मानवीय अवतार के रूप में ऐतिहासिक प्रमाण के अलावा हम उन्हें राम तत्व और कृष्ण तत्व कहते हैं. कहते हैं ॐ ही की तरह जब आप राम शब्द का जप करते हैं तो आपका सम्बन्ध ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के सीधे राम तत्व से जुड़ता है.

वैसे ही कृष्ण के लिए कहा जाता है कि आपको कृष्ण को पाना हो तो राधा को पुकारिए. क्या ऐसा मात्र मानवीय रूप में संभव है. जब तक हम इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि भारत में जितने भी ग्रन्थ लिखे गए हैं वो अज्ञात को ज्ञात भाषा में उतारने का एक प्रयास मात्र है. जो अज्ञेय है वह इतना रहस्यमयी है कि आप उसमें रमे बिना उसे जान नहीं सकते, तब तक इसे समझना मुश्किल है…

और एक बार कोई इस रहस्यमयता में रम गया फिर वह इस ज्ञात संसार का नहीं रह जाता, फिर कथाएँ क्या कहती हैं उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, इस बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन सी पुस्तक में राधा को कृष्ण से बड़ी उम्र का कहा गया है, किस पुस्तक में उसे कृष्ण की मामी के रूप में वर्णित किया गया है (ज्योतिषाचार्य पवन सिन्हा के अनुसार).

लेकिन यह जान लीजिये कि राधा एक तत्व है, प्रेम तत्व, और उसका रहस्य जानना उस तत्व को धारण किये बिना संभव नहीं.

हां आप उसके ऐतिहासिक प्रमाण खोजने के लिए पुस्तकें छान मारिये, लेकिन पुस्तकें तो सिर्फ चाभी हैं उस रहस्य को जानने की… सिर्फ उस ओर इंगित कर सकती है जहाँ तक आपको पहुँचाना है, वहां तक पहुंचना तो आपको ही पड़ेगा.

और वहां तक पहुँचने के लिए जो कष्ट भोगना होते हैं वह साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं, कोई मीरा ही वहां तक पहुँचने का सामर्थ्य रख पाती है.

जैसे राधा एक तत्व है उसी तरह मीरा एक भाव है, हां मानवी रूप में आप उसकी कथाएँ पढ़ लीजिये लेकिन क्या सिर्फ उन कथाओं को पढ़ने मात्र से मीरा भाव जागृत किया जा सकता है? क्या मीरा जितना कष्ट भोगने का सामर्थ्य सबमें होता है?

हाँ, यह भाव और तत्व सबकी चेतना में होता है, बस अपनी चेतना में पड़े उसके बीज को खाद पानी देकर उसे अंकुरित करना होता है, उसे वृक्ष बन जाने के लिए परिस्थतियाँ देना होती है. और जब आप अस्तित्व द्वारा बीज से वृक्ष हो जाने के लिए चुने जाते हैं तो आपके लिए विशेष रूप से योजनाएं बनती है, जिसे हम आध्यात्मिक यात्रा कहते हैं.

मैं नहीं जानती मुझमें इस पीड़ा को भोगने का कितना सामर्थ्य है, या मेरे लिए अस्तित्व कितनी योजनाएं बना रहा है. मैं तो बस इतना जानती हूँ मैंने अपने अन्दर राधा तत्व और मीरा भाव दोनों को समाहित किया है…

इसलिए आप जब मुझे एक संन्यासन होते हुए भी सांसारिक होते हुए देखते हैं तो वह मेरे अन्दर की राधा ही है जो कृष्ण की प्रतीक्षा में रोज़ श्रृंगार करती है… कभी उस जोगन को देखना हो तो मेरी तरह मीरा हो जाना पड़ेगा…

तत्व तक पहुँचने की पहली सीढ़ी भाव ही तो होती है… आपका समर्पण, आपकी भक्ति आपका प्रेम जब सबकुछ कृष्ण से एकाकार हो जाता है तो वह संसार से विमुख होकर विष का प्याला भी हँसते हुए पी जाती है…

जीवन की प्रकट घटनाएं वही विष है जिसे पीकर कोई मीरा हो जाता है, कोई सुकरात हो जाता है, कोई नीलकंठ हो जाता है…

तो मैं अपने कृष्ण की रानी भी हूँ और दासी भी… इसलिए… जब स्वर कोकिला लता गाती हैं कि –

एक रानी एक दासी, दोनों हरि प्रेम की प्यासी
अन्तर क्या दोनों की तृप्ति में बोलो
एक जीत न मानी, एक हार न मानी….

तो मैं सुनते हुए ब्रह्माण्ड के राधा तत्व में विलीन हो जाती हूँ…

और जब उस्मान मीर अपने अंदाज़ में कहते हैं –


तन नुं बनावे तम्बूर अने मन ना करे मंजीरा, तो तमे मानजो के ए हशे, राधा ने कां मीरा …
(तन को जो तम्बूर बना ले और मन को मंजीरा, तब आप जान लेना वह या तो राधा है या फिर मीरा)

तो मैं हाथ में मंजीरा लिए मीरा हो जाती हूँ…

– माँ जीवन शैफाली

उस्मान मीर की आवाज़ में एक बार अवश्य सुनें….

प्रेम विना पावे नहीं, भले हुनर करो हज़ार
कहे प्रीतम प्रेम विना, तमने नहीं मडे नन्द कुमार

जेना होठों पर हंसी, अने पग मां हशे चीरा
तो तमे मानजो के ए हशे, राधा ने कां मीरा

तन नुं बनावे तम्बूर अने मन ना करे मंजीरा
तो तमे मानजो के ए हशे, राधा ने कां मीरा

 

हे री सखी मंगल गावो री, धरती अम्बर सजावो री, आज उतरेगी पी की सवारी

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