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जय राधा माधव, जय कुंज बिहारी

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पुस्तकों में लिखे शब्दों को अस्तित्व में बोने के लिए आँखों का पानी देना होता है, परन्तु जीवन की पुस्तक में लिखे जाने वाले अक्षरों को, घटनाओं को जब साक्षी भाव का पानी मिलता है, तो बीज सिर्फ जीवन के अस्तित्व में नहीं, समय की साँसों में भी पड़ जाते हैं.

फिर वो समय जिस जिस काल से गुज़रता है, उस उस काल में उन घटनाओं से नए संस्कारों के बीज पनपते हैं, उसी से आने वाले समय की फसलें निर्धारित होती है.

जीवन में घट रही घटनाओं को वह साक्षी भाव से देख रही थी, और उसे उसी तरह स्वीकार कर रही थी जिस तरह से आने वाली साँसों को और जाने वाले समय को किया जाता है.

किसी अद्भुत क्षण में जब प्रेम जल उसके अस्तित्व की माटी पर पड़ता तो वह सौंधी कच्ची मिट्टी घड़े में परिवर्तित हो जाती, जिसे उस आग के हवाले कर देती जिसे जीवन कहा जाता है.

इश्क़ का न जाने कैसा जादुई पानी था उस घड़े में कि जब भी कोई अंतर की प्यास लिए उसमें झांकता भी, तो उसकी प्यास उसके अस्तित्व की साक्षी हो जाती… बस मृग को जब पता चल जाए कि कस्तूरी उसकी नाभि में है तो उसकी तो सारी तृष्णा वहीं समाप्त हो जाए.

जब अंतर की प्यास के दर्शन हो जाए तो अस्तित्व को स्वीकार का पानी मिल जाता है. और जब अस्तित्व को स्वीकार का पानी मिल जाता है तो वह किसी समय या काल पर निर्भर नहीं होता, फिर जब भी कोई फूल खिलता है, जब भी कोई बीज अंकुरित होता है, तो अस्तित्व को काया मिल जाती है और समय के अलग अलग खण्डों से एक ही कहानी निकलकर आती है… राधा की कहानी…
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लेकिन राधा के अंतर की प्यास को न जाने कौन से ऋषि का श्राप था कि वह राधा से मीरा बन गयी थी. और उसका माधव छलिया बनकर अलग अलग रूप धरता बार बार उसके सामने आता और छुप जाता…

उसकी अपनी नाभि में छुपी गंध से वो बौराई हुई थी… उसकी आत्मा पर प्रेम का न जाने कौन सा जंगली फूल खिल गया था जिसे कभी काया नहीं मिली… चेहरा नहीं मिला…

वो उसके घर के सामने से निकलते हर आने आने वाले में अपने माधव का रूप देखती… उसके पीछे पागलों की तरह दौड़ती… उसके बाबा हर बार उसे खींच कर घर ले आते… राधा कब निकलोगी इस काल्पनिक दुनिया से.. जिसे खोज रही हो ऐसा कोई व्यक्ति इस धरती पर है ही नहीं…

तुमने कब कैसे उसे गढ़ लिया तुम्हें खुद ही याद नहीं… और जो रूप तुमने गढ़ा है वो तुम्हें पहचानता तक नहीं… उस बेचारे ग्वाले का धर्म क्यों भ्रष्ट करती हो… वो सच में तुम्हें नहीं जानता…

और जिसे तुम जानती हो ऐसा कोई व्यक्ति इस धरती पर है ही नहीं, तुम्हारे स्वप्न लोक से निकली कहानियां है जो तुम्हारी ही कल्पनाओं का जाल है जो तुम दिन भर बुनती रहती हो…

ऐसा कोई व्यक्ति है ही नहीं इस धरती पर, तुम अपनी ही कल्पनाओं के मायाजाल में फंस चुकी हो… तुमको पता है ना तुम जो चाहती हो अस्तित्व तुमको देता जाता है…

तो मेरे माधव को क्यों नहीं देता… – बस एक करुण आर्तनाद राधा के गले में सिसकी बनकर अटक गया…

क्योंकि उसे तुम्हारी कल्पनाओं ने गढ़ा है इसलिए वो तुमको कल्पना लोक में ही मिलता है… वास्तव में ऐसा कोई व्यक्ति होता तो अवश्य आता…

नहीं… माया ठगनी इतना बड़ा परिहास नहीं कर सकती मेरे साथ…

राधा, आँखें खोलो और स्वप्न की दुनिया से बाहर आओ… माधव की कहानी जो 2017 में राम के रूप में ख़तम हो चुकी है उसे तुम 2018 में अपने हठ के कारण माधव बनाकर खींच कर ले आई हो…
जब खुद ही उसे माया ठगनी कहती हो तो उससे ठगे जाने में क्या आनंद आ रहा है तुमको…

*****
राधा को विश्वास ही नहीं आता था… जो स्वप्न वो देख रही थी खुली आँखों से, वो दिखने वाले दृष्यों से अधिक स्पष्ट थे. पिछले जन्म की झलकियाँ, कभी पुत्र के रूप में, पिता के रूप में कभी किसी बहुत करीबी रिश्ते के रूप में…

हाँ कभी उसे प्रेमी के रूप में नहीं देखा किसी स्वप्न में… लेकिन इस बार उसे लगता था उसकी देह में एक नहीं दो आत्माएं रहती हैं… दो देह एक आत्मा उसने बहुत सुना था लेकिन अपनी एक देह में दो लोगों को वो साक्षात देख पा रही थी…

वो कैसे बताती अपने बाबा को कि माया ठगनी जिस रूप में बार बार उसके सामने उसे ला रही थी वो सांसारिक आँखों से नहीं देखा जा सकता… उस पर माया की पट्टी बंधी होना आवश्यक है… और आवश्यक है उस न दिखाई देने वाले प्रेम के प्रति इतना समर्पण… कि माया ठगनी को भी उसे आशीर्वाद स्वरूप उस प्रेम को देने में सहर्ष आनंद आए…

और वो निर्मोही हर बार अजनबी बनकर उसके प्रेम का तिरस्कार कर देता…

मैं नहीं जानता देवी आपको, आप कौन हैं.. क्यों बार बार मेरे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जाती हैं…

मैं तुम्हारा 2017 वर्ष पुराना प्रेम हूँ… राधा की आँखों में याचना के आंसू भर आये थे…

वो ठहाके मारकर हंसने लगा… और आप चाहती हैं कि मैं आपके इस पागलपन में आपकी हाँ में हां मिलाऊँ??

नहीं मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती… मैं चाह भी कैसे सकती हूँ… मेरी उम्र और तुम्हारी उम्र में 800 वर्ष का फासला है…

मैं बहुत पुरानी आत्मा हूँ तुम इस आधुनिक युग की युवा चेतना…

अब अचंभित होने की बारी माधव की थी… आप सच में पागल तो नहीं? किस भाषा में बात करती हैं आप? इतने वर्षों का हिसाब किसे याद रहता है भला?

मुझे… और मुझे ये भी पता है ये मेरा अंतिम जन्म है… और इस अंतिम जन्म का समापन सूत्र तुम्हारी नाभि में बंद है…

देखिये देवीजी मुझे आपकी कोई बात समझ नहीं आ रही… क्या आप मुझे बताएंगी आप मुझे कैसे जानती हैं और 2017 वर्ष पुरानी वह कहानी जो आपको याद है मुझे नहीं…

क्या करेंगे जानकार जब आपको मुझ पर विश्वास ही नहीं??

बता कर देखिये कदाचित विश्वास आ जाये, या सोई स्मृति जाग जाए…

राधा बताना शुरू करती है –

बात 2017 वर्ष पुरानी है….

बचपन से ही मुझे पागल लोग बहुत आकर्षित करते रहे हैं… शायद जिज्ञासा के कारण कि आखिर ये लोग पागल किस वजह से हो जाते हैं, या पागल हो जाने के बाद ये क्या बड़बड़ करते रहते हैं.

रास्ते में कोई पागल दिख जाता तो मैं उसके करीब जाकर खड़ी हो जाती और उसकी आँखों में तब तक झांकती रहती जब तक उसकी नज़रें मुझसे मिल न जाए. कभी वो मुझे देखकर मुस्कुरा देते, कभी कोई प्रणाम कर देता है… कोई हाथ से इशारा कर देता… जाओ अब…

कहते हैं कि इनमें से सारे ही पागल नहीं होते… कुछ नशेड़ी भी होते हैं, कुछ पागलपन का नाटक करते हैं और कुछ वास्तव में पागल होते हैं… लेकिन एक और तरह के पागल भी होते हैं, जिन्हें ‘अवधूत’ कहा जाता है… जो अपने परमात्मा के प्रेम में इतने मग्न रहते हैं कि सामाजिक व्यवहार से काफी कट जाते हैं. उनको कौन देख रहा है, कौन सुन रहा है, उनके बारे में क्या सोचेगा इन सबसे वो पूरी तरह ऊपर उठ चुके होते हैं. और मुझे लगता मैं इन अंतिम पागलों में से ही एक हूँ…

पहले मुझे पता नहीं था लेकिन लगता ज़रूर था कि ऐसा ही पागलपन मुझमें भी है जिसे मैंने कहीं अपने नाम और पिछले कई जन्मों के सामाजिक संस्कारों से पोषित अपने व्यक्तित्व के आवरण में छुपा रखा था… फिर एक समय ऐसा भी आया कुछ वर्षों की लगातार तपस्या के कारण ऐसे बहुत से छद्म आवरण टूटे… मेरे अन्दर के क्रोध, ईर्ष्या, कुंठा जैसी नकारात्मक चीज़ों को तोड़ा गया…

ये तोड़ा जाना बहुत आसान नहीं था… जीवन की पूरी प्रक्रिया को बदला जाता है… जो भी नकारात्मक भाव होता है उसे अपनी सम्पूर्णता से जीकर सतह पर लाना होता है… उसे एक बार फिर पूरे साक्षी भाव से जीकर ही आप उससे मुक्त हो सकते हैं…

लेकिन उसके बाद मेरा जो स्वरूप मेरे ही सामने प्रकट हुआ उसको देखकर मैं खुद भी अचंभित हुई… ये परिवर्तन मात्र आत्मिक स्तर पर ही नहीं, मानसिक और शारीरिक स्तर पर भी हुए… सूरत और सीरत दोनों बदल गयी…

जिस राह पर चल पड़ी हूँ वो यात्रा इतनी आनंददायी और परमात्मा के समीप है कि ये तोड़ा जाना भी इतना प्रेम पूर्ण हो जाता है जिसे मैं शब्दों में तो व्यक्त कर ही नहीं सकती. उससे गुज़रे बिना तुम्हें मेरी ये सारी बातें पागलपन ही लगेगी जिसे मैं सहर्ष स्वीकार भी करती हूँ…. और शायद यही पागलपन मुझे पूरी तरह से जीना है ताकि मैं उससे मुक्त हो सकूं…

माधव बहुत ध्यान से सुन रहा था… लेकिन अब भी बातें कोई निश्चित सिरा नहीं पकड़ सकी थी… तो उसने बीच में ही पूछ लिया…. फिर??

राधा जैसे किसी तन्द्रा से टूटी और सचेत होते हुए आगे बताने लगी….

तो ऐसे ही मुझे एक दिन अचानक मेरी नज़र ऊपर आकाश की तरफ उठी… लगा जैसे आँखों में कुछ गिरा है जिससे मुझे कुछ धुंधला सा साया दिख रहा है… मैंने आँखें साफ़ की लेकिन फिर भी कुछ अजीब सा दिखता रहा… आँखें धोकर आई फिर आकाश की तरफ देखा फिर वही धुंधला साया…

फिर जैसे कहीं से आवाज़ आई आखिर क्यों हटाना चाहती हो उसे? उसे और घनीभूत करो… हो सकता है वो साया स्पष्ट हो जाए…

फिर?

तो ऐसे ही एक दिन न जाने क्या हुआ वो साया एकदम से मेरी आँखों के सामने स्पष्ट हो गया. इतना स्पष्ट कि मैं उससे मिलती जुलती सूरत वाले को खोजने लगी.

मुझे लगने लगा जैसे इस सूरतवाले को मैं बहुत अच्छे से जानती हूँ… इससे कोई बहुत गहरा संबंध है… लेकिन मैं जैसे जैसे उसके करीब जाती वो दूर चला जाता… फिर मेरा पागलपन जो कहीं मैंने अपने अन्दर छुपा रखा था वो बाहर प्रकट होने लगा… उसकी तलाश में मैं कभी मीरा हो जाती, कभी राधा… मैं जितना उसकी बांसुरी की धुन में उसके पीछे पागलों की तरह दौड़ती, वो छलिया उतना मुझसे दूर हो जाता…

फिर उसे स्वप्न जगत में साक्षात देखा एक बच्चे के रूप में… वो अक्सर आता बालक के रूप में… एक बार एक झलक दिखी थी जैसे यशोदा कान्हा को डांट रही है और उसके कमर और पेट पर रस्सी बांधकर रखी है… और वह दामोदर अपना मुंह खोले उसे ब्रह्माण्ड का दर्शन करवा रहा है…

प्रत्येक स्वप्न के साथ धीरे धीरे उसकी उम्र कम होते देखा, अंतिम बार जब उसे स्वप्न में देखा तब वो मेरे गर्भ में स्थापित हो चुका था… गर्भनाल का रिश्ता उससे जुड़ गया… तो मैं उसके लिए माँ बन गयी… वो कभी किसी मुश्किल में होता तो मेरा मन विचलित होने लगता….. मैं उसे फिर खोजने निकल पड़ती, प्रेयसी कहीं दूर निकल चुकी थी… अब बस एक माँ बची थी जो नाभि से उठ रही ऊर्जा को ऊपर उठता हुआ अनुभव कर रही थी… कोई दर्द जैसे शरीर में उतर आया… पहले कमर के सबसे निचले हिस्से में रहता था, फिर उसे ऊपर उठता हुआ अनुभव करती रही.. जो मेरी रीढ़ की हड्डी से ऊपर उठकर हृदय के आसपास ठहर सा गया है…

बाबा ने बताया अपने परमात्मीय प्रेम को किसी व्यक्ति में क्यों खोजना… वो तुम्हारे ही प्रेम का प्रकट रूप है… अपने ईष्ट के प्रति तुम्हारी आस्था, तुम्हारी श्रद्धा या कहें तो तुम्हारा अपना ही स्वरूप है… किसी व्यक्ति में नहीं मिलेगा… और ऐसे प्रेम का कोई सामाजिक नाम नहीं होता, इसलिए तुम्हारे रूप बदलते रहते हैं, कभी तुम राधा हो जाती हो कभी मीरा तो कभी यशोदा… लेकिन कान्हा के कई नाम होने पर भी वह हमेशा कान्हा ही रहता है…

लेकिन जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि मैं अपने बाबा की बात मानने को तैयार नहीं थी… मुझे लगता था मेरी मुक्ति का अमृत उसकी नाभि में सुरक्षित है इसलिए वो मुझे इतना आकर्षित करता है .. इतना कि मैं उसके मायाजाल से मुक्त नहीं हो पा रही… आकर्षण केवल देह का ही तो नहीं होता… कभी कभी आत्मा भी तो आकर्षित करती है ना…

ह्म्म्मम्म फिर?

फिर महामाया ने मेरी आस्था को बल दिया… मेरे साथ हो रही जादुई घटनाओं के साथ पूरी दुनिया जादू में बदल गयी… हर व्यक्ति में मुझे उसका चेहरा दिखाई देने लगा… मैं पागलों की तरह लोगों के पीछे दौड़ती और कहती देखो यह भी वही है… देखो यह भी वही है… मुझे जानने वाले मुझ पर हँसते…कहते – तुम पागल हो गयी हो…

यही तो कहा था ना मैंने… कि मुझे यही लगता है मैं उन पागलों में से ही एक हूँ…

लेकिन फिर भी इस कारण मैं कई लोगों से लड़ी, किसी से रूठ गयी, तो किसी से प्रेम पूर्वक बातें की… उनकी आँखों में देखती तो एक अलग तरह का रंग और चमक दिखाई देती जैसे वे मुझे जानते हैं… फिर कोई अजनबी भी मिलता तो मुझे लगता यह उसी का कोई दूत है, जिसे महामाया ने मेरे पास मुझे उलझाने के लिए भेजा है ताकि मैं खुद को इस मायाजाल से मुक्त कर अपने परमात्मीय प्रेम की ओर आमुख हो सकूं…

लेकिन देखती हूँ जितना मैं यह समझती जाती और उनसे दूर होती जाती, वह नया रूप लेकर मेरे सामने प्रकट हो जाता… कान्हा न जाने किस निधिवन उपवन में मुझे खींच लाया था जिसका रहस्य मैं उसमें रहते हुए भी जान नहीं पा रही थी…. वहां हर ओर माधव मुझे रास लीला करता दिखाई देता और मैं… ईर्ष्या के मारे गाती…

मनमोहना बड़े झूठे
हार के हार नहीं माने
मनमोहना …

बने थे खिलाड़ी पिया
निकले अनाड़ी पिया
मोसे बेइमानी करे
मुझसे ही रूठे
मनमोहना …

तुम्हरी ये बाँसी कान्हा
बनी गला फाँसी
तान सुनाके मेरा
तन मन लूटे
मनमोहना …

माधव ने जैसे ही उसे गाते हुए सुना, उसका कंठ भर आया… लगा कहीं गहरे में कुछ हलचल हुई…. परन्तु अपने भाव छुपाकर वह राधा से ऐसे बात करने लगा जैसे वह सच में पागल है और वह सिर्फ मानवता के नाते उससे बात कर रहा है… – फिर क्या हुआ??

राधा की आँखों में पीड़ा के आंसू थे… भरे गले से कहने लगी…
… मुझे पूरा विश्वास था कि एक दिन मेरे हृदय का यह दर्द मेरे मस्तिष्क तक पहुंचेगा और मैं अपने ईष्ट के प्रेम को अपने ही भीतर पा लूंगी… जिसे मैं अब माधव कहने लगी हूँ… जिसके लिए कभी राधा हो जाती हूँ, कभी मीरा, तो कभी यशोदा…

अपने बाबा से पूछती हूँ तो वो कहते हैं इस प्रकट जगत से कोई नहीं आएगा, यहाँ सब सामाजिक लोग रहते हैं जिन्हें अपने मान मर्यादा प्रतिष्ठा की चिंता होती है… तुम्हारे इस पागलपन को झेलने की क्षमता इस जगत में किसी की नहीं…

मैं उनसे एक ही प्रश्न पूछती – अप्रकट जगत का हुआ तो आएगा ना?

वो हमेशा की तरह मुझे रहस्मय मुस्कान देकर मेरे प्रश्न के साथ अकेला छोड़ देते हैं… ये तुम्हारी अपनी यात्रा है, तुम कब तक मुझ पर निर्भर रहोगी, तुमको अपने जवाब खुद ढूंढना होंगे….

अब मैं उस सीमा पर खड़ी हूँ, बस एक कदम और … और मैं जान जाऊंगी कि ये पागल लोग अपने आप से क्या बातें करते रहते हैं… जिसके लिए लोग कहते हैं जो अपने परमात्मा के प्रेम में इतने मग्न रहते हैं कि सामाजिक व्यवहार से काफी कट जाते हैं. उनको कौन देख रहा है, कौन सुन रहा है, उनके बारे में क्या सोचेगा इन सबसे वो पूरी तरह ऊपर उठ चुके होते हैं.

राधा को पीड़ा में देखकर माधव के मन में करुणा तो उपजी लेकिन जितने वर्ष पहले की वह बात कर रही थी, वह ऐसे कर रही थी जैसे इसी जन्म में 2017 वर्ष पुरानी बात कर रही हो…. माधव को लगा किसी काल्पनिक व्यक्ति के प्रेम में बौराई स्त्री है, तो उसने थोडा कठोर होते हुए पूछा – तो यह कहानी 2017 वर्ष पूर्व जन्म की है… और आपको लगता है वह व्यक्ति मैं हूँ??

नहीं यह कहानी इसी जन्म की है… बताया ना मैं आपसे 800 वर्ष बड़ी हूँ…

मुझे लगता है लोग ठीक ही कहते हैं आप सच में पागल हो गयी हैं… और कृपा करके मेरा पीछा करना छोड़ दीजिये मैं वह नहीं हूँ…

जी… कोई बात नहीं… यह कहकर राधा वापस अपनी दुनिया में लौट गयी… फिर कुछ नए चेहरे बनाए उनसे अपने प्रेम किया… और घने जंगल में किसी पुराने तालाब पर खिले श्वेतकमल को तोड़ लाई…

अब इसका क्या करोगी राधा … बाबा ने प्यार से पूछा

उसे कमल का फूल बहुत पसंद है… इसमें उसके लिए एक घर बनाऊँगी…

कहकर राधा गीत गुनगुनाने लगती है…

वो प्रेम नगर का सबसे सुन्दर राजकुमार है
उसके प्रेम महल में विद्वानों की आवाजाही है
जो उसके दरबार में कभी प्रेम पर कविता सुनाते हैं
तो कभी कहानी

काशी के साधु गंगा के पवित्र जल के साथ
लाते हैं प्रेम की कथाएँ
हिमालय के तपस्वी
दे जाते हैं प्रेम के चमत्कारी मंत्र

उसके नगर में सभी युवा हैं
जो दिन रात प्रेम की बगिया में
बरसाते रहते हैं
एक दूसरे पर प्रेम भरे स्पर्श
उनकी देह में गुलाब और बातों में
चन्दन की महक होती हैं…

उसकी नगरी में बहती नदिया के जल पर
जलपरियाँ नृत्य करती हैं
तो आकाश में काम-रति

उसके नगर में प्रचलित प्रेमग्रंथ में
देवी देवताओं की कथाएँ हैं
जिसमें राधा-कृष्ण, राम-जानकी
और शिव शक्ति के आध्यात्मिक प्रेम
का वर्णन है

मैं अपनी कुटिया में
साग पकाती हूँ
तो प्रयास करती हूँ
छौंक की महक
उसके महल तक ना पहुंचे
कहीं छींक से उसे फिर सर्दी न हो जाए

हाथ से थापती हूँ
ज्वार की रोटी तो
प्रयास रहता है
चूल्हे का धुंआ
उसके महल की दीवारों को
काला न कर दे

झाडू बुहारते हुए बहुत
सतर्क रहती हूँ
कि धूल अधिक न उड़े

मैं उसके महल के करीब भी नहीं जाती
कि दिन रात पसीने में तर
मेरे देह की गन्ध से
उसकी साँसे दूषित न हो जाए

उसके महल से आती हवा से भी
मैं घूंघट कर लेती हूँ
कि कहीं उस तक ‘मेरे-जैसी’ के होने की
खबर न पहुंचे

प्रेम नगर का राजकुमार जो है
सो बड़े जतन से पला है और बहुत कोमल है
उसका प्रेम पावन, अद्भुत और ब्रह्माण्डीय है
प्रेम नगर का राजकुमार बहुत विद्वान और सुन्दर है
और मैं कुरूप, अल्हड़ और अनपढ़ हूँ
तो कभी प्रेम का ढाई आखर भी ना पढ़ पाई…

इसलिए उसको प्रकृति द्वारा हर रूप में प्रेम का आशीर्वाद प्राप्त है
और मैं मात्र दर्शन की क्षुद्र अभिलाषी प्रतीक्षा के श्राप को भोगती रही….

बाबा उसके पागलपन को दिन ब दिन बढ़ते हुए देख रहे थे… वो कभी राधा की तरह उसकी बांसुरी की धुन के पीछे दौड़ पड़ती, कभी मीरा की तरह किसी कमल के फूल में उसकी तस्वीर उकेर कर भक्ति में लीन हो जाती…

राधा को विश्वास ही नहीं होता था कि उसकी काल्पनिक दुनिया का उसका प्रेमी वास्तविक दुनिया में कहीं नहीं है… जो है वो उसके युग में नहीं आ सकता… और उसके आधुनिक युग में प्रवेश करने की राधा को अनुमति नहीं थी…

अनुमति? किसने नहीं दी अनुमति?

********

माया ठगनी ने राधा को रोक रखा था… ये तुम्हारा अंतिम जन्म है उसके युग में प्रवेश करने से तुम उसे हमेशा के लिए खो दोगी… उससे अंतिम बार मिलना है तो उसे तुम्हारे युग में आना ही पड़ेगा…

माँ …. मैं कैसे लाऊंगी उसे अपने युग में… वो तो मुझे पहचानता भी नहीं…

अपनी सारी कला, अपनी सारी योग्यता.. अपना सबकुछ दांव पर लगाना होगा… मान सम्मान सामाजिक प्रतिष्ठा, अपनी पहचान… प्रेम का रास्ता प्रतीक्षा और पीड़ा से होते हुए ही परमात्मा तक पहुँचता है…

उसे अपने युग में लाकर करूंगी भी क्या… उसे पाना मेरा उद्देश्य नहीं… उसको पाकर ऐसा क्या मिल जाएगा जो मेरे पास उसके शारीरिक रूप से उपस्थित होने पर नहीं है…

मुक्ति…

फिर ये तो मेरा स्वार्थ हुआ… मेरी मुक्ति के लिए उसे क्यों परेशान करूं..

वो उसका धर्म है… अपनी नाभि में स्थित मुक्ति का अमृत जब वो तुमको देगा तभी तो उसकी मुक्ति की राह खुलेगी… उसकी अपनी यात्रा तुम्हारी मुक्ति से जुड़ी है…
*******************

किससे बातें कर रही हो राधा … बाबा ने उसे यूं आँखें बंद कर बुदबुदाते देखा तो पूछा…

माँ आई है… कह रही है मुक्ति का समय आ चुका है मुझे जाना होगा…

कहाँ जाओगी?

नदी के उस पार जहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश का आभासी मिलन होता है…

कैसे जाओगी राधा तुम्हें तो तैरना भी नहीं आता… और पता है ना वो नदी श्रापित है जो उसमें नाव लेकर जाता है डूब जाता है… … तुम्हें तो कोई नाव भी ना मिलेगी…

प्रेम नदी में नाव से कौन जाता है बाबा… फिर उस नदी को श्राप मुक्त भी तो करना है… वो नदी श्राप मुक्त होगी तो मेरे माधव को इस युग में आने की राह मिल जाएगी… मैं तो उसके युग में जा नहीं सकती….

बस इतना कहते कहते वो नदी की ओर नंगे पाँव ही चल पड़ी…

बाबा को लगा नित्य की भांति पगलाई हुई है… कुछ देर में लौट आएगी हमेशा की तरह… उन्होंने उसे जाने दिया…

जैसे जैसे राधा के पाँव नदी की तरफ बढ़ते… उसके पैरों के निशान पर पीछे छूटी धरती पर छोटे छोटे केसरिया फूल उग आते..

नदी किनारे पहुँच कर एक नज़र भर वो क्षितिज की तरफ देखती है और अपने माधव को याद करते हुए उस नदी में उतर जाती है…

लोग कहते हैं… उस नदी से उस दिन कोई प्रकाश पुंज निकलकर आकाश की ओर गया था… अब उस नदी में कोई नाव नहीं डूबती…

राधा की जल समाधि से नदी श्राप मुक्त हुई… अब कोई भी उस नदी से होकर 2017 वर्ष पुराने युग में प्रवेश कर सकता है… प्रेम के फूल चुनकर अपने युग में ले जा सकता है…

इश्क़ का न जाने कैसा जादुई पानी था उस नदी में कि जब भी कोई अंतर की प्यास लिए उसमें झांकता भी, तो उसकी प्यास अपने अस्तित्व की साक्षी हो जाती… बस मृग को जब पता चल जाए कि कस्तूरी उसकी नाभि में है तो उसकी तो सारी तृष्णा वहीं समाप्त हो जाए.

 

 

लेकिन माधव आज तक अचम्भित है… वो जैसे ही उस नदी पर जाता है… नदी पत्थर की हो जाती.. उसे लगता वह नए युग का राम है जिसके छूने से अहिल्या पत्थर हो जाती… यह उसका 2018वां जन्म है… वो अब कभी 2017 में प्रवेश नहीं कर सकता था…

लेकिन नदी के पत्थर पर वो कुछ पंक्तियाँ लिख जाता है…. लोग उसे पगला कवि कहते हैं… जिसकी कवितायेँ अब अश्लील और झूठी कही जाती हैं… क्योंकि उसने जीवन के सबसे बड़े सच को स्वीकार नहीं किया…

वह अपनी मुक्ति के लिए हर 2017 वर्ष के बाद जन्म लेता, उस नदी तक आता और अपने ही लिखे शिलालेख पर पिछले जन्मों की स्मृतियों को जीवित करता…

नदी उसे चुपचाप देखती रहती… यह भी नहीं बता सकती कि उसकी की नाभि में जो अमृत राधा के लिए था, वह उसने उस छलिया कान्हा, उस माधव, बांके बिहारी, उस युगेश्वर की मुक्ति के लिए ही छोड़ दिया था…

और कहा भी तो यही जाता है कि कृष्ण का अंत तो हर पुस्तक में लिखा मिल जाएगा लेकिन राधा का क्या हुआ आज तक कोई नहीं जान पाया… कृष्ण का कृष्ण तत्व हो जाना राधा के कारण ही है… जब तक राधा की धारा इस धरा पर बहती रहेगी, तब तक कान्हा भी रहेगा… जिस दिन राधा का अंत पता चल जाएगा उस दिन कृष्ण का अंत हो जाएगा…

– माँ जीवन शैफाली

तन नुं बनावे तम्बूर अने मन ना करे मंजीरा, तो तमे मानजो के ए हशे, राधा ने कां मीरा

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