Menu

रियाज़ की रिकॉर्डिंग्स नहीं होती

0 Comments


सालों पहले की बात है. उस ज़माने में दिनकर जोशी, विट्ठल पंड्या, सारंग बारोट, रजनीकुमार पंड्या से ले कर हरकिशन मेहता, अश्विनी भट्ट, चंद्रकांत बक्शी, सभी समकालीन साहित्यकारों के सभी पुस्तक पढ़ जाता था. उस समय मैं पाठक ज़्यादा और लेखक बेहद कम था. उस समय वरिष्ठ साहित्यकार मोहम्मद मांकड़ (अभी 92 साल के पूर्ण रूप से स्वस्थ) की तमाम कहानिओ का संग्रह प्रकाशित हुआ था जिसकी प्रस्तावना में से एक वाक्य ने मेरा जीवन बदल दिया.

प्रस्तावना में मांकड़ साहब ने लिखा था कि इस पुस्तक में उनके पूर्व में प्रकाशित हुए कहानी संग्रहों की कहानिओं के उपरांत ऐसी कुछ कहानियां भी है जो उस समय के विभिन्न कहानी मासिको में प्रकाशित हुई थी, पर कहानी संग्रह तैयार करते समय ली नहीं गई ही, परन्तु अब मात्र रिकॉर्ड के खातिर ‘समग्र’ में उनको स्थान मिला है.

बाद में मांकड़ साहब खुलासा करते हैं कि क्यों कुछ कहानियों को पूर्व प्रकाशित कहानी संग्रह में शामिल नहीं किया गया था. उन्होंने कहा कि वे सब पुरानी कहानियां उनकी लेखन कला के रियाज़ जैसी है और रियाज़ की रिकॉर्डिंग्स नहीं होती.

“रियाज़ की रिकॉर्डिंग्स नहीं की जाती” इस वाक्य को पढ़े हुए दशकों बीत जाने के बावजूद दिमाग पर एकदम से बैठ गया है. इंसान को अपनी कला को उच्चतम स्तर तक ले जाने के लिए निरंतर रियाज़ करना रहता है. यह रियाज़ एक साधना है. कुछ लोग कुकिंग क्लास में नया पकवान सीख लेते हैं. उसके बाद उस नयी रेसिपी पर ट्रायल एंड एरर कर कर के उसमें महारत हासिल करनी होती है, पर कुछ जोशीले उस ही वीक एन्ड में घर खाने पर बुलाये मेहमानों की थाली में लीची-पाइनेपल कोफ्ता विथ वेलुपट्टीअल्लू राइस (यह क्या होता है? में भी नहीं जानता.) परोस देते है.

बहुत से लोग गाना या कोई साज़ बजाना सीखना शुरू करते है कि उनको ऑर्केस्ट्रा में शामिल हो के गले में गिटार टांग के बजाने का शौक होने लगता है. ज़रूरी रियाज़ से पहले प्रस्तुत किया गया कोई भी प्रदर्शन दिखावा बस होता है.

ऐसा सब से ज़्यादा लेखन एवं अभिनय में देखने को मिलता है. सभी कलाओं की तरह इन कलाओं में भी रियाज़ का सबसे ज़्यादा महत्व है. स्कूल- कालेजों में नाटक वगैरह में ट्रॉफी मिल जाने से आप रातों रात अमिताभ बच्चन, नसीरुद्दीन शाह या शाहरुख़ खान नहीं बन जाते. इन सब महान कलाकारों ने अपने स्कूल के दिनों में आप सभी की तरह ही नाटकों में काम किया था, पर उनके उस खुरदुरे हीरे पर सालों तक पॉलिश लगने के बाद ही उनके अंदर की चमक बाहर आई है.

फेसबुक पर या ब्लॉग पर लिख के कुछ डाला और पांच पंद्रह लोगों ने सराहा इस वजह से आप कवि या लेखक नहीं बन जाते. नियमित रूप से लेखनकला में माहिर बन के सालों तक उच्च कक्षा का लेखन नियमित रूप से लिख सको तब आप अपने आप को लेखक कहलवा सकते हो. इससे पहले यदि आप अपने आप को राइटर, ऑथर या साहित्यकार बतलाएंगे तो यह उपहास के योग्य होगा.

फास्टफूड के इस दौर में चट मंगनी पट ब्याह का महत्व बढ़ गया है. किसी-किसी पकवानों को तो उनके सही से पक जाने के लिए धीमी आंच पर रखे रहने देना पड़ता है. पूरी तरह से पक जाने पर भी दो-पाँच मिनिट तक उन पर बर्तन रख कर अपनी ही भाप से और पकने देना रहता है ताकि मसालों का स्वाद खुले और खुशबू निखरे.

पर यहाँ तो धीमी आंच पर पकाने की पूरी प्रोसेस ही भुला दी गई है.

गज़ब की जल्दी रहती है. पकवान पकने के लिए रखा ही होता है कि उसको परोस देने की जल्दी रहती है.

जल्दबाजी और उतावलेपन से यदि बचना है, अपने काम में परिपक्वता लानी है तो एक बात आप सभी को गाँठ बांध लेनी है. परिपक्व होना मतलब पकना. वाइन को परिपक्व होने देना मतलब उसकी वयस्कता को बढ़ने देना. आम को पकने देना मतलब उसको समय के साथ परिपक्व होने देना. पुत्र के हाथ में व्यवसाय की कमान सौंपने से पहले उसको परिपक्व होने देना पड़ता है. पुत्री को ब्याहने से पहले उसको आयु योग्य और समझदार होने देना पड़ता है. जीवन में यदि कोई सूत्र सबसे ज़्यादा उपयुक्त है तो वो मोहम्मद मांकड़ का यह कथन है :
“रियाज़ की कभी रिकॉर्डिंग्स नहीं होती!”

– गुजरात के प्रख्यात पत्रकार और लेखक सौरभ शाह
– अनुवाद जिगर दवे

Facebook Comments
Tags: ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!