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Power Of Name : पुकारो, मुझे नाम लेकर पुकारो

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कुछ सालों पहले यह विज्ञापन टीवी पर अक्सर देखने में आता था और उसका यह डायलॉग बहुत प्रसिद्ध भी हो गया था – क्यों सुनील बाबू, नया घर??

इस विज्ञापन में ऐसा क्या खास था, जो सबका ध्यान आकर्षित कर गया? यदि इस विज्ञापन में इस संवाद की जगह सिर्फ यह होता, क्यों भई नया घर? तब भी क्या यह विज्ञापन इतना प्रसिद्ध होता?

अच्छा तो अब यह बताइए यदि आपको कोई सिर्फ ‘ए….हैलो’ या ‘छिच….छिच’ कर के बुलाए तो आपको कैसा लगेगा? या कोई आपको बहुत ही ज़रूरी बात बता रहा हो और बीच में यह कह दे अरे… क्या नाम है तुम्हारा? तो आपको गुस्सा आएगा या नहीं?

किसी को नाम से संबोधित करने का मतलब होता है, आप उस व्यक्ति को उसकी पहचान, जिसे आजकल हम आइडेंटिटी कहते हैं, के साथ स्वीकार कर रहे हैं.

आपने कभी सोचा है यदि व्यक्ति का नाम ही नहीं होता, तो उसे पहचानना कितना मुश्किल हो जाता. हमारे मन में तो उसकी छवि रहती, लेकिन हमें किसी और को उसके बारे में बताना हो, तो कितनी मुश्किल आती?

लेकिन सिर्फ नाम ले लेना ही काफी नहीं होता, सही जगह सही नाम से पुकारना भी महत्वपूर्ण होता है. मेरा एक दोस्त है, उसका नाम है प्रकाश. ऑफिस में उसे प्रकाश सर कहते हैं, और घर में उसे पकिया. सोचो अब यदि उसे ऑफिस में लोग पकिया और घर में प्रकाश सर कहने लगे, तो उसका तो पूरा रोल ही बदल जाएगा.

हम कुछ प्रसिद्ध लोगों के नाम से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि यदि वे अपना नाम बदल दें तो उस व्यक्ति को स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है. मान लो यदि ऐश्वर्या शादी के बाद अपना नाम बदलकर संगीता रख लेती तब ऐश्वर्या को आप संगीता नाम से पुकार पाते? क्या अमिताभ और शाहरुख के नाम उनके व्यक्तित्व को और वृहद्द नहीं करते?

उसी तरह टीवी पर कुछ टॉक शो नाम से चलते हैं ‘कॉफी विद करण’ या ‘रेंडवू विद सिमी ग्रेवाल’, ‘ऑपेरा विंफ्रे शो’ जो सिर्फ उस कार्यक्रम को ही नहीं उसके संचालक को भी एक पहचान देता है.

नाम के पीछे की गई इतनी लंबी-चौड़ी बहस के पीछे सिर्फ एक ही संदेश है कि यदि आपको अपने संवाद को प्रभावशाली बनाना है, तो जिससे आप बात कर रहे हैं उसे उसकी उम्र, ओहदा, आपके साथ उसके संबंध, परिस्थिति के अनुसार सम्बोधित कीजिए. बातचीत के दौरान व्यक्ति का नाम लेने से आप सामने वाले को आपकी बात ध्यान से सुनने के लिए बाध्य करते हैं.

सिर्फ बातचीत के दौरान ही नहीं यदि आप अपनी कोई किताब, कहानी, कविता या किसी लेख को नाम देते हैं, तो उसे ऐसा नाम दीजिए जो लोगों को उसे पढ़ने पर मजबूर करें.

हमारे पड़ोस में एक नया घर बन रहा है, वहाँ जो परिवार रहने आया है, उसमें चार भाई हैं. उन्होंने उस घर को नाम दिया है “रामायण”. मुझे उस नाम ने बहुत प्रभावित किया.

नाम सिर्फ आपकी देह को पहचान नहीं देता, आपका नाम और उसका अर्थ आपकी चेतना में इतने गहरे में पैठ जमा लेता है कि आपका जीवन भी उसी अनुसार ढलने लगता है.

ओशो संन्यास की परंपरा में व्यक्ति की चेतना, उसके स्वभाव और आगे की आध्यात्मिक यात्रा में उसके योगदान के अनुसार ही नाम देने का प्रचालन रहा है. ध्यान बाबा का संन्यास नाम ‘स्वामी ध्यान विनय’ होना मेरे लिए सबसे बड़ा उदाहरण रहा है. क्योंकि उनकी पूरी चेतना ही ध्यान मग्न है, मैंने उन्हें कभी भी ध्यान करते हुए नहीं देखा है, और मैं उन्हें हमेशा ध्यान में ही देखती हूँ.

मुझे “जीवन” नाम मिलना मेरी यात्रा को जीवंतता से भरपूर रखती है. हो सकता है ये मेरे व्यक्तित्व के अनुसार ही हो, लेकिन यदि नहीं भी होता तब भी मेरा यह नाम मुझे इसी तरह जीवन से भरपूर रहने के लिए प्रोत्साहित करता.

और जब लोग मुझे माँ कहकर पुकारते हैं तो लगता है जैसे मैं जगतजननी हो गयी हूँ, प्रकृति और पृथ्वी ही की तरह… माँ होना मेरा सौभाग्य है, पुकारा जाना तो जैसे तयशुदा था इसलिए मुझे यह नाम मिलने से पहले भी मुझे कई लोग इसी तरह पुकारते थे… मेरा जन्म भी नवरात्रि में दुर्गा अष्टमी को हुआ है.

इसलिए हमारे ज्योतिष शास्त्र में भी राशि से नाम रखने को कहा जाता है क्योंकि ग्रहों और नक्षत्रों का भी उस पर बहुत फर्क पड़ता है कि आप लोगों द्वारा किस नाम से पुकारे जा रहे हैं.

जिस नाम पर ग्रहों और नक्षत्रों तक का प्रभाव रहता हो वो आम बोलचाल की भाषा में लोगों द्वारा कितना प्रभावित होता होगा.

इसलिए आगे से जब भी किसी को पुकारें पूरे मान सम्मान और प्रेम से उसका नाम लेकर पुकारें, इससे आपके सम्बन्ध तो मधुर होंगे ही, आपके और सामने वाले के जीवन की मधुरता का स्तर भी बढ़ेगा.

अपने गुलज़ार मियां भी तो यही कहते हैं ना…

पुकारो, मुझे नाम लेकर पुकारो…

मुझे तुमसे अपनी ख़बर मिल रही है….

कई बार यूं भी हुआ है सफ़र में
अचानक से दो अजनबी मिल गये हो
जिन्हें रूह पहचानती हो अज़ल से
भटकते भटकते वो ही मिल गये हो
कुंवारे लबों की कसम तोड़ दो तुम
ज़रा मुस्कुराकर बहारें संवारो

– माँ जीवन शैफाली

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