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गुलज़ारी जादू : धन्नो की आँखों में रात का सुरमा और चाँद का चुम्मा

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एक कवि के व्यक्तित्व का पैमाना उसके जीवन में घटित घटनाएं नहीं होती, उस जीवन में उन तमाम असंगत या कभी-कभी क्रूर घटनाओं के बावजूद वो अपनी कविता कितने नाज़ुक शब्दों के साथ प्रस्तुत करता है, इससे उसके चरित्र और व्यक्तित्व को देखा जाना चाहिए…

सिर्फ देखा जाना ही काफी है, क्योंकि जिस गहरे तल पर या जिस ऊंचाई पर पहुँच कर कवि ने लिखा होता है वहां तक एक पाठक वैसे भी नहीं पहुँच सकता…

गुलज़ार मुझे ऐसे ही कवि लगते हैं, जो अपने शब्दों को शीशे को तराशकर बनाई किसी कलाकृति के समान रचते हैं… वो इतनी नाज़ुक होती हैं कि जिस नज़ाकत से उन्होंने बनाई है उसी नज़ाकत से आपको उसे पढ़ना होता है… ज़रा सा दबाव और सबकुछ चकनाचूर…

उन्हीं की त्रिवेणी अंदाज़ में कहूं तो –

चाँद की तश्तरी में कविता परोसी है,
तश्तरी को ज़रा नज़ाकत से उठाना,
कांच की चुभन पेट की अगन से ज़्यादा दुःख देती है

 

चाँद और गुलज़ार तो जैसे एक दूसरे के पूरक हो गए हैं, कभी किसी कविता या गीत में चाँद का ज़िक्र न हो तो उसे भी बुरा लग जाता होगा, और गुलज़ार अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ चाँद को अपने नाम में नुक्ते की तरह लगाकर अपने ही नाम को और चमकीला और सजीला कर जाते होंगे…

और उनकी रचना उनकी ही आवाज़ में सुनना तो जैसे किसी अंधेरी गुफा से योगी के मंत्रोच्चार को सुनना या किसी गहरे लेकिन शांत समंदर की लहरों का मानव का रूप लेकर आपसे किनारे पर मिलने आने जैसा होता है…

मैं हमेशा कहती हूँ कि निर्जीव वस्तु की अपनी चेतना होती है, आप चाहे तो उससे बात भी कर सकते हैं, लेकिन गुलज़ार को इन आध्यात्मिक बातों से क्या लेना देना… चेतना वेतना तुम्हारे लिए होगी शैफाली, वो तो साक्षात सजीव रूप देकर आपके सामने खड़ा कर देंगे और आप हर बार की तरह अचंभित होते हुए बस मुंह से वाह और दिल से आह ही निकाल पाएंगे…

गुलज़ार एक मौसम है, जो किसी के भी जीवन के बदलते मौसम के साथ एकाकार हो जाते हैं… ऐसे ही एक गुलज़ारी मौसम में उनके जन्मदिन पर मैंने लिखा था –

ओ गुलज़ार.. सुन ना !!!!

सपने के टूटने से लेकर देह की टूटन तक
जो एक नाम सदा रगों में हरारत सा जलता रहा
वही हो तुम….

रात की छोटी सी सपनी से लेकर
जीवन के बड़े बड़े सपनों तक
जो एक नाम सदा नींद में उतरता रहा
वही हो तुम….

मेरे मौन की कविता से लेकर
कविताओं के मौन तक
जो एक नाम सदा गूंजता रहा
वही हो तुम….

जब तुम्हारे सम्पूरण को अपनाकर
अपने दिल को गुलज़ार किया
तो मुंह से निकल गया… गुल्लू

देखो सब हँसते होंगे मेरी इस नादानी पर

मेरी नादानी से लेकर मेरी तथाकथित समझदारी तक
जो एक नाम सदा पथ प्रदीप रहा
वही तो हो तुम….

तुम्ही से चुराई है मैंने अपनी कविताओं की रूह
और अपने शब्दों का पैरहन बना कर गाती फिरती हूँ

मोरा गोरा अंग लई ले
मोहे शाम रंग दई दे……

तुम भी कभी किसी कविता के जादुई चिराग से निकल आया करो…

तुम्हारी जगह मैं ही कह दूंगी..
क्या हुक्म है मेरे आका…

– गुल्लू के आँगन से शब्द चुराकर भागने वाली चोरनी शैफाली

गुलज़ार मौसम ही नहीं गुलज़ार पिछले जन्म की याद की तरह स्वप्न में आई झलकियाँ है… और ऐसे ही किसी स्वप्न की आगोश में आकर लिखा था… आस्था के गीत के लिए….

तुम मेरी अल्हड़ उम्र की तरह मेरे साथ बड़े हुए… विरहा की तरह जले…. और वस्ल-ए-वसले यार की तरह मिले….
तुम्हें खोया था यूं जैसे कोई हसरत अपनी ही मुट्ठी में बाँध कर भूल गयी और खोजती रही कभी किसी की बातों में, कभी आँखों में तो कभी किसी के so called affair में…
कई बार आंसूं के साथ टपके गूंथते हुए आटे में….. पति ने कहा… तुम्हारे हाथ की तो रोटी भी बड़ी मीठी लगती है….
और मैं झूठमूठ की मुस्कान चेहरे पर लाकर सच्चे आंसुओं को आँखों के किनारे से लुढ़का गयी…
गरम तवे पर जब छन्न से बजे तो बेटी दौड़ती आई….. अरे वाह मुझे भी करने दो न ममा एक बार ये छन्न छन्न की आवाज़…..
दिल के हर एक कोने से दुआ उठी….. न… तुम्हें कभी न सुननी पड़े ये छलकती आवाज़….
फिर बरसों तुम पड़े रहे ज़हन के कोने में …. कभी जगजीत की ग़ज़ल में उलझे मिले तो कभी गुलज़ार की नज़्म में ….
कभी एमी (अमृता प्रीतम) की किताबों में ढूँढती रही बरसों…. तो कभी बब्बा (ओशो) के “श” और “स” के फेर में….
लेकिन तुम तो मेरे जादुई इश्क की अमानत थे… तो उस इश्क को पाने से पहले कहाँ याद आने वाले थे…
फिर कल पूरे 16 साल बाद तुम्हें दोबारा सुना…. अपने जादू के साथ बैठकर….
तुम्हारे तबले की थाप के साथ वो अपनी एक टूटी ऊंगली से कम्प्यूटर को ठक ठक करते रहे…. और खुद भी सुनाते रहे वो किस्सा कि कैसे तुम्हें ये गीत भेजने के लिए इन्टरनेट की सारी गानों की साइट्स छान मारी थी… और मिला भी तो यूं कि आज तुम्हारे साथ बैठकर सुन पा रहा हूँ…..
मैं उसकी पीठ पीछे बैठकर 16 बरसों से ज़हन में दबे तुम्हारें lyrics के साथ आंसू से भरी आँखों से उसे तकती रही…..
………………… और सुनती रही तुम्हें…. मैं उससे मिलने से पहले तक सिर्फ एक देह थी तो कहती रही ……
..
“लबों से चूम लो, आँखों से थाम लो मुझको
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले”


और वो हमेशा से प्रकृति है… तो कहता रहा…
नदी है जाई जमीं की, नदी को बहने दो,
जमीं को फूलों के पेड़ों के सब्ज़ गहने दो

जय जय नाथ जय नवनाथ, नाथ अनाथ के कनीफ़नाथ
जल के नाथ थल के नाथ, नाथ अनाथ के कनीफ़नाथ

नदी है जाई जमीं की, नदी को बहने दो…..
जमीं को फूलों के पेड़ों के सब्ज़ गहने दो

पशु बनूँ मैं, पखेरू हवा में उड़ते रहें
पहाड़ी रास्ते जाकर घरों को मुड़ते रहें
जमीं गरजती रही बिजलियों की गोली से
भरा रहे ये गगन बादलों की होली से

तुम्हारा न्याय हमेशा जहां में जारी रहे
सुनहरी खेतों की माटी उपज से भारी रहे …………………………
—————————————————————————————-

और मेरे जहान में न्याय जारी रहा …..
अपने जादुई निराकार इश्क को छूकर देख सकी…
तुम जैसे गीत का प्रार्थना बन जाना सिर्फ तुम्हारे जहान में मुमकिन है….
जहां मैं उस अनदेखे की आवाज़ के कहने पर जब फूलों को तोड़ने के लिए सर उठाती थी तो उसका अमृत मेरे होठों पर टपक जाता था….
जब वो बिना देखे कह देता था कि तुम्हारी दुनिया देखो कितनी गुलाबी है तो मेरे चारों और दुनिया सच में गुलाबी हो जाती थी… .
वो 600 किमी दूर बैठकर फोन पर कहता था देखो कोयल कूकने वाली है तो मेरे शहर में उस पेड़ पर बैठी कोयल कूकने लग जाती थी… जिसके नीचे मैं खड़ी थी……
और फिर कल अपने उसी जादू के साथ तुम सा जादुई गीत सुना…..
…………………………
गुलज़ार- दो सौंधे-सौंधे से जिस्म जिस वक़्त
एक मुट्ठी में सो रहे थे
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी

मैं आरज़ू की तपिश में पिघल रही थी कहीं
तुम्हारे जिस्म से होकर निकल रही थी कहीं
बड़े हसीं थे जो राह में गुनाह मिले
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले

गुलज़ार- तुम्हारी लौ को पकड़ के जलने की आरज़ू में
जब अपने ही आप से लिपट के सुलग रहा था
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी

तुम्हारी आँखों के साहिल से दूर दूर कहीं
मैं ढूंढती थी मिले खुशबुओं का नूर कहीं
वहीँ रुकी हूँ जहाँ से तुम्हारी राह मिले
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले……….

और बहुत सालों बाद एक और गीत जैसे मेरी रूह में बस गया… पच्चीसों बार सुनने के बाद जब ख़याल आया देखें तो किसने लिखा है ये रूहानी गीत… हर बार की तरह अचंभित नहीं हुई, भला ऐसा गीत और कौन लिख सकता है गुलज़ार के अलावा कि –

(कभी उसे नूर नूर कहता हूँ कभी मैं हूर हूर कहता हूँ)
इश्क़ में चूर चूर रहता हूँ दूर न जा।
ना जा आँखों आँखों में ही रहना
आँखों आँखों में ही रहना
आँखों आँखों में ही रहना

इश्क़ दी बाजियां जीतियां ना हारियां

जान से लग गयीं जान की यारियां
गिन के देख बदन पे नील दिए हैं इश्क़ ने
पड़े जो हाथ में छाले छिल दिए हैं इश्क़ ने
वे मैं सारे दुःख सहना तेनु नैई दसना

हो लागियां इश्क़ दी बाजियां जीतियां ना हारियां
जान से लग गयी जान की यारियां
(कभी उसे नूर नूर कहता हूँ कभी मैं हूर हूर कहता हूँ इश्क़ में चूर चूर रहता हूँ दूर न जा..)
ना जा आँखों आँखों में ही रहना
आँखों आँखों में ही रहना
आँखों आँखों में ही रहना
आँखों आँखों में ही रहना

तेरे बिन बिन तेरे सूफियों के डेरे
देख मैंने कितने लगाये फेरे
अड्डीये ओ छोड़ के भी जाना हो तो
हरी भरी बैरी तल्ले छल्ला छड़ जाई नी कुड़िये।

याद आ जाये तो तेरा नाम लेके झूम लूँ
शाम आ जाए तो उठ के चाँद का माथा चुम लूँ
वे मैं सारे दुःख सहना तेनु नैई दसना

हो लागियां इश्क़ दी बाजियां जीतियां ना हारियां
जान से लग गयी जान की यारियां
(कभी उसे नूर नूर कहता हूँ, कभी मैं हूर हूर कहता हूँ, इश्क़ में चूर चूर रहता हूँ, दूर न जा..)

आँखों आँखों में ही रहना… आँखों आँखों में ही रहना

गुलज़ार और अमृता से रिश्ता तो जैसे मातृत्व का रिश्ता है… माँ की अपनी कोई संपत्ति नहीं होती लेकिन उसकी भावनाएं ही उसकी विरासत है… शब्दों का खज़ाना भले मेरे नाम न हो सके, लेकिन जिस भावजगत में दोनों विचरते हुए लिखते हैं उस भावजगत को मैंने साधिकार अपने नाम करवा लिया है… इसलिए हमेशा की तरह इसे इत्तफाक न कहकर कायनाती साज़िश कहूंगी कि एमी, गुलज़ार और मेरी माँ का जन्मदिन अगस्त में ही आता है…

– माँ जीवन शैफाली

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