एक कवि और उनकी कविताएं : दुष्यन्त कुमार

कुण्ठा मेरी कुण्ठा रेशम के कीड़ों सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ’ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुण्ठा – क्वांरी कुन्ती। बाहर आने दूँ तो लोक-लाज मर्यादा भीतर रहने दूँ तो घुटन, सहन से ज्यादा, मेरा यह व्यक्तित्व … Continue reading एक कवि और उनकी कविताएं : दुष्यन्त कुमार