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एक कवि और उनकी कविताएं : दुष्यन्त कुमार

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कुण्ठा

मेरी कुण्ठा
रेशम के कीड़ों सी
ताने-बाने बुनती,
तड़प तड़पकर
बाहर आने को सिर धुनती,
स्वर से शब्दों से भावों से
औ’ वीणा से कहती-सुनती,
गर्भवती है मेरी कुण्ठा – क्वांरी कुन्ती।

बाहर आने दूँ
तो लोक-लाज मर्यादा
भीतर रहने दूँ
तो घुटन, सहन से ज्यादा,
मेरा यह व्यक्तित्व
सिमटने पर आमादा।

प्रसव-काल है! सघन वेदना!

मन की चट्टानों कुछ खिसको
राह बना लूँ;
ओ स्वर-निर्झर बहो कि तुममें
गर्भवती अपनी कुण्ठा का कर्ण बहा लूँ,
मुझको इससे मोह नहीं है
इसे विदा दूँ।

यह कुण्ठा का पुत्र अभागी!
मंगल-नाशक!
इसे उठाकर जो भी पालेगा
इसके हित कष्ट सहेगा
बुरा करेगा
द्रोही ! घातक !!

प्राप्य–सत्य के लिए
महाभारत सा जब जब युद्ध छिड़ेगा,
यह कुण्ठा का पुत्र
हमेशा कौरव-दल की ओर रहेगा,
और लड़ेगा।

ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती, ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती

ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती
ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती

इन सफ़ीलों में वो दरारे हैं
जिनमें बस कर नमी नहीं जाती

देखिए उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती

शाम कुछ पेड़ गिर गए वरना
बाम तक चाँदनी नहीं जाती

एक आदत-सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती

मयकशो मय ज़रूर है लेकिन
इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती

मुझको ईसा बना दिया तुमने
अब शिकायत भी की नहीं जाती

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे
इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएँगे|

हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आएँगे|

थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आएँगे

उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
वे आए तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आएँगे|

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आएँगे|

रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढ़े तो शायद दृश्य सुहाने आएँगे|

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे|

हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे|

हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीड़ा में दहते हैं
अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आएँगे|

मापदंड बदलो

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदंड बदलो तुम,
जुए के पत्ते-सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।

मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना –
तब और भी बड़े पैमाने पर
मेरे हृदय में असंतोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
एक बार और
शक्ति आजमाने को
धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
मचल रही होंगी ।
एक और अवसर की प्रतीक्षा में
मन की कंदीलें जल रही होंगी ।

ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
ये मुझको उकसाते हैं ।
पिंडलियों की उभरी हुई नसें
मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
कसम देती हैं ।
कुछ हो अब, तय है –
मुझको आशंकाओं पर काबू पाना है,
पत्थरों के सीने में
प्रतिध्वनि जगाते हुए
परिचित उन राहों में एक बार
विजय-गीत गाते हुए जाना है –
जिनमें मैं हार चुका हूँ ।

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदंड बदलो तुम
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।

गीत का जन्म

एक अंधकार बरसाती रात में
बर्फीले दर्रों-सी ठंडी स्थितियों में
अनायास दूध की मासूम झलक सा
हंसता, किलकारियाँ भरता
एक गीत जन्मा
और
देह में उष्मा
स्थिति संदर्भों में रोशनी बिखेरता
सूने आकाशों में गूँज उठा :
-बच्चे की तरह मेरी उंगली पकड़ कर
मुझे सूरज के सामने ला खड़ा किया ।

यह गीत
जो आज
चहचहाता है
अंतर्वासी अहम से भी स्वागत पाता है
नदी के किनारे या लावारिस सड़कों पर
नि:स्वन मैदानों में
या कि बंद कमरों में
जहाँ कहीं भी जाता है
मरे हुए सपने सजाता है-
-बहुत दिनों तड़पा था अपने जनम के लिए ।

– दुष्यंत कुमार

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2 thoughts on “एक कवि और उनकी कविताएं : दुष्यन्त कुमार”

  1. मापदंड बदलो;दुष्यंत वर्तमान पीढ़ी के सबसे प्रिय कवि हैं;कुँवरनारायण और नरेश मेहता पर भी आप कोई अंक केंद्रित कर सकती हैं

    1. Making India Desk says:

      जी अवश्य हम जल्द ही प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे

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