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शेरोन : जिसे रचा गया है साँसों के संतूर पर, आत्मा की लय में, एक सुंदर शरीर में!

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सुनो शेरोन !

वैसे तो मौन ही सबसे अच्छी भाषा है अभिव्यक्ति की,
फिर भी कह देता हूँ कि तुम बला की खूबसूरत “थी “!

जब देखा था पहली बार तुम्हे सिल्वेस्टर स्टेलोन के साथ,
स्नानागार में केलिरत! आलिंगनबद्ध! अद्वैत होते!

मैं भी था जड़वत, मुग्ध, कीलित एवं यंत्रवत!

यौवन की जलधि में उफनता तुम्हारा सौंदर्य सुनामी सा था,
वो दिलकश हँसी, वो कातिल निगाहें, सबकुछ जैसे इल्हामी सा था…

फिर तुमने सिखाया दुनिया को “मूल प्रक्रियाओं” का वह रहस्य जो “सीखना” नहीं होता,
जन्म से ही मन्मथ के वश में बढ़ता, पुष्ट होता और अभिव्यक्त होता जिसे सींचना नहीं होता…

जानती हो! तुम्हे पाने की फ़्रायडिय अतृप्ति के मूल में क्या है??
दौ सो वर्षो की तुम्हारी निर्दय प्रभुता का प्रतिशोध भरा हुआ है!!

लेकिन हाय ये सभ्यता, ये संस्कार, हमें हमेशा रोक लेते हैं,
बुराई को अच्छाई से जीतो ये संदेश हमें हमेशा टोक देते हैं…

हम आह भरते ही रह जाते हैं आज भी तुम्हारे ताप से तपकर,
वो कमनीय काया, वो क्षीण कमरिया, वो अंजली भर पयोधर!

वो सुतल उदर जैसे तपता मरुस्थल, वो गंभीर नाभि ज्यो गहरा सरोवर,
वो पुष्ट नितंब उर्वा सरीखे सुगोलक, वो जंघाएँ स्निग्ध, गौरांग, सहोदर…

वो वाणी, वो वक्रता, वो सुवर्ण केशो की माया, कामनाएं करने लगे स्वयं मनोरथ,
वो मुद्राएं, वो भंगिमाएं, वो दृष्टि की तीक्ष्णता, विचलित हो जाये स्वयं गजोरथ!

वो रतिक्रीड़ा में तुम्हारी निर्द्वन्द्व निपुणता, वो मौन केलिशब्दों का मादक स्फुटन,
वो पीड़ा से मिश्रित संतुष्टि का अभिनय अनोखा, वो स्खलित देहों का पुनः द्वैतरूपण…

शब्दों के धनी हम, काली, माघ, भारवि से भूषित, लिखते रहे चित्र सहस्त्रों मनोहर,
तुम म्लेच्छ धूर्तों ने चित्रों को गति देकर, जय कर लिए चित्त सारे माया के दम पर…

सुनो! ओ म्लेच्छ कुलकुमुदिनी! बहुत हो चुका अब हमे उन्मुक्त कर दो!
करने है बाकी कई पुरुषार्थ अधूरे, कुछ पल को अब हमें श्रीयुक्त कर दो।।

– गोविन्द पुरोहित

 

संजय कोटियाल द्वारा गोविन्द पुरोहित की कविता की व्याख्या

आरम्भ में तो सौंदर्य है ही, पर अंत तक आते आते उसी सौंदर्य से उपजा ज्ञानालाभ भी है. सौंदर्य की भाषा स्वयं में कमनीय है. वही तो श्री तत्व की लीला भी है.

धन संभवतः बड़ी वस्तु नहीं है. सभी कहेंगे, और वास्तविक रूप से मानव ऐसा सोचेगा भी.

पर गहनता से आगे विचार करते हैं तो मूल भूमि पर ही आना पड़ता है. मानव रूप में लैंगिक शरीर का आयोजन सृष्टि में होता है. सभी बढ़ते हैं, हजारों सालों की कथाएं हैं, कभी रुका नहीं, माया मोहिनी की थ्योरी तक सबको पता है, ये भी पता है कि सब नश्वर है. पर रुका नहीं, जब रुकना होगा तब रुक जाएगा, वो प्रलय आदि की बातें. पर रुका तो नहीं है.

विकल्प चलने का रह जाता है. प्राणी का जन्म होते ही, असल में तो गर्भाधान होते ही, उसका सांसारिक बैंकिंग सिस्टम ही चालू हो जाता है. विचार करके कोई भी देख सकता है. वही असल में आगे बढ़ता है. देखने में ये आता है कि सौंदर्य का धन से बड़ा योग है. सौंदर्य अर्थ मने थोबड़ा या शरीर मात्र नहीं, एक पूरा सिस्टम एक प्राणी का विकसित होते जाता है. इसमें आस्तिक नास्तिक का कोई भेद मैं अभी तक नहीं देख पाया हूँ.

प्राणी का संसार में आना, मतलब उसका फाइनेंस के साथ में कनेक्शन शुरू, अब फाइनेंस की अपनी ताकत है. कई स्वरों में उसके स्वर में दम होता है. वाणी का सौंदर्य, शरीर का सौंदर्य, बुद्धि का सौंदर्य, मैनेजमेंट का सौंदर्य, मन्तर जपने का ही सौंदर्य, मॉडल बॉलीवुड आदि भी चल जाते हैं, दूसरों को रिलैक्स करना होता है इसलिए. उनकी कॉस्ट पर.

पर वही, दम देखिए. आपने लिखा न धूर्तता वाली बात, यहीं से दिशाओं का फर्क है. साफ देखता हूँ कि वो फर्क जो समझ गया, समझ के इम्प्लीमेंट भी कर गया, बस उसका संसार में आना सफल हो गया. फाइनेंस वाली बात रुपये टके की नहीं है, बड़ा अर्थ कहा है. कुछ भी चित् शक्ति का विलास और विकास. फिर केंद्रित ध्यान से आगे स्वयं प्रकृति ही बढ़ा देती है.

शेरोन स्टोन के लिए राजेश्वर वशिष्ठ की कविता

थक गया हूँ
आत्मा का दर्शन बखान करते करते
आज मुझे एक अनिर्वचनीय
शरीर का स्मरण करने दो!

1993 की एक शाम थी
बहुत गरम और उदास!
देर तक बीयर में तैर कर
किसी पब से निकलने के बाद भी
कनॉट प्लेस झुलस रहा था
गरम लू के प्रकोप से…

लेकिन मौसम से बेखबर
तुम अपनी टाँगों को खोल कर लेटी थी
ओडियन के माथे पर लगे
बड़े-से रंगीन पोस्टर पर!
यही मेरा तुमसे पहला परिचय था शेरोन स्टोन,
मैंने तुम्हें पूरी आँखें खोलकर
“बेसिक इंसटिंक्ट” में देखा था,
विश्वास करो,
मैं नशे में नहीं था!

मैं चमत्कृत था तुम्हारे रूप सौंदर्य को देख कर
मानो किसी फूलों की घाटी में
नृत्य कर रही हो
उर्वशी या रम्भा जैसी कोई अप्सरा,
नए प्रतिमान कहाँ से लाता
मेरे स्टॉक में तो ऐसी ही कल्पनाएं थीं!

उसके बाद तो तुम छायी रही
“प्लेबॉय” से लेकर
दुनिया की सभी ग्लैमर पत्रिकाओं में,
तुम्हारी झोली में आते रहे
सभी बड़े-बड़े पुरस्कार!

अखबार कहते रहे
फिल्मों में एक्सट्रा के रोल भी किए थे तुमने
पर सफलता के झूले पर
कोई कैसे चढ़ पाता
बिना मँहगी टिकट कटाए!

मुझे याद आया 2006 में
“बेसिक इन्सटिंक्ट-2” में
काम दृश्यों को काटने को लेकर
तुम नाराज़ हुई थी प्रोड्यूसर से,
तुमने ही कहा था,
“प्रौढ़ावस्था में शरीर और दिमाग दोनों को
खुल जाना चाहिए, साथ-साथ”
दोस्त, यह कह पाना
तुम्हारे ही बूते की बात थी!

जानती हो, तुम भी मेरी ही तरह
मार्च में पैदा हुई, मुझसे बीस दिन पहले,
इसलिए जानता हूँ बिंदास रहना
स्वाभाविक जीवन दर्शन है तुम्हारे लिए!
तुम खुल कर जी सकती हो
बिना किसी पर्दे के,
कोई नहीं कर सकता तुम्हारा शोषण
स्त्री समझ कर!

कई दिनों तक
तुम्हारी खबरों के लिए तरसते रहे हम,
लम्बी बीमारी के बाद
तुमने चलना सीखा फिर से,
शरीर को अभिमंत्रित किया
नई ऊर्जा और आभा के साथ!

अब मीड़िया में फिर से देख रहा हूँ
इस सत्तावन साल की उम्र में,
तुम्हारे ग्रेसफुल न्यूड्स
जिनमें न फोटोशॉप है
और न भारी मेकअप!

शेरोन, तुम एक कविता हो
जिसे साँसों के संतूर पर
आत्मा की लय में
रचा गया है
एक सुंदर शरीर में!

शेरोन स्टोन,
तुम प्रतीक हो
स्त्री सत्ता के आधुनिक अविर्भाव का!

अभिभूत हूँ
तुम्हारी सफलताओं पर
तुम्हारे स्त्री होने पर!

– राजेश्वर वशिष्ठ

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