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हसरत है धूपिया रंग की शिफॉन में चाँद छू लेने की!

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साड़ियों से इश्क़ उम्र के दूसरे दशक में हुआ
फिर वक्त के साथ परवान चढ़ा..
साड़ी पहन कर मिजाज़ आशिकाना हो जाता
लगता रिमझिम फुहारों से भरी हवायें हैं!

घर से निकलने का एक आकर्षण ये होता
कि कोई गुनगुनी सी साड़ी पहनेंगे
और उसके आँचल में
हर मौसम ठहरा लेंगे!!

आहिस्ता आहिस्ता साड़ी की हर किस्म परखने के बाद
शिफॉन की साड़ियों पर आकर इश्क़ थम गया!!

आह शिफॉन
कहीं दिख जाती तो मन गुदगुदा देती
हलके रंगों में नहाई
फूल से कपड़े पर फूलों की जमघट
सुबह की ओस पर सिलवटों की निशानियाँ!!

लहरिया झींट हो तो लगता
बदन पर कोई रंगीन बरसाती नदी छलक रही है..
जो चटक रंगों वाली बंधेज होती
तो लगता धरा छोटे छोटे चपेटों की सौगातों से सज गयी है!!

यूँ तो सभी से इश्क़ था
पर पसंदीदा थी
फूलों के मोहपाश में बंधी
हलके नीले पीले गुलाबी या नारंगी रंगों वाली शिफॉन!!

जब भी नैहर जाती
माँ हाथ में कुछ पैसे रखती
कहती अपने लिए कुछ ले आ
और मैं भाग कर साड़ी की दुकान पर
शिफॉन के अलावा कहीं और नज़र डालना
मानो जन्म जन्मांतर के महबूब से
विश्वासघात करना
तो बस शिफॉन में रंग और प्रिंट पसंद करती
और फूलों से लदी चाँदनियां घर ले आती
लगता महारानी गायत्री देवी का खजाना ले आयी
कितना राजसी कितना भव्य!!

मुझे ये हल्की मुलायम साड़ियां बिलकुल माँ की तरह लगती
कि माँ की सौगातें
माँ की तरह ही मृदुल
पहन कर तितली हो जाती
जिसके पंख तरह तरह से रंगों में भीगे रहते
बस मलाल यह कि शिफॉन पहन
तितली की तरह आवारगी न की कभी!!

कि अब हसरत है
धूपिया रंग की शिफॉन में
चाँद छू लेने की!!

– निधि सक्सेना

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