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फोटोग्राफी : कला, शौक और जुनून

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फोटोग्राफी, छायाचित्र छायांकन, साधारण समझ में ये एक तरीका है यादों को संजोने का, पर इसे जुनून की हद तक लेने वाले जानते हैं कि फोटोग्राफी जीवित को मूर्त रूप में जीवित करने की एक कला है.

लोगो के पास कैमरे होते हैं, आंखें होती हैं और वो छायांकन भी करते हैं, पर हर छायांकन, छायांकन नहीं होता क्योंकि हर छवि, कला की दृष्टि से देख कर नहीं ली जाती और इसी समझ को फोटोग्राफी कहते हैं.

Photographer Pallavi Trivedi

मेरे हिसाब से हर इंसान को ये समझ होती भी नहीं और ये समझ कोई कॉलेज या कोर्स आपको दे भी नहीं सकता. किस एंगल से क्लिक कितना प्रभावी होगा? प्रकाश स्रोत किस दिशा से अधिक प्रभावी है, ऐसे बहुत से बिंदु हैं जो फोटोग्राफी को आर्टिस्टिक बनाते हैं. पर इन बिंदुओं की समझ ईश्वर से मिला गुण होता है जो हर कोई नहीं समझ पाता.

आज कल के DSLR कैमरे के ज़माने में महंगे कैमरे को अच्छी फोटोग्राफी की सबसे पहली आवश्यकता माना जाता है, पर मैं नहीं मानती इस बात को. फोटोग्राफी एक कला है जो बिना बहुत महंगे तकनीकी यंत्रों के भी दिखाई जा सकती है.

केल्विन कार्टर साउथ अफ्रीकन जर्नलिस्ट ने एक फोटो ली थी जिसमें ये था कि एक गिद्ध एक भूख से पीडित कमज़ोर लड़की के मरने का इंतज़ार कर रहा है ताकि वो उसको खा सके.

Kelvin Carter Vulture Photo

केल्विन ने कुछ महसूस किया और इस दृश्य को फ़ोटो बनाया. अपने संदेश या फोटोग्राफर के एंगल को उस चित्र ने ऐसे प्रदर्शित किया कि सबसे विवादास्पद चित्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ और केल्विन अपराधबोध ग्रस्त हो गए.

वहां कहीं ये प्रश्न नहीं आया कि केल्विन ने कौन सा कैमरा लिया था, कितने पिक्सेल का था कैमरा, फ़िल्टर यूज़ किया. बस बिंदु यही था कि उस क्षण में केल्विन ने रोचकता ढूंढी, भले ही नकारात्मक.

Steve McCurry Photo

फोटोग्राफर Steve McCurry ने 1984 में एक 13 वर्षीय अफगान रिफ्यूजी लड़की की आंखों की फ़ोटो ली जिसे जून 1985 में नेशनल जियोग्राफिक की बुक के कवर पेज में लिया. ये रहस्यमयी आंखों वाली लड़की फ़ोटो चर्चा का विषय बन गयी.

सब जानना चाहते थे इस लड़की को जिस पर से पर्दा 17 साल बाद खुला, पर विषय ये नहीं बना कि स्टीव ने कौन सा कैमरा यूज़ किया? विषय ये रहा कि फोटोग्राफर ने किस एंगल से इस खूबसूरती को कलात्मकता दी.

फोटोग्राफी आज एक शौक की तरह ज़रूर बढ़ रही है, लेकिन आज इसमें भी रचनात्मकता और कलात्मकता की जगह एक बाज़ारवाद है जिसके पीछे कृतिम सुंदरता को लाना और पैसा कमाने का थोथा उद्देश्य है.

जिन्होंने इस ट्रेंड में अपने शौक को रखा वो जानते हैं कि ये आज भी कितना महंगा शौक है पर जिन्होंने इसे कृत्रिम सौंदर्य के रूप में रख लिया वो जानते हैं कि बिना कलात्मकता के भी ये ट्रेंड कितना फलता फूलता है.

मेरे कॉलेज के दिनों में फोटोग्राफी ब्लैक एंड वाइट से निकल रंगों से जुड़ रही थी, हांलकि ये फोटोग्राफी के लिए स्वर्णिम परिवर्तन काल था, पर फिर भी गहरी कला श्वेत और श्याम में थी.

फोटोग्राफी में रील में चित्रों की संख्या अधिक हो गयी थी, रंगीन चित्र ने सजीवता अधिक कर दी तो जाहिर है युवाओं में रंगीन फ़ोटो में खुद को देखने का एक फैशन से आ गया.

उस दौर में फोटोग्राफी का महत्व था पर कलात्मक अभिरुचि नहीं. फैशन के लिए भी एक महत्वपूर्ण समय था मेरे कॉलेज के दिन. इसलिए फोटोग्राफी का महत्व भी फैशन से प्रेरित था. फैशन और कला का साथ होता भी है और नहीं भी, पर आज छायांकन और फ़ैशन तो एक दूसरे के पूरक हो चुके हैं.

Praveen Bhat

 

विक्रम बावा और प्रवीण भट्ट मेरे पसन्दीदा दो भारतीय मूल के फोटोग्राफर हैं. दोनों ही मूलतः फैशन फोटोग्राफर है. विक्रम बावा की फोटोग्राफी की तारीफ एक उदाहरण के साथ करती हूँ.

कुछ सालों पहले एक प्रसिद्ध व्यवसायी की पत्नी ने अनमोल पेंटिंग्स का फोटोशूट विक्रम बावा से करने को कहा. विक्रम का तो ये व्यवसाय है पर इसके पीछे की वजह विक्रम न समझे. विक्रम इतने साफ फोटोग्राफर हैं कि उनके फोटोज़ उन कलाकृतियों की फोटोज़ नहीं प्रतिरूप के रूप में करने के लिए उन्हें यह कार्य सौंपा गया. ये एक तरह से विक्रम के कार्य की गहनता को दिखाता है इसलिए वो आदर्श हैं.

– अमृता गुलज़ार अय्यर

फीचर फोटो क्रेडिट – बॉलीवुड फोटोग्राफर जयेश शेठ

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